कक्षा ९ गणित अध्याय 8 अंतिम प्रश्नावली के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
उस समानांतर श्रेढ़ी का 31वाँ पद ज्ञात कीजिए, जिसका 11वाँ पद 38 है और 16वाँ पद 73 है।
उत्तर

समानांतर श्रेढ़ी के दो पदों से a और d में दो समीकरण मिलते हैं।

a + 10d = 38  (1)
a + 15d = 73  (2)
(2) – (1): 5d = 35, अत: d = 7
(1) से: a = 38 – 70 = –32
t31 = a + 30d = –32 + 210 = 178

छोटा रास्ता: t31, t16 से 15 कदम आगे है, अत: t31 = 73 + 15 × 7 = 73 + 105 = 178।

ऐसा क्यों होता है: समानांतर श्रेढ़ी में mवें और nवें पद का अंतर (m – n)d होता है और a निरस्त हो जाता है। यहाँ t16 – t11 = 5d = 35 तुरंत मिल जाता है। पूरा हल एक बार करना फिर भी उपयोगी है, क्योंकि उससे पता चलता है कि a = –32 है — यह श्रेढ़ी शून्य से नीचे प्रारंभ होती है और बाद में धनात्मक होती है।
प्र2.
उस समानांतर श्रेढ़ी का निर्धारण (की रचना) कीजिए, जिसका तीसरा पद 16 है और जिसका 7वाँ पद, 5वें पद से 12 अधिक है।
उत्तर

"7वाँ पद, 5वें पद से 12 अधिक है" का अर्थ है t7 – t5 = 12, और ये दोनों पद दो कदम की दूरी पर हैं।

t7 – t5 = (a + 6d) – (a + 4d) = 2d
2d = 12
d = 6
t3 = a + 2d = 16 → a + 12 = 16 → a = 4

समानांतर श्रेढ़ी है 4, 10, 16, 22, 28, 34, 40, …

जाँच: तीसरा पद 16 है; t7 = 40 और t5 = 28, तथा 40 – 28 = 12।

ऐसा क्यों होता है: "इतना अधिक है" पदों का अंतर है, और समानांतर श्रेढ़ी में ऐसा प्रत्येक अंतर d का पूर्ण गुणज होता है — उसमें a आता ही नहीं। इसी कारण दूसरी शर्त अकेले d निर्धारित कर देती है, और पहली शर्त a निर्धारित करने के लिए बच रहती है। "श्रेढ़ी का निर्धारण कीजिए" का अर्थ है a और d बताइए, अथवा इतने पद लिखिए कि प्रतिरूप स्पष्ट हो जाए।
प्र3.
कितनी 3-अंकीय संख्याएँ 7 से विभाज्य हैं? (संकेत — सभी 7 द्वारा विभाज्य संख्याएँ एक समानांतर श्रेढ़ी बनाती हैं। ऐसी सबसे छोटी 3-अंकीय संख्या और सबसे बड़ी 3-अंकीय संख्या ज्ञात कीजिए।)
उत्तर

पहले दोनों सिरे ज्ञात कीजिए।

सबसे छोटी: 100 ÷ 7 = 14.28…, अत: 100 या उससे ऊपर 7 का पहला गुणज 7 × 15 = 105
सबसे बड़ी: 999 ÷ 7 = 142.71…, अत: 999 या उससे नीचे अंतिम गुणज 7 × 142 = 994

