कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 8 अभ्यास प्रश्न के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
अरनेस्ट रदरफोर्ड के स्वर्ण पर्णिका प्रयोग के संदर्भ में सही विकल्पों का चयन कीजिए और सही एवं गलत विकल्पों का कारण समझाइए। (i) इस प्रयोग ने स्पष्ट रूप से नाभिक में न्यूट्रॉनों की उपस्थिति को दर्शाया। (ii) इसके परिणामों ने प्लम पुडिंग मॉडल को गलत सिद्ध कर दिया और परमाणु