परिभाषा — पुस्तक कोष्ठक में स्वयं व्युत्पत्ति देती है — दण्डान्वयः (दण्डवत् अन्वयः दण्डान्वयः)। दण्ड अर्थात् लाठी — जैसे लाठी सीधी होती है, वैसे ही इसमें पूरे श्लोक के पद एक ही सीधे क्रम में, आरम्भ से अन्त तक जमा दिए जाते हैं। बीच में कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता।
नियम-श्लोक (पृष्ठ 161, लाल अक्षरों में छपा) —
क्त्वा-णमुल्-ल्यप्-प्रभृत्येवं पूर्वं दण्डान्वये भवेत् ॥
पद-वार अर्थ —
| पद | अर्थ | व्यवहार में |
|---|---|---|
| आद्ये विशेषणं योज्यम् | सबसे पहले विशेषण जोड़ना चाहिए | अर्धः … (पहले) |
| विशेष्यं तदनन्तरम् | विशेष्य उसके बाद | … घटः (बाद में) → अर्धः घटः |
| क्त्वा-णमुल्-ल्यप्-प्रभृति | क्त्वा (गत्वा), णमुल् (स्मारं स्मारम्), ल्यप् (आगत्य) आदि प्रत्ययान्त अव्यय-कृदन्त | अधीत्य, कृत्वा, विहाय |
| एवं पूर्वं दण्डान्वये भवेत् | ये सब दण्डान्वय में (अपनी मुख्य क्रिया से) पहले आने चाहिए | शास्त्राणि अधीत्य अपि मूर्खाः भवन्ति — ‘अधीत्य’ ‘भवन्ति’ से पहले |