कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 1 अन्वयः के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
परिशिष्टम् १ ‘अन्वयः’ में क्या है, और इसमें अभ्यास क्यों नहीं है?
उत्तर

सीधा उत्तर — पृष्ठ 161 से 166 तक शारदा केवल यह सिखाती है कि श्लोक के पदों को गद्य-क्रम में कैसे जमाया जाए। यह पाठ नहीं, परिशिष्ट है — इसमें न कथा है, न कवि-परिचय, न ‘अभ्यासाद् जायते सिद्धिः’ जैसा प्रश्न-खण्ड। जो दो तालिकाएँ यहाँ छपी हैं, वे भी दोनों ओर से पूरी भरी हुई हैं — प्रश्न भी छपे हैं, उत्तर भी। इसलिए यहाँ उत्तर लुप्त नहीं हैं, प्रश्न ही नहीं हैं

पुस्तक स्वयं क्या कहती है — तीनों प्रारम्भिक परिशिष्टों के अन्त में (पृष्ठ 183) पुस्तक लिखती है — ‘अस्मिन् परिशिष्टत्रये श्लोकानाम् अन्वयक्रमाः समासाः प्रयोगाश्च इत्येते विचाराः सामान्यतया प्रदर्शिताः सन्ति। छात्राः विस्तृताध्ययनार्थम् अन्यान् ग्रन्थान् परिशीलयेयुः।’ अर्थात् परिशिष्ट केवल सामान्य दिशा दिखाते हैं; विस्तार के लिए व्याकरण-ग्रन्थ देखने चाहिए।

छह पृष्ठों में क्या-क्या है —

पृष्ठविषयरूप
161अन्वय की आवश्यकता · श्लोकान्वयविधि का विभाजन (दण्डान्वय / खण्डान्वय) · दण्डान्वय का स्मृति-श्लोक तथा उसके नियमगद्य + चित्र-रेखाचित्र
162‘शास्त्राण्यधीत्यापि…’ श्लोक — पदच्छेदः, दण्डान्वयः, विवरणम् (अध्याहार)साधित उदाहरण
163उन्नीस पदों को संख्या देकर क्रमशः योजनम् · खण्डान्वय के दो स्मृति-श्लोक · आकाङ्क्षासूची + पद्य + गद्य
164योग्यता · आसत्तिः · तात्पर्यम् — तीनों उदाहरण-सहितगद्य
165प्रश्न पूछने का क्रम · ‘सम्पूर्णकुम्भो न करोति…’ श्लोक, पदच्छेदः तथा खण्डान्वय-तालिका का पहला भागगद्य + तालिका
166तालिका का शेष भाग तथा पूरा अन्वयःतालिका
यह परिशिष्ट सबसे पहले क्यों रखा गया: शारदा के लगभग हर पाठ में श्लोक हैं, और हर पाठ में ‘श्लोकस्य अन्वयं कुरुत / भावं लिखत’ जैसा काम आता है। अन्वय किए बिना अर्थ नहीं निकलता, और अर्थ के बिना भाव नहीं लिखा जा सकता। इसलिए यही कौशल पाँचों परिशिष्टों में पहला है — समास, वाच्य, शब्दरूप और धातुरूप उसके बाद आते हैं।
प्र२.
‘अन्वय’ की आवश्यकता क्यों पड़ती है — श्लोक में पदों का क्रम उलटा-पुलटा क्यों होता है?
उत्तर

कारण एक ही है — छन्द। पुस्तक का पहला ही वाक्य यह कहता है :

सामान्यतः श्लोकेषु कर्तृपदं कर्मपदं तृतीयादिविभक्त्यन्तं पदं क्रियापदं विशेषणादिकं च छन्दसः अनुगुणं पूर्वापरं भवितुमर्हति।
(हिन्दी — साधारणतः श्लोकों में कर्ता, कर्म, तृतीया आदि विभक्ति वाले पद, क्रिया और विशेषण आदि छन्द के अनुसार आगे-पीछे हो जाते हैं।)

गद्य में हम लिखते हैं — सम्पूर्णकुम्भः शब्दं न करोति (कर्ता → कर्म → क्रिया)। पर श्लोक में वही बात मात्राएँ मिलाने के लिए ऐसे छपती है — सम्पूर्णकुम्भो न करोति शब्दम्। पद वही हैं, क्रम बदल गया है। इसी बदले हुए क्रम को फिर से सीधा करना अन्वय है।

