कक्षा ९ हिंदी अध्याय 10 अर्थ और भाव के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझते हुए इनका भाव स्पष्ट कीजिए— (क) “लंका पदतल शतदल, गर्जितोर्मि सागर-जल धोता शुचि चरण युगल!”
उत्तर

अर्थ — (हे भारति!) लंका तुम्हारे चरणों के नीचे खिले हुए कमल के समान है, और गरजती लहरों वाला समुद्र का जल तुम्हारे दोनों पवित्र चरणों को धो रहा है।

भाव — इन तीन पंक्तियों में कवि ने भारत के भूगोल को वंदना में बदल दिया है। भाव के तीन स्तर हैं —

  1. भारत एक चेतन देवी है, नक्शा नहीं। कवि भारत को खड़ी हुई एक देवी के रूप में देखता है और उसका वर्णन चरणों से आरंभ करता है — क्योंकि पूजा सदा चरणों से शुरू होती है। भारत का सबसे दक्षिणी छोर सागर में है और उससे आगे लंका द्वीप — इसलिए लंका ‘पदतल’ पर पड़ा वह कमल बन जाती है जो देवी-प्रतिमाओं के चरणों के नीचे दिखाया जाता है।
  2. प्रचंड शक्ति भी यहाँ विनम्र है। ‘गर्जितोर्मि’ यानी गरजती लहरें — समुद्र यहाँ अपने सबसे भयंकर रूप में है। पर वह टकरा नहीं रहा, चरण धो रहा है। भारतीय परंपरा में किसी के चरण धोना सबसे बड़ा आदर है। यानी कवि कहना चाहता है कि भारत की महिमा के आगे संसार की सबसे बड़ी शक्ति भी सेवक बन जाती है
  3. पवित्रता का भाव। ‘शुचि’ का अर्थ है पवित्र, निर्मल, निष्कपट। भारत के चरण पहले से ही पवित्र हैं; समुद्र उन्हें धोकर उन्हें पवित्र नहीं बना रहा, बल्कि अपने को धन्य कर रहा है। यह भाव भक्ति-काव्य की परंपरा से आया है।
पूरा चित्र एक साथ देखिए: नीला समुद्र, उस पर तैरता कमल-सा लंका द्वीप, और ऊपर खड़ी एक विशाल आकृति जिसके चरण लहरें छू रही हैं। कवि ने न कहीं ‘भारत महान है’ लिखा, न कोई नारा दिया — फिर भी पूरी महिमा खड़ी हो गई। यही चित्रात्मक भाषा की शक्ति है, जिसकी चर्चा पुस्तक ‘कविता का सौंदर्य’ में करती है।
शिल्प की बात: रूपक — लंका पर चरणतल के कमल का आरोप; भारतभूमि पर देवी का आरोप। मानवीकरण — समुद्र मनुष्य की तरह चरण धोता है (पूरी कविता की यही एकमात्र स्पष्ट क्रिया है — ‘धोता’)। अनुप्रास — ‘लंका पदत शतद’ में ‘ल’ की तीन आवृत्तियाँ, ‘ुचि रण’ में ‘च’ की। सामासिक पद — पदतल, शतदल, गर्जितोर्मि, सागर-जल, चरण-युगल। तुक — शतदल – सागर-जल – युगल।
प्र2.
(ख) “प्राण प्रणव ओंकार, ध्वनित दिशाएँ उदार, शतमुख-शतरव-मुखरे!”
उत्तर

अर्थ — ‘ॐ’ की पवित्र ध्वनि ही तुम्हारे प्राण हैं; तुम्हारी उदार दिशाएँ उसी ध्वनि से गूँज रही हैं; हे सौ मुखों से उठे सौ स्वरों द्वारा मुखरित होने वाली (भारति)!

भाव — यह कविता का समापन है और यहीं उसका सबसे बड़ा अर्थ खुलता है। अब तक कवि भारत का शरीर गिना रहा था — चरण, वस्त्र, हार, मुकुट। अंत में वह भारत के प्राण बताता है, और वे प्राण कोई वस्तु नहीं, एक ध्वनि हैं। भाव के तीन स्तर हैं —

  1. भारत की पहचान उसकी भूमि नहीं, उसकी ज्ञान-चेतना है। ‘प्रणव’ यानी ओंकार — भारतीय चिंतन में यह सृष्टि का मूल नाद और ज्ञान का प्रतीक माना गया है। इसे ‘प्राण’ कहकर कवि यह घोषित करता है कि भारत जीवित इसलिए है कि उसके भीतर विचार और साधना की परंपरा साँस ले रही है। पाठ की भूमिका भी कहती है — ‘कवि भारत को एक चेतन सत्ता के रूप में देखता है, जिसकी दिशाओं में ओंकार की गूँज हो रही है’।
  2. भारत की दिशाएँ ‘उदार’ हैं। शब्द-संपदा के अनुसार उदार = दानशील, दयालु। यानी भारत की सीमाएँ दीवार नहीं, खुले दरवाज़े हैं; यह देश लेता नहीं, देता है। इसी उदारता के कारण उसकी ध्वनि चारों दिशाओं में फैल पाती है — और यही ‘समस्त विश्व में भारत के महत्व का उद्घोष’ बनता है।
  3. भारत अनेक स्वरों का देश है। ‘शतमुख-शतरव’ यानी सौ मुख और सौ ध्वनियाँ; यहाँ ‘शत’ गिनती नहीं, अनगिनत का प्रतीक है। सैकड़ों भाषाएँ, बोलियाँ, पर्व, संगीत, पंथ और विचार — सब एक साथ बोलते हैं। पर कवि इसे शोर नहीं कहता, ‘मुखर’ कहता है। यानी विविधता भारत की कमज़ोरी नहीं, उसकी वाणी है। एकता का अर्थ यहाँ एकरूपता नहीं, अनेक स्वरों का एक साथ बजना है — यही ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना है, जिस पर पुस्तक आगे प्रश्न भी पूछती है।
ध्यान देने योग्य बात: कविता दृश्य से आरंभ हुई थी (कमल, समुद्र, वन, गंगा, बर्फ़) और ध्वनि पर समाप्त होती है। यह क्रम आकस्मिक नहीं है — दिखाई देने वाली चीज़ें मिट सकती हैं, पर ध्वनि दिशाओं में फैलकर बनी रहती है। इसीलिए कवि ने भारत के प्राण किसी पर्वत या नदी में नहीं, एक ध्वनि में रखे।
शिल्प की बात: अनुप्रास — ‘प्राप्रणव’ में ‘प्र’ की आवृत्ति; ‘तमुख-तरव-मुखरे’ में ‘श’ की — यही पुस्तक का अपना अनुप्रास-उदाहरण है (पृष्ठ 172); ‘िशाएँ उदार’ में ‘द’ की। रूपक — प्राणों पर ओंकार का आरोप। मानवीकरण — दिशाएँ ‘उदार’ हैं और ‘ध्वनित’ हो रही हैं। पुनरुक्ति — ‘शत’ दो बार, ‘मुख’ दो बार। श्रव्य बिंब — पूरी पंक्ति सुनाई देती है। तुक — ओंकार – उदार, और अंत में ‘मुखरे’ जो टेक ‘विजयकरे – कमलधरे’ पर लौट आता है।
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