कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 1 दण्डान्वयविधिः के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
दण्डान्वय किसे कहते हैं, और पुस्तक ने उसका नियम किस श्लोक में दिया है?
उत्तर

परिभाषा — पुस्तक कोष्ठक में स्वयं व्युत्पत्ति देती है — दण्डान्वयः (दण्डवत् अन्वयः दण्डान्वयः)। दण्ड अर्थात् लाठी — जैसे लाठी सीधी होती है, वैसे ही इसमें पूरे श्लोक के पद एक ही सीधे क्रम में, आरम्भ से अन्त तक जमा दिए जाते हैं। बीच में कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता।

नियम-श्लोक (पृष्ठ 161, लाल अक्षरों में छपा) —

आद्ये विशेषणं योज्यं विशेष्यं तदनन्तरम् ।
क्त्वा-णमुल्-ल्यप्-प्रभृत्येवं पूर्वं दण्डान्वये भवेत् ॥

पद-वार अर्थ —

पदअर्थव्यवहार में
आद्ये विशेषणं योज्यम्सबसे पहले विशेषण जोड़ना चाहिएअर्धः … (पहले)
विशेष्यं तदनन्तरम्विशेष्य उसके बाद… घटः (बाद में) → अर्धः घटः
क्त्वा-णमुल्-ल्यप्-प्रभृतिक्त्वा (गत्वा), णमुल् (स्मारं स्मारम्), ल्यप् (आगत्य) आदि प्रत्ययान्त अव्यय-कृदन्तअधीत्य, कृत्वा, विहाय
एवं पूर्वं दण्डान्वये भवेत्ये सब दण्डान्वय में (अपनी मुख्य क्रिया से) पहले आने चाहिएशास्त्राणि अधीत्य अपि मूर्खाः भवन्ति — ‘अधीत्य’ ‘भवन्ति’ से पहले
क्त्वा, ल्यप्, णमुल् पहले क्यों: ये तीनों पूर्वकालिक क्रिया बताते हैं — जो काम पहले हुआ। ‘पढ़कर भी मूर्ख रह जाते हैं’ में पढ़ना पहले हुआ, मूर्ख रहना बाद में। इसलिए भाषा का स्वाभाविक क्रम भी यही है, और नियम भी यही कहता है। (उपसर्ग-रहित धातु में क्त्वा लगता है — गत्वा, कृत्वा; उपसर्ग-सहित में ल्यप् — आगत्य, अधीत्य, विहाय; बार-बार होने वाले काम में णमुल् — स्मारं स्मारम्।)
प्र२.
दण्डान्वय करने की पूरी विधि क्या है — पुस्तक के गद्य-नियम क्रम से लिखिए।
उत्तर

पृष्ठ 161 के गद्य में पुस्तक जो कहती है, वह चरणों में यह है :

१. ‘कर्तृपदं कर्मपदं क्रियापदं चेति प्राथमिकी वाक्यरचनाशैली वर्तते।’ — मूल साँचा है : कर्ता → कर्म → क्रिया
२. ‘अस्मिन् अन्वयक्रमे विशेषणानि क्रमशः तत्तत्पदस्य पूर्वं प्रयुक्तानि भवन्ति।’ — हर विशेषण अपने विशेष्य से ठीक पहले।
३. ‘कर्तृपदस्य विशेषणं कर्तृपदात् पूर्वं, कर्मपदस्य विशेषणं कर्मपदात् पूर्वम्।’ — कर्ता का विशेषण कर्ता से पहले, कर्म का विशेषण कर्म से पहले।
४. ‘यदि श्लोकेषु अव्ययानि कृदन्तपदानि वा सन्ति तर्हि तानि केन पदेन सह सम्बद्धानि इति ज्ञात्वा तत्र प्रयोक्तव्यानि।’ — अव्यय और कृदन्त वहीं रखिए जिस पद से वे जुड़े हैं।
५. ‘तृतीयादीनि विभक्त्यन्तानि पदानि अपि … पूर्वं वा परं वा योजनीयानि।’ — तृतीया से लेकर सप्तमी तक के पद, जिस पद से सम्बद्ध हों, उसके आगे या पीछे।
६. ‘ततः परं सर्वान्ते क्रियापदं लिखेत्।’ — सबसे अन्त में क्रियापद।
७. ‘कदाचित् कर्तृपदं क्रियापदं वा श्लोकेषु न दृश्यते तदा अस्माभिः विचिन्त्य तत् पदं योजनीयम्।’ — कर्ता या क्रिया न दिखे तो सोचकर स्वयं जोड़िए (अध्याहार)।

