कक्षा ७ विज्ञान अध्याय 9 पाठ्य प्रश्न के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन2026-09-08
प्र1.
ये पोषक क्षुद्रांत्र से कैसे अवशोषित होते हैं?
उत्तर
क्षुद्रांत्र का आंतरिक आस्तर पतला होता है और उस पर अँगुली जैसे हजारों प्रवर्ध होते हैं (चित्र 9.5)। ये प्रवर्ध आस्तर के सतही क्षेत्रफल को बहुत बढ़ा देते हैं। पचे हुए पोषक इस पतली भित्ति से होकर भित्ति की रक्त-वाहिनियों में उपस्थित रक्त में पहुँच जाते हैं और रक्त उन्हें शरीर के प्रत्येक भाग तक ले जाता है। पोषकों के रक्त में पहुँचने के इसी प्रक्रम को अवशोषण कहते हैं।
क्षुद्रांत्र के अँगुली जैसे प्रवर्ध उसी प्रकार कार्य करते हैं जैसे मुड़ा हुआ तौलिया सपाट कागज की तुलना में कहीं अधिक जल सोखता है।
ऐसा क्यों होता है: अवशोषण वहीं हो सकता है जहाँ भोजन भित्ति के संपर्क में आए। 6 मीटर लंबी चिकनी नली भोजन के बहुत कम भाग को छू पाती। हजारों सूक्ष्म प्रवर्ध उसी 6 मीटर को कई गुना बड़ी अवशोषक सतह में बदल देते हैं, जिससे उपयोगी पदार्थ लगभग व्यर्थ नहीं जाता।
क्या आप जानते हैं? इसीलिए सीलिएक रोग इतना गंभीर है। वह इसी आंतरिक आस्तर को क्षति पहुँचाता है, अवशोषक सतह नष्ट हो जाती है और रोगी भरपूर खाने पर भी दुर्बल बना रहता है।
प्र2.
अधिकांश पोषकों के क्षुद्रांत्र में अवशोषित होने के तथा पच जाने के पश्चात शेष बिना पचे हुए भोजन का क्या होता है?
उत्तर
वह बृहदांत्र में चला जाता है। वहाँ —
बृहदांत्र उसमें से जल और कुछ लवण अवशोषित कर लेती है, जिससे तरल अपशिष्ट अर्ध ठोस हो जाता है।
इस अर्ध ठोस अपशिष्ट को मल कहते हैं।
मल-त्याग होने तक यह मल बृहदांत्र के निचले भाग मलाशय में एकत्रित रहता है।
अंततः इसे गुदा के द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है — इस प्रक्रम को बहि:क्षेपण कहते हैं।
बिना पचा भोजन → बृहदांत्र (जल + लवण अवशोषित)
→ अर्ध ठोस मल → मलाशय में संचित
→ गुदा द्वारा बाहर = बहि:क्षेपण
संकेत: फलों, सब्जियों और साबुत अनाज जैसे रेशे-समृद्ध भोजन से बृहदांत्र सुचारू रूप से कार्य करती है और मल-त्याग सरल हो जाता है।
प्र3.
इसकी लंबाई क्षुद्रांत्र से कम होती है इसके पश्चात भी इसे बृहदांत्र क्यों कहते हैं?
उत्तर
क्योंकि इसका नाम इसकी चौड़ाई पर रखा गया है, लंबाई पर नहीं। बृहदांत्र क्षुद्रांत्र के 6 मीटर के मुकाबले केवल लगभग 1.5 मीटर लंबी है, परंतु वह क्षुद्रांत्र से कहीं अधिक चौड़ी है — इसीलिए उसे "बृहद्" (बड़ी) कहा जाता है।
लक्षण
क्षुद्रांत्र
बृहदांत्र
लंबाई
लगभग 6 मीटर — आहार नाल का सबसे लंबा भाग
लगभग 1.5 मीटर
चौड़ाई
कम
अधिक
मुख्य कार्य
पाचन पूर्ण होता है; पोषकों का अवशोषण
जल और कुछ लवणों का अवशोषण; मल का बनना और संचय
ऐसा क्यों होता है: दोनों नाम नली के व्यास का वर्णन करते हैं — जैसे घर में हम "मोटा पाइप" और "पतला पाइप" कहते हैं, चाहे पतला पाइप दूर तक क्यों न जाता हो।
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