ये a = 105, d = 7 वाली समानांतर श्रेढ़ी बनाते हैं, जिसका अंतिम पद 994 है।

105 + (n – 1) × 7 = 994
(n – 1) × 7 = 889
n – 1 = 127
n = 128

7 से विभाज्य 128 तीन-अंकीय संख्याएँ हैं।

ऐसा क्यों होता है: ये गुणज 7 × 15, 7 × 16, …, 7 × 142 हैं, अत: इन्हें गिनना 15 से 142 तक की पूर्ण संख्याएँ गिनना है — अर्थात 142 – 15 + 1 = 128। यह "+1" खंभे-गिनने वाला सुधार है, और वही सुधार tn = a + (n – 1)d में "– 1" के रूप में आता है। दोनों रास्तों का उत्तर एक ही आना चाहिए, और आता भी है।
संकेत: 15 से 142 तक की संख्याएँ 142 – 15 = 127 गिनने पर एक सिरा छूट जाता है। छोटे उदाहरण पर जाँचिए: 3 से 5 तक तीन संख्याएँ हैं, दो नहीं।
प्र4.
4 के कितने गुणज 10 और 250 के बीच आते हैं? (संकेत — 4 के सभी गुणज एक समानांतर श्रेढ़ी बनाते हैं। 10 और 250 के बीच आने वाले 4 के सबसे छोटे गुणज और सबसे बड़े गुणज ज्ञात कीजिए।)
उत्तर

10 और 250 के ठीक बीच आने वाले 4 के गुणज 12 से 248 तक हैं।

सबसे छोटा: 4 × 3 = 12 (क्योंकि 4 × 2 = 8, 10 से कम है)
सबसे बड़ा: 4 × 62 = 248 (क्योंकि 4 × 63 = 252, 250 से अधिक है)
12 + (n – 1) × 4 = 248
(n – 1) × 4 = 236
n – 1 = 59
n = 60

10 और 250 के बीच 4 के 60 गुणज हैं।

ऐसा क्यों होता है: पिछले प्रश्न की तरह यहाँ गुणज 4 × 3 से 4 × 62 तक हैं, अत: संख्या 62 – 3 + 1 = 60 है। ध्यान दीजिए कि 250 स्वयं 4 का गुणज नहीं है, अत: "के बीच" शब्द उस सिरे पर कोई कठिनाई नहीं देता; यदि सीमा 248 होती तो यह निर्णय करना पड़ता कि उसे सम्मिलित करें या नहीं।
प्र5.
उस गुणोत्तर श्रेढ़ी की रचना (निर्माण) कीजिए, जिसके प्रारंभिक दो पदों का योगफल –4 है और जिसका पाँचवा पद, तीसरे पद का 4 गुना है।
उत्तर

मान लीजिए श्रेढ़ी a, ar, ar2, … है। दोनों शर्तें लिखिए।

a + ar = –4, अर्थात a(1 + r) = –4  (1)
t5 = 4 t3 → ar4 = 4ar2
r2 = 4 (ar2 से भाग देकर, जो शून्य नहीं है)
r = 2 अथवा r = –2

स्थिति r = 2: a(1 + 2) = –4 से 3a = –4, अत: a = –4/3।

श्रेढ़ी: –4/3, –8/3, –16/3, –32/3, …
जाँच: –4/3 – 8/3 = –12/3 = –4; t5 = –64/3 और 4 t3 = 4 × (–16/3) = –64/3

स्थिति r = –2: a(1 – 2) = –4 से –a = –4, अत: a = 4।

श्रेढ़ी: 4, –8, 16, –32, 64, …
जाँच: 4 + (–8) = –4; t5 = 64 और 4 t3 = 4 × 16 = 64

दोनों उत्तर मान्य हैं: –4/3, –8/3, –16/3, … तथा 4, –8, 16, –32, …

ऐसा क्यों होता है: शर्त t5 = 4t3 से r2 = 4 बनता है, और वर्ग किए गए मान के दो वर्गमूल होते हैं। प्रश्न में कहीं भी ऋणात्मक सार्व अनुपात मना नहीं किया गया, अत: दोनों उत्तर देने चाहिए। ar2 से भाग देना यहाँ उचित है, क्योंकि a = 0 होने पर सभी पद 0 हो जाते और योग –4 नहीं हो सकता था।
प्र6.
100 को क्रमागत प्राकृत संख्याओं के योग के रूप में लिखने के सभी संभव विधियाँ ज्ञात कीजिए।
उत्तर