पुस्तक आगे कहती है — ‘तेन पठितारः पदानां मध्ये परस्परं सम्बन्धं (अन्वयं) कल्पयितुं कदाचित् कष्टम् अनुभवन्ति। अतः श्लोकेषु विद्यमानानां पदानां परस्परं सम्बन्धं सरलरूपेण ज्ञातुं कश्चन क्रमः ज्ञातव्यः। तदनन्तरमेव श्लोकस्य अर्थम् अवगन्तुं शक्यते।’ — अर्थात् क्रम जान लेने के बाद ही श्लोक का अर्थ समझा जा सकता है।

ध्यान दें: अन्वय अनुवाद नहीं है। अन्वय में एक भी शब्द बदलता नहीं, केवल क्रम बदलता है (और आवश्यकता हो तो कोष्ठक में एक-दो पद जोड़े जाते हैं)। इसीलिए अन्वय संस्कृत में ही लिखा जाता है, हिन्दी में नहीं।
प्र३.
श्लोकान्वयविधि के कितने भेद हैं — पुस्तक का रेखाचित्र क्या दिखाता है?
उत्तर

दो भेद हैं। पृष्ठ 161 पर पुस्तक एक रेखाचित्र देती है :

श्लोकान्वयविधिः
↙          ↘
१. दण्डान्वयविधिः      २. खण्डान्वयविधिः

और नीचे लिखती है — ‘एतयोः विध्योः ज्ञानेन छात्राः श्लोके विद्यमानानां पदानां सम्बन्धं ज्ञात्वा श्लोकस्य अर्थं भावं च अवगन्तुं शक्नुवन्ति।’ अर्थात् इन दोनों विधियों को जान लेने से छात्र श्लोक का अर्थ भी समझ पाते हैं और भाव भी।

तुलनादण्डान्वयविधिःखण्डान्वयविधिः
नाम का अर्थदण्डवत् (लाठी की तरह सीधा) अन्वयःखण्डशः (टुकड़े-टुकड़े) अन्वयः
कार्य-प्रणालीपूरा श्लोक एक ही बार में क्रम से लिख देनाएक-एक प्रश्न पूछकर एक-एक पद जोड़ना
किसके लिएस्वयं लिखते समय, उत्तर-पुस्तिका मेंकक्षा में, शिक्षक-छात्र संवाद में
दूसरा नामआकाङ्क्षाविधिः
परिणामतैयार अन्वय‘अन्ते समग्रस्य श्लोकस्य अन्वयः स्वयमेव भविष्यति’
दोनों में विरोध नहीं है: खण्डान्वय अन्वय तक पहुँचने का रास्ता है, दण्डान्वय उस अन्वय को लिखने का ढंग। परीक्षा में प्रायः दण्डान्वय ही लिखा जाता है, पर वहाँ तक पहुँचने के लिए मन-ही-मन खण्डान्वय के प्रश्न पूछने पड़ते हैं।
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट १ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं। पहले स्वयं लिखिए, फिर उत्तर देखिए।
  1. ‘अन्वय’ शब्द का शाब्दिक अर्थ लिखिए तथा बताइए कि श्लोक में उसकी आवश्यकता क्यों पड़ती है।
    उत्तर — अनु + अय् (जाना) = पीछे-पीछे चलना, अर्थात् पदों का परस्पर सम्बन्ध जोड़कर उन्हें अर्थ के क्रम में लगाना। श्लोक में पदों का क्रम छन्दसः अनुगुणम् (छन्द के अनुसार) होता है, अर्थ के अनुसार नहीं — इसलिए क्रम को सीधा करना पड़ता है।
  2. ‘दण्डान्वयः’ तथा ‘खण्डान्वयः’ — इन नामों की व्युत्पत्ति लिखिए।
    उत्तर — दण्डवत् अन्वयः = दण्डान्वयः; खण्डशः अन्वयः = खण्डान्वयः। (दोनों व्युत्पत्तियाँ पुस्तक ने स्वयं दी हैं।)
  3. सत्यम्/असत्यम् — ‘अन्वय करते समय श्लोक के शब्द बदल दिए जाते हैं।’
    उत्तर — असत्यम्। केवल क्रम बदलता है; आवश्यकता पड़ने पर अध्याहार से कोष्ठक में पद जोड़ा जा सकता है, शब्द बदले नहीं जाते।
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