अपकेंद्रण और/अथवा स्कंदन द्वारा — अध्याय ने ठीक इसी स्थिति के लिए ये दोनों तकनीकें दी हैं।
स्कंदन। थोड़ा-सा फिटकरी का चूर्ण मिलाइए, जो जल-शुद्धिकरण में प्रयुक्त एक श्वेत क्रिस्टलीय पदार्थ है। फिटकरी सूक्ष्म निलंबित कणों को आपस में चिपकाकर गुच्छे बना देती है। ये बड़े और भारी गुच्छे गुरुत्व से शीघ्र नीचे बैठ जाते हैं — इसी प्रक्रिया को अवसादन कहते हैं — और ऊपर का स्वच्छ जल निस्तारण अथवा निस्यंदन द्वारा अलग किया जा सकता है।
अपकेंद्रण। धुँधले जल को नलिका में लेकर तीव्र गति से घुमाइए। नलिकाएँ बाहर की ओर क्षैतिज हो जाती हैं और प्रत्येक कण पर बाहर की ओर लगने वाला अपकेंद्रीय बल उसके भार से कई गुना अधिक होता है, अतः अत्यंत सूक्ष्म कण भी नलिका की तली में पहुँच जाते हैं और ऊपर स्वच्छ द्रव रह जाता है।
जहाँ निस्यंदन असफल है वहाँ ये क्यों सफल हैं: निस्यंदन एक छलनी है और वह केवल अपने छिद्रों से बड़े कण ही हटा सकती है। स्कंदन समस्या को दूसरी ओर से पकड़ता है — छलनी को महीन करने के बजाय वह कणों को बड़ा बना देता है जब तक वे स्वयं बैठ न जाएँ। अपकेंद्रण कण नहीं, बल बदल देता है: वह गुरुत्व के स्थान पर कहीं प्रबल बाहरी बल लगा देता है, जिससे दिनों में बैठने वाले कण मिनटों में बैठ जाते हैं।
क्या आप जानते हैं? वाहित मल उपचार संयंत्र में यही क्रम अपनाया जाता है — अवसादन, फिर स्कंदन, फिर निस्यंदन — और उसके बाद ही उपचारित जल छोड़ा जाता है अथवा शौचालयों तथा पौधों के लिए पुनः उपयोग में लाया जाता है।