एक पंक्ति में साँचा —

(अध्याहृत पद) → कर्ता का विशेषण → कर्ता → तृतीयादि पद → क्त्वान्त/ल्यबन्त → कर्म का विशेषण → कर्म → अव्यय (न, अपि, तु, नूनम्) → क्रिया

उसी साँचे पर एक उदाहरण — श्लोक-पंक्ति ‘सम्पूर्णकुम्भो न करोति शब्दम्’ → अन्वय सम्पूर्णकुम्भः (कर्ता) शब्दं (कर्म) न करोति (निषेध-अव्यय + क्रिया)।

छोटी-सी सावधानी: ‘न’ को क्रिया से अलग मत कीजिए। ‘न’ जिस क्रिया का निषेध करता है, उसी के ठीक पहले रहता है — शब्दं न करोति, न कि ‘न शब्दं करोति’।
प्र३.
अध्याहार क्या है — श्लोक में जो पद छपा ही नहीं, उसे जोड़ना उचित कैसे?
उत्तर

परिभाषा — श्लोक में कभी कर्ता या क्रिया छपती ही नहीं, पर उसके बिना वाक्य अधूरा रहता है। तब पाठक जो पद स्वयं जोड़ता है, वह अध्याहार कहलाता है; पुस्तक उस छिपे पद को ‘सुप्तं पदम्’ (सोया हुआ पद) कहती है और लिखती है — ‘अतः अस्माभिः सुप्तं पदम् योजनीयम् (अध्याहार्यम्)।’

पुस्तक का अपना उदाहरण (पृष्ठ 162, ‘विवरणम्’) —

श्लोक में जो छपा हैजो जिज्ञासा उठती हैअध्याहृत पद
शास्त्राणि अधीत्यापि मूर्खाः भवन्ति‘शास्त्राणि अधीत्यापि के मूर्खाः भवन्ति ?’ — कौन?(केचन) — कुछ लोग
यस्तु क्रियावान् पुरुषस्स विद्वान्‘क्रियापदं किमपि न प्रयुक्तम्’ — क्रिया है ही नहीं(भवति)
सुचिन्तितं चौषधमातुराणां…यह वाक्य पिछले वाक्य का दृष्टान्त है — जोड़ने वाला शब्द चाहिए(यथा) — जैसे

पुस्तक का तर्क, उसी के शब्दों में — ‘तस्य उत्तरं यदि श्लोके विद्यते तर्हि तत् पदं पूर्वं स्थापनीयम्। परम् अस्मिन् श्लोके तु तत् पदं न प्रयुक्तम्। अतः अस्माभिः सुप्तं पदम् योजनीयम्।’ अर्थात् — पहले श्लोक में उत्तर ढूँढ़िए; न मिले, तभी बाहर से जोड़िए।

यह मनमानी क्यों नहीं है: तीन बन्धन हैं — (क) अध्याहृत पद वही हो सकता है जो व्याकरण से मेल खाए (‘मूर्खाः भवन्ति’ बहुवचन है, इसलिए ‘केचन’ ठीक है, ‘कश्चन’ नहीं); (ख) वह अर्थ की माँग से आया हो, सजावट के लिए नहीं; (ग) वह कोष्ठक में लिखा जाए, ताकि पाठक जान ले कि यह श्लोक का पद नहीं है। तीनों बातें पुस्तक ने अपने उदाहरण में निभाई हैं।
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं — परिशिष्ट पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए हैं।
  1. ‘आद्ये विशेषणं योज्यं विशेष्यं तदनन्तरम्’ — इस नियम से इन जोड़ों को सजाइए : (क) घटः, अर्धः (ख) विद्वान्, कुलीनः (ग) जनः, अल्पः।
    उत्तर — (क) अर्धः घटः (ख) कुलीनः विद्वान् (ग) अल्पः जनः। — तीनों में विशेषण पहले, विशेष्य बाद में।
  2. ‘बालकः विद्यालयं गत्वा पठति’ — इसमें क्त्वान्त पद कौन-सा है और वह क्रिया के पहले क्यों है?
    उत्तर — क्त्वान्त पद ‘गत्वा’ है। वह पूर्वकालिक क्रिया बताता है — जाना पहले हुआ, पढ़ना बाद में — इसलिए नियम के अनुसार वह मुख्य क्रिया ‘पठति’ से पूर्व रखा जाता है।
  3. निम्न वाक्य में कौन-सा पद अध्याहार्य है — ‘सत्यं वद, धर्मं चर।’ (कर्ता कौन?)
    उत्तर — (त्वम्) — ‘वद’ तथा ‘चर’ मध्यमपुरुष एकवचन लोट् लकार के रूप हैं, अतः कर्ता ‘त्वम्’ अध्याहृत है : (त्वम्) सत्यं वद, (त्वम्) धर्मं चर।
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