मान लीजिए योग में k पद हैं और वह a से प्रारंभ होता है। समानांतर श्रेढ़ी के योग के अनुसार, कुल योग k पदों का उनके औसत (प्रथम + अंतिम)/2 से गुणा है:

a + (a + 1) + … + (a + k – 1) = k × [2a + (k – 1)]/2 = 100
अत:   k(2a + k – 1) = 200

अब k और (2a + k – 1) दोनों 200 के गुणनखंड हैं। इनकी सम-विषमता सदैव विपरीत होती है: यदि k विषम है तो k – 1 सम है और 2a + k – 1 सम होगा, और इसके विपरीत भी। अत: एक गुणनखंड विषम होना ही चाहिए। 200 = 23 × 52 के विषम गुणनखंड 1, 5 और 25 हैं।

k2a + k – 1aमान्य?
1200100केवल संख्या 100 — यह योग नहीं है
540(40 – 4)/2 = 18हाँ
825(25 – 7)/2 = 9हाँ
258ऋणात्मकअस्वीकृत
405ऋणात्मकअस्वीकृत
2001ऋणात्मकअस्वीकृत
100 = 18 + 19 + 20 + 21 + 22
100 = 9 + 10 + 11 + 12 + 13 + 14 + 15 + 16

दोनों की जाँच: 18 + 22 = 40, और 20 औसत वाले 5 पद 100 देते हैं; 9 + 16 = 25, और 12.5 औसत वाले 8 पद 100 देते हैं। अत: ठीक दो विधियाँ हैं (यदि केवल संख्या 100 को भी गिनें तो तीन)।

ऐसा क्यों होता है: सम-विषमता वाला तर्क ही खोज को सीमित करता है। चूँकि k और 2a + k – 1 दोनों सम नहीं हो सकते, प्रत्येक मान्य k, 200 के किसी विषम गुणनखंड के साथ जुड़ता है — और 200 के केवल तीन विषम गुणनखंड हैं। इसी कारण 64 जैसी 2 की घात को क्रमागत प्राकृत संख्याओं के योग के रूप में लिखा ही नहीं जा सकता: उसका एकमात्र विषम गुणनखंड 1 है।
स्वयं जाँचिए: 18 + 19 + 20 + 21 + 22 = 100 और 9 + 10 + 11 + 12 + 13 + 14 + 15 + 16 = 100। जोड़कर देखिए।
प्र7.
किसी कल्चर (नमूने) में जीवाणुओं की संख्या प्रत्येक घंटे में दुगुनी हो जाती है। यदि प्रारंभ में कल्चर (नमूने) में 30 जीवाणु विद्यमान थे, तो दूसरे घंटे के अंत में, चौथे घंटे के अंत में और nवें घंटे के अंत में कितने जीवाणु विद्यमान होंगे?
उत्तर

प्रत्येक घंटे दुगुना होना a = 30 और r = 2 वाली गुणोत्तर श्रेढ़ी है, जिसकी गिनती घंटा 0 से होती है।

प्रारंभ (घंटा 0): 30
पहले घंटे के अंत में: 30 × 2 = 60
दूसरे घंटे के अंत में: 30 × 22 = 120
तीसरे घंटे के अंत में: 30 × 23 = 240
चौथे घंटे के अंत में: 30 × 24 = 480
nवें घंटे के अंत में: 30 × 2n
ऐसा क्यों होता है: घातांक यह गिनता है कि कितनी बार दुगुना हुआ है, और n घंटों के बाद ठीक n बार दुगुना हुआ है — अत: घातांक n है, n – 1 नहीं। tn = arn–1 में n – 1 केवल इसलिए आता है कि वहाँ प्रथम पद को n = 1 कहा जाता है; यहाँ प्रारंभिक संख्या को घंटा 0 कहा गया है। घातांक को उठाए गए वास्तविक कदमों से मिलाइए, तो यह कभी ग़लत नहीं होगा।
क्या आप जानते हैं? इस दर पर एक दिन में 224 बार दुगुना होगा — 30 जीवाणु बढ़कर 30 × 1,67,77,216 अर्थात पचास करोड़ से अधिक हो जाएँगे।
प्र8.
किसी समानांतर श्रेढ़ी के चौथे और आठवें पदों का योगफल 24 है और छठे और दसवें पदों का योगफल 44 है। समानांतर श्रेढ़ी के पहले तीन पद ज्ञात कीजिए।
उत्तर

