कक्षा ६ हिंदी अध्याय 11 पंक्तियों पर चर्चा के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें पढ़कर समझिए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? कक्षा में अपने विचार साझा कीजिए और अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए। (क) “निर्भीक गया वह ढालों में, सरपट दौड़ा करवालों में।”
उत्तर

सरल अर्थ — चेतक बिना ज़रा भी डरे शत्रु-सैनिकों की ढालों के बीच घुस गया और उनकी करवालों यानी तलवारों के बीच पूरी रफ़्तार से दौड़ता रहा। जहाँ हथियार चल रहे थे, ठीक उसी भीड़ में वह निडर होकर आ-जा रहा था।

शब्दअर्थवह क्या बताता है
निर्भीकजिसे भय न हो, निडरचेतक का साहस — घायल होने के डर से वह पीछे नहीं हटा।
ढालवार रोकने वाला हथियारशत्रु-सैनिकों की भीड़, जो अपने बचाव में ढालें ताने खड़ी थी।
सरपटबिना रुके, पूरी रफ़्तार सेचेतक की गति — वह हथियारों के बीच भी धीमा नहीं पड़ा।
करवालतलवारयुद्ध का सबसे ख़तरनाक हिस्सा, जहाँ जान का जोखिम सबसे ज़्यादा था।

कवि की कारीगरी — यहाँ कवि सैनिकों का नाम नहीं लेता, केवल उनके हथियारों का नाम लेता है — ढाल और करवाल। इससे आँखों के सामने पूरा रणक्षेत्र खड़ा हो जाता है: चमकती ढालें, लहराती तलवारें और उनके बीच से बिजली-सा निकलता एक सफ़ेद घोड़ा।

भाषा में क्या ख़ास है: ‘चालों में – भालों में – ढालों में – करवालों में’ — चारों पंक्तियों का अंत एक ही ध्वनि पर होता है। यह तुक पंक्तियों को घोड़े की टापों जैसी लय दे देती है, मानो शब्द भी सरपट दौड़ रहे हों। यह पूरी कविता वीर रस की है, और यह पंक्ति उसका सबसे अच्छा नमूना है।
अपने शब्दों में कहिए तो: जहाँ बड़े-बड़े योद्धा भी हथियार देखकर ठिठक जाते हैं, वहाँ एक घोड़ा बिना रुके दौड़ता चला गया — यही चेतक की असली वीरता है।
प्र2.
(ख) “भाला गिर गया, गिरा निषंग, हय-टापों से खन गया अंग।”
उत्तर

सरल अर्थ — चेतक का वेग इतना भयंकर था कि शत्रु-सैनिकों के हाथ से भाले छूटकर गिर पड़े, उनके निषंग यानी तीर रखने के तरकश भी गिर गए, और घोड़े की टापों से उनके अंग खुद-कुचल गए। यानी चेतक अकेले ही शत्रु-सेना को तितर-बितर करता चला गया।

शब्दअर्थचित्र जो बनता है
भालालंबे डंडे वाला नुकीला हथियारजो हथियार वार करने के लिए उठा था, वही हाथ से छूट गया — शत्रु के हड़बड़ा जाने का संकेत।
निषंगतरकश, तीर रखने का खोलकंधे पर बँधा तरकश तक गिर पड़ा — यानी सैनिक सँभल ही नहीं पाए।
हयघोड़ा‘हय-टाप’ यानी चेतक के खुरों की मार।
खन जानाखुद जाना, छिल-कट जानायुद्ध की भयंकरता — टापों से ही शरीर घायल हो गए।

कवि की कारीगरी — ध्यान दीजिए कि यहाँ वाक्य कितने छोटे-छोटे हैं — “भाला गिर गया,” “गिरा निषंग,” “खन गया अंग।” छोटे वाक्य पढ़ने में तेज़ी लाते हैं, और इसी तेज़ी से युद्ध की अफ़रा-तफ़री महसूस होने लगती है। ‘गिर गया’ और ‘गिरा’ की पुनरुक्ति यह जताती है कि गिरना एक बार नहीं, बार-बार हुआ।

अगली पंक्ति से जोड़कर देखिए: इसके तुरंत बाद कवि कहता है — “वैरी-समाज रह गया दंग / घोड़े का ऐसा देख रंग।” यानी शत्रु न केवल हारा, बल्कि हैरान भी रह गया कि एक घोड़ा ऐसा भी हो सकता है। कविता की सबसे बड़ी प्रशंसा यही है — प्रशंसा कवि नहीं कर रहा, शत्रु कर रहा है।
ध्यान दीजिए: इन पंक्तियों में वीर रस के साथ-साथ भयानक रस की झलक भी है, क्योंकि युद्ध का दृश्य डरावना है। इसीलिए कविता पढ़ते समय जोश भी आता है और युद्ध की भयावहता भी समझ में आती है।
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