क्योंकि उपत्वचा जल और गैसों — दोनों की गति रोकती है। मरुस्थलीय पादप को यह रोक चाहिए, जबकि जलमग्न पादप के लिए यही रोक घातक है।
मरुस्थल में। वहाँ जल ही सीमित कारक है। मोटी मोमी उपत्वचा —
- बाह्यत्वचा की सतह से वाष्पन घटा देती है, अतः वाष्पोत्सर्जन लगभग पूरी तरह रंध्रों तक सीमित रह जाता है, जिन्हें पादप बंद कर सकता है;
- कुछ सूर्य-प्रकाश परावर्तित करके तापन कम करती है;
- उड़ती बालू से होने वाले घर्षण और परजीवियों से रक्षा करती है।
जल के भीतर। वहाँ जल की कमी है ही नहीं, अतः बचाने को कुछ नहीं — और उपत्वचा अब केवल हानि करती है —
- जलमग्न पादप जल, खनिज तथा घुली CO₂ और O₂ को अपनी पूरी सतह से सीधे अवशोषित करता है, क्योंकि जड़ से पत्ती तक की धारा चलाने वाला वाष्पोत्सर्जन अभिकर्ष वहाँ है ही नहीं। जल-अपारगम्य उपत्वचा इस पूरे अवशोषी क्षेत्र को बंद कर देती।
- गैसें जल में वायु की तुलना में हजारों गुना धीमे विसरित होती हैं, अतः पादप पहले ही CO₂ और O₂ की कमी में है। एक और विसरण-अवरोध उसे और भूखा कर देता।