प्रत्येक पद को a + (n – 1)d के रूप में लिखकर जोड़िए।

t4 + t8 = (a + 3d) + (a + 7d) = 2a + 10d = 24 → a + 5d = 12  (1)
t6 + t10 = (a + 5d) + (a + 9d) = 2a + 14d = 44 → a + 7d = 22  (2)
(2) – (1): 2d = 10, अत: d = 5
(1) से: a + 25 = 12, अत: a = –13

पहले तीन पद हैं –13, –8, –3

जाँच: t4 = –13 + 15 = 2 और t8 = –13 + 35 = 22, योग 24; t6 = –13 + 25 = 12 और t10 = –13 + 45 = 32, योग 44।

ऐसा क्यों होता है: दोनों समीकरणों को प्रारंभ में ही 2 से भाग देना लाभदायक है — 2a + 10d = 24 से a + 5d = 12 बनता है, जो वास्तव में t6 = 12 ही है। किसी मध्य पद के दोनों ओर समान दूरी पर स्थित दो पदों का योग सदैव उस मध्य पद का दुगुना होता है, अत: दोनों शर्तें सीधे t6 = 12 और t8 = 22 कहती हैं, और d = (22 – 12)/2 = 5 एक ही पंक्ति में मिल जाता है।
प्र9.
n का वह न्यूनतम मान ज्ञात कीजिए, जिससे प्रथम n प्राकृत संख्याओं का योगफल 1,000 से अधिक हो।
उत्तर

आवश्यक है Sn = n(n + 1)/2 > 1000, अर्थात n(n + 1) > 2000।

n = 44: 44 × 45 = 1980, जो 2000 से अधिक नहीं है → S44 = 990
n = 45: 45 × 46 = 2070, जो 2000 से अधिक है → S45 = 1035

अत: न्यूनतम मान n = 45 है, जिससे S45 = 1035 > 1000 होता है, जबकि S44 = 990 < 1000 है।

ऐसा क्यों होता है: Sn लगभग n2/2 है, अत: n2 को 2000 के आसपास और n को √2000 ≈ 44.7 के आसपास होना चाहिए। यह अनुमान बताता है कि कहाँ देखना है; निर्णय n = 44 और n = 45 की दो सटीक जाँचों से होता है। "न्यूनतम n" वाले प्रश्न में उससे एक कम मान का विफल होना दिखाना अनिवार्य है — अन्यथा न्यूनतम होना सिद्ध नहीं हुआ।
प्र10.
गुणोत्तर श्रेढ़ी 2, 8, 32, ... का कौन-सा पद 131072 है? nवें पद के लिए व्यापक सूत्र और पुनरावर्ती सूत्र भी लिखिए।
उत्तर

a = 2 और r = 8 ÷ 2 = 4 (तथा 32 ÷ 8 = 4)।

व्यापक सूत्र: tn = 2 × 4n–1
पुनरावर्ती सूत्र: t1 = 2, tn = 4 × tn–1, जहाँ n ≥ 2

सब कुछ 2 की घातों में बदलकर tn = 131072 हल कीजिए:

2 × 4n–1 = 131072
4n–1 = 65536
4n–1 = 22(n–1) और 65536 = 216
2(n – 1) = 16
n – 1 = 8
n = 9

