कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 3 सोचिए और बताइए के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
आपके विचार में मरुस्थल में रहने वाले पादपों की बाह्यत्वचा की बाहरी भित्ति की मोटी उपत्वचा (cuticle) मरुस्थलीय पादपों के लिए लाभदायक एवं जलमग्न पादपों के लिए हानिकारक क्यों है?
उत्तर

क्योंकि उपत्वचा जल और गैसों — दोनों की गति रोकती है। मरुस्थलीय पादप को यह रोक चाहिए, जबकि जलमग्न पादप के लिए यही रोक घातक है।

मरुस्थल में। वहाँ जल ही सीमित कारक है। मोटी मोमी उपत्वचा —

  • बाह्यत्वचा की सतह से वाष्पन घटा देती है, अतः वाष्पोत्सर्जन लगभग पूरी तरह रंध्रों तक सीमित रह जाता है, जिन्हें पादप बंद कर सकता है;
  • कुछ सूर्य-प्रकाश परावर्तित करके तापन कम करती है;
  • उड़ती बालू से होने वाले घर्षण और परजीवियों से रक्षा करती है।

जल के भीतर। वहाँ जल की कमी है ही नहीं, अतः बचाने को कुछ नहीं — और उपत्वचा अब केवल हानि करती है —

  • जलमग्न पादप जल, खनिज तथा घुली CO₂ और O₂ को अपनी पूरी सतह से सीधे अवशोषित करता है, क्योंकि जड़ से पत्ती तक की धारा चलाने वाला वाष्पोत्सर्जन अभिकर्ष वहाँ है ही नहीं। जल-अपारगम्य उपत्वचा इस पूरे अवशोषी क्षेत्र को बंद कर देती।
  • गैसें जल में वायु की तुलना में हजारों गुना धीमे विसरित होती हैं, अतः पादप पहले ही CO₂ और O₂ की कमी में है। एक और विसरण-अवरोध उसे और भूखा कर देता।
ऐसा क्यों होता है: कोई संरचना स्वयं में अच्छी या बुरी नहीं होती — वह किसी विशेष पर्यावरण के लिए अच्छी होती है। उपत्वचा पादप से सतही गैस-विनिमय और जल-विनिमय छीनकर बदले में जल-संरक्षण देती है। मरुस्थल में यह सौदा लाभ का है; जल के भीतर पादप कीमत चुकाता है और पाता कुछ नहीं। इसीलिए जलमग्न पत्तियों में उपत्वचा अत्यंत पतली या अनुपस्थित होती है और प्रायः रंध्र भी नहीं होते।
प्र2.
पादप की जड़ों द्वारा जल अवशोषित होने पर तो इसे जाइलम के माध्यम से गुरुत्वाकर्षण के विपरीत गति करनी होती है। जाइलम की ‘मृत’ कोशिकाएँ ऊपरी पत्तियों की सजीव कोशिकाओं के साथ मिलकर जल को गतिमान रखने के लिए किस प्रकार कार्य करती हैं?
उत्तर

मृत कोशिकाएँ नली देती हैं; पत्ती की सजीव कोशिकाएँ खिंचाव देती हैं। इनमें से एक भी न हो तो जल नहीं चढ़ेगा।

पत्ती (सजीव कोशिकाएँ) रंध्रों से जलवाष्प बाहर = वाष्पोत्सर्जन जाइलम — मृत, खोखली, लिग्निनयुक्त नलिकाएँ; न अनुप्रस्थ भित्ति, न कोशिकाद्रव्य जल का सतत स्तंभ ऊपर खिंचता है मूलरोम
सजीव पत्ती खींचती है; मृत जाइलम वह नली है जो इस खिंचाव को जड़ तक पहुँचाती है।

क्रम से —

  1. पत्ती में सजीव मध्योतक कोशिकाएँ रंध्रों से जलवाष्प खोती हैं — वाष्पोत्सर्जन
  2. जल खोने पर ये कोशिकाएँ निकटतम जाइलम वाहिका से जल खींचती हैं।
  3. जल के अणु परस्पर चिपके रहते हैं (संसंजन), अतः जाइलम में जल का स्तंभ टूटता नहीं। ऊपर से खींचने पर पूरा स्तंभ खिंच आता है।
  4. यही तनाव — वाष्पोत्सर्जन अभिकर्ष — जड़ तक संचरित होता है, जहाँ मूलरोम से जल भीतर आकर उसकी पूर्ति कर देता है।

