प्र1.
आपने देखा होगा कि नारियल के रेशे के तंतु कठोर और भंगुर होते हैं जबकि धनिए के पर्णवृंत नरम और लचीले होते हैं। कारण जानने का प्रयास कीजिए।
उत्तर
दोनों में ऊतक भिन्न है — नारियल का रेशा दृढ़ोतक है, जबकि धनिए का पर्णवृंत श्लेषोतक (और मृदूतक) है।
| नारियल के रेशे का तंतु | धनिए का पर्णवृंत | |
|---|---|---|
| ऊतक | दृढ़ोतक | श्लेषोतक + मृदूतक |
| भित्ति | समान रूप से मोटी, लिग्निन का भारी निक्षेपण | पतली, केवल कोनों पर पेक्टिन से स्थूलित |
| सजीव? | परिपक्वता पर अधिकांशतः मृत | सजीव, कोशिकाद्रव्य और रसधानी सहित |
| व्यवहार | कठोर, सुदृढ़, भंगुर — खिंचाव सहता है किंतु अधिक मोड़ने पर टूट जाता है | नरम, लचीला — मुड़ता है और पुनः सीधा हो जाता है |
रसायन ही स्पर्श तय करता है: लिग्निन एक दृढ़, जल-अपारगम्य बहुलक है जो भित्ति के सेल्युलोस तंतुओं को अपने स्थान पर जड़ देता है। एक बार निक्षेपित हो जाने पर भित्ति खिंच नहीं सकती, कोशिका मर जाती है और तंतु कठोर तथा भंगुर हो जाता है। इसके विपरीत पेक्टिन मृदु और जेल जैसा है — पुस्तक उसकी तुलना रबर से करती है — अतः श्लेषोतक की भित्ति विरूपित होकर पुनः पूर्वरूप में आ जाती है। लिग्निन का निक्षेप कीजिए तो कॉयर की चटाई मिलेगी; पेक्टिन का कीजिए तो हवा में झूमने वाला पर्णवृंत।
क्या आप जानते हैं? इसी कारण कॉयर से रस्सी, चटाई और गद्दे बनाए जाते हैं — वह मृत, लिग्निनयुक्त, सड़न-रोधी है और अपना आकार बनाए रखता है; जबकि धनिए का डंठल तोड़ने के कुछ ही घंटों में मुरझा जाता है, क्योंकि उसका अवलंब सजीव, स्फीत कोशिकाओं पर निर्भर था।