अत: 131072 इस श्रेढ़ी का 9वाँ पद है। जाँच: 2 × 48 = 2 × 65536 = 131072।

ऐसा क्यों होता है: 2 और 4 दोनों एक ही आधार की घातें हैं, अत: समीकरण को 2 के घातांकों के मिलान तक घटाया जा सकता है — इस कदम से अनुमान की आवश्यकता ही नहीं रहती। यदि संख्याओं का आधार एक न होता तो पद एक-एक करके बनाने पड़ते: 2, 8, 32, 128, 512, 2048, 8192, 32768, 131072 — नौवाँ पद।
प्र11.
एक गुणोत्तर श्रेढ़ी के प्रथम तीन पदों का योगफल 13/12 है और उनका गुणनफल –1 है। श्रेढ़ी का सार्व अनुपात और पद ज्ञात कीजिए।
उत्तर

तीनों पदों को a/r, a, ar लेने पर गुणनफल सरल हो जाता है।

गुणनफल: (a/r) × a × (ar) = a3 = –1
a = –1

अब योग का उपयोग कीजिए:

–1/r – 1 – r = 13/12
–(1/r + r) = 13/12 + 1 = 25/12
1/r + r = –25/12
12r से गुणा करने पर: 12 + 12r2 = –25r
12r2 + 25r + 12 = 0

गुणनखंड कीजिए: 12r2 + 16r + 9r + 12 = 4r(3r + 4) + 3(3r + 4) = (3r + 4)(4r + 3)।

r = –4/3   अथवा   r = –3/4

a = –1 और r = –3/4 लेने पर तीनों पद a/r = 4/3, a = –1, ar = 3/4 हैं:

4/3, –1, 3/4
योग = 16/12 – 12/12 + 9/12 = 13/12
गुणनफल = (4/3) × (–1) × (3/4) = –1

दूसरा मूल r = –4/3 वही तीन संख्याएँ उल्टे क्रम में देता है: 3/4, –1, 4/3

ऐसा क्यों होता है: पदों को a/r, a, ar लिखने से मध्य पद केंद्र में आ जाता है, अत: गुणनफल में r निरस्त हो जाता है और एक अज्ञात तुरंत समाप्त हो जाता है। दोनों मूल एक-दूसरे के व्युत्क्रम हैं, क्योंकि गुणोत्तर श्रेढ़ी को उल्टा करने पर r के स्थान पर 1/r आ जाता है — ये दो भिन्न श्रेढ़ियाँ नहीं, एक ही श्रेढ़ी को पढ़ने के दो तरीके हैं।
संकेत: गुणनफल ऋणात्मक होने से ऋणात्मक पदों की संख्या विषम होनी चाहिए। r ऋणात्मक होने पर मध्य पद ही ऋणात्मक है — a = –1 ठीक यही कह रहा है।
प्र12.
यदि किसी गुणोत्तर श्रेढ़ी का चौथा, दसवाँ और सोलहवाँ पद क्रमश: x, y और z है। सिद्ध कीजिए कि x, y, z गुणोत्तर श्रेढ़ी में हैं।
उत्तर

मान लीजिए गुणोत्तर श्रेढ़ी का प्रथम पद a और सार्व अनुपात r है।

x = t4 = ar3
y = t10 = ar9
z = t16 = ar15

अब x, y, z के क्रमागत युग्मों के अनुपातों की तुलना कीजिए:

y/x = ar9 ÷ ar3 = r6
z/y = ar15 ÷ ar9 = r6
अत: y/x = z/y = r6

क्रमागत पदों का अनुपात एक ही अचर है, अत: x, y, z गुणोत्तर श्रेढ़ी में हैं, जिसका सार्व अनुपात r6 है। समतुल्य रूप में y2 = a2r18 = (ar3)(ar15) = xz, जो यही कथन है।

ऐसा क्यों होता है: स्थितियाँ 4, 10, 16 स्वयं समान दूरी पर हैं — वे सार्व अंतर 6 वाली समानांतर श्रेढ़ी बनाती हैं। किसी गुणोत्तर श्रेढ़ी में से समान दूरी पर पद चुनने से सदैव गुणोत्तर श्रेढ़ी ही बचती है, क्योंकि 6 स्थान आगे बढ़ने पर हर बार r6 से गुणा होता है। यह समानांतर श्रेढ़ी के परिचित तथ्य का गुणात्मक जोड़ीदार है: समानांतर श्रेढ़ी के समान दूरी वाले पद भी समानांतर श्रेढ़ी बनाते हैं।
संकेत: उपपत्ति में "अनुपात समान लगते हैं" कहकर रुकिए मत। दोनों अनुपात परिभाषा से निकालिए और दिखाइए कि वे एक ही व्यंजक हैं — यही उसे उपपत्ति बनाता है।
प्र13.
एक गुणोत्तर श्रेढ़ी के प्रथम तीन पदों का योगफल 26 है और उन पदों के वर्गों का योगफल 364 है। गुणोत्तर श्रेढ़ी के पदों को ज्ञात कीजिए।
उत्तर

मान लीजिए पद a, ar, ar2 हैं।

a(1 + r + r2) = 26  (1)
a2(1 + r2 + r4) = 364  (2)

मुख्य बात सर्वसमिका 1 + r2 + r4 = (1 + r + r2)(1 – r + r2) है। इसे (2) में रखिए:

a(1 + r + r2) × a(1 – r + r2) = 364
26 × a(1 – r + r2) = 364
a(1 – r + r2) = 14  (3)

अब (1) में से (3) घटाइए, फिर दोनों जोड़िए:

(1) – (3): 2ar = 12 → ar = 6
(1) + (3): 2a(1 + r2) = 40 → a + ar2 = 20

a + ar2 = 20 में a = 6/r रखिए:

6/r + 6r = 20
6 + 6r2 = 20r
3r2 – 10r + 3 = 0
(3r – 1)(r – 3) = 0
r = 3 अथवा r = 1/3

r = 3 और ar = 6 से a = 2 मिलता है, अत: पद 2, 6, 18 हैं। r = 1/3 लेने पर वही पद उल्टे क्रम में 18, 6, 2 मिलते हैं।

जाँच: 2 + 6 + 18 = 26
4 + 36 + 324 = 364
ऐसा क्यों होता है: सार्व अनुपात r वाली गुणोत्तर श्रेढ़ी के पदों का वर्ग करने पर सार्व अनुपात r2 वाली गुणोत्तर श्रेढ़ी मिलती है, इसीलिए दूसरी शर्त में 1 + r2 + r4 आता है। गुणनखंडन 1 + r2 + r4 = (1 + r + r2)(1 – r + r2) — अध्याय 4 में मिली सर्वसमिकाओं जैसा — समीकरण (2) को समीकरण (1) से भाग देने योग्य बना देता है और एक ही कदम में घात चार से घात दो पर ले आता है।
प्र14.
मान लीजिए कि P1 = 1, P2 = 2 है और n > 2 के लिए Pn = P1 + P2 + ... Pn–1 + 1 है। P1, P2, …, P8 के मान ज्ञात कीजिए। क्या आप Pn के लिए एक अधिक सरल पुनरावर्ती सूत्र ज्ञात कर सकते हैं? क्या आप एक व्यापक सूत्र बता सकते हैं?
उत्तर

प्रत्येक पद अपने से पहले के सभी पदों के योग से 1 अधिक है।

P1 = 1, P2 = 2
P3 = 1 + 2 + 1 = 4
P4 = 1 + 2 + 4 + 1 = 8
P5 = 1 + 2 + 4 + 8 + 1 = 16
P6 = 1 + 2 + 4 + 8 + 16 + 1 = 32
P7 = 64    P8 = 128

अत: मान हैं 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64, 128

अधिक सरल पुनरावर्ती सूत्र। n > 3 के लिए दो क्रमागत पदों की तुलना कीजिए:

Pn = (P1 + … + Pn–2 + Pn–1) + 1
Pn–1 = (P1 + … + Pn–2) + 1
घटाने पर: Pn – Pn–1 = Pn–1
अत:   Pn = 2 Pn–1