नली का मृत होना क्यों आवश्यक है: परिपक्वता पर वाहिनिकाएँ और वाहिकाएँ अपना कोशिकाद्रव्य तथा सिरे की भित्तियाँ खो देती हैं, अतः वाहिका एक सतत खुली नली बन जाती है जिसमें प्रवाह रोकने वाला कुछ नहीं। उनकी भित्ति मोटी और लिग्निनयुक्त होना भी अनिवार्य है — तनाव में जल का स्तंभ नली को भीतर की ओर पिचकाना चाहता है, और इसे केवल दृढ़ लिग्निनयुक्त भित्ति ही रोक सकती है।

मुख्य विचार: जल उठाने की ऊर्जा पादप से आती ही नहीं — वह सूर्य से आती है, जो पत्ती पर जल को वाष्पित करता है। पादप केवल एक दृढ़, अखंड नली और शीर्ष पर एक आर्द्र सतह उपलब्ध कराता है। इसीलिए बिना किसी पंप के जल दसियों मीटर ऊँचे वृक्ष के शीर्ष तक चढ़ जाता है।
प्र3.
यदि तने या पत्तियों की बाह्यत्वचा में रंध्र न हों तो आपके विचार में क्या होगा?
उत्तर

पादप स्वयं को बंद कर लेता — गैसीय विनिमय लगभग रुक जाता, वाष्पोत्सर्जन बंद हो जाता और उसके साथ वह अभिकर्ष भी समाप्त हो जाता जो जल और खनिजों को पत्तियों तक पहुँचाता है।

प्रक्रमरंध्र न होने पर क्या बिगड़ेगापरिणाम
प्रकाश-संश्लेषणमोमी उपत्वचा से CO₂ भीतर नहीं आ सकतीभोजन-निर्माण तीव्रता से घटेगा; पादप भूखा रहेगा
श्वसनO₂ भीतर नहीं आ सकती, CO₂ बाहर नहीं जा सकतीकोशिकाएँ कुशलतापूर्वक ऊर्जा मुक्त नहीं कर पाएँगी
वाष्पोत्सर्जनजलवाष्प बाहर नहीं निकलेगीवाष्पोत्सर्जन अभिकर्ष नहीं बनेगा — जाइलम का स्तंभ ऊपर नहीं खिंचेगा
खनिज आपूर्तिजड़ से पत्ती तक जल की धारा नहीं चलेगीउसमें घुले खनिज पत्तियों तक कभी नहीं पहुँचेंगे
तापपत्ती की सतह से वाष्पीय शीतलन नहीं होगाधूप में पत्तियाँ अत्यधिक गर्म होंगी और एंजाइम क्षतिग्रस्त होंगे
अपशिष्ट निष्कासनजो अपशिष्ट वाष्पोत्सर्जित जल के साथ निकलते हैं, वे रुक जाएँगेपादप काया में अपशिष्ट संचित होंगे
जल खोने पर भी पादप रंध्र क्यों रखता है: रंध्र एक नियंत्रित छिद्र है। पादप को जो भी मिलता है — CO₂ का प्रवेश, शीतलन, वाष्पोत्सर्जन अभिकर्ष — वह सब इसी छिद्र के खुले होने पर निर्भर है, और खोया हुआ प्रत्येक ग्राम जल उसकी कीमत है। पादप रंध्रों को खोलकर-बंद करके इस संतुलन को साधता है, जो रंध्र न रखने से कहीं बेहतर है। रंध्रहीन पादप उस घर की तरह है जिसमें न दरवाजा है न खिड़की — न कुछ भीतर आता है, न बाहर जाता है, और कुछ भी कार्य नहीं करता।
क्या आप जानते हैं? कुछ मरुस्थलीय पादप इसके निकट पहुँच जाते हैं — वे दिनभर रंध्र बंद रखते हैं और केवल रात में खोलते हैं, जब वायु ठंडी और आर्द्र होती है, ताकि ग्रहण की गई CO₂ के बदले न्यूनतम जल खोना पड़े।
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