यह n = 3 पर भी सही है, क्योंकि P3 = 4 = 2 × 2 = 2P2। अत: P1 = 1, Pn = 2Pn–1, n ≥ 2 — यह a = 1 और r = 2 वाली गुणोत्तर श्रेढ़ी है।

व्यापक सूत्र: Pn = 2n–1
जाँच: P1 = 20 = 1, P5 = 24 = 16, P8 = 27 = 128
ऐसा क्यों होता है: जैसा सूत्र छपा है, उसमें प्रत्येक पिछला पद जोड़ना पड़ता है, अत: P20 निकालने में उन्नीस जोड़ लगते। सूत्र के दो क्रमागत कथनों को घटाने से वह पूरा लंबा योग एक ही बार में निरस्त हो जाता है और केवल दो पदों का संबंध बचता है। इसके पीछे 2 की घातों का एक सुंदर तथ्य है: 1 + 2 + 4 + … + 2k = 2k+1 – 1, अत: उस योग में 1 जोड़ने पर ठीक अगली घात मिल जाती है।
संकेत: "अधिक सरल पुनरावर्ती सूत्र ज्ञात कीजिए" का अर्थ है सूत्र को एक कदम आगे लिखकर उसी में से घटा दीजिए। जहाँ भी सूत्र में क्रमिक योग हो, यह युक्ति काम करती है।
प्र15.
मान लीजिए W1 = 1, W2 = 2 और n > 2 के लिए Wn = W1 + W2 + ... + Wn–2 + 2 है। W1, W2, ..., W8 के मान ज्ञात कीजिए। क्या आप इस अनुक्रम को पहचानते हैं?
उत्तर

ध्यान दीजिए कि यह योग Wn–2 पर रुकता है, Wn–1 पर नहीं — ठीक पिछला पद छूट जाता है।

W1 = 1, W2 = 2
W3 = W1 + 2 = 1 + 2 = 3
W4 = W1 + W2 + 2 = 1 + 2 + 2 = 5
W5 = 1 + 2 + 3 + 2 = 8
W6 = 1 + 2 + 3 + 5 + 2 = 13
W7 = 1 + 2 + 3 + 5 + 8 + 2 = 21
W8 = 1 + 2 + 3 + 5 + 8 + 13 + 2 = 34

अनुक्रम है 1, 2, 3, 5, 8, 13, 21, 34 — अर्थात विरहांक-फिबोनाची अनुक्रम

यह केवल पहचान नहीं, कारण भी है। सूत्र को n पर लिखिए और उसमें से n – 1 वाला कथन घटाइए:

Wn = (W1 + … + Wn–3 + Wn–2) + 2
Wn–1 = (W1 + … + Wn–3) + 2
घटाने पर: Wn – Wn–1 = Wn–2
अर्थात   Wn = Wn–1 + Wn–2

W1 = 1 और W2 = 2 के साथ यह ठीक पृष्ठ 179 वाला सूत्र Vn = Vn–1 + Vn–2 है, अत: दोनों अनुक्रम एक ही हैं।

ऐसा क्यों होता है: योग को एक के स्थान पर दो पद पीछे रोक देने से ही विरहांक नियम उत्पन्न होता है। पिछले प्रश्न वाली घटाने की युक्ति यहाँ भी सभी पूर्व पदों वाले सूत्र को केवल दो पदों वाले सूत्र में बदल देती है — और यह दिखाती है कि एक ही अनुक्रम को एक से अधिक प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है। आठ पद देखकर उत्तर का अनुमान होता है; घटाने वाली उपपत्ति उसे प्रत्येक n के लिए सिद्ध कर देती है।
क्या आप जानते हैं? इसके पीछे सर्वसमिका 1 + 2 + 3 + 5 + … + Vn–2 + 2 = Vn है: विरहांक संख्याओं का किसी पद तक का योग, और 2, मिलकर दो स्थान आगे वाला पद बना देते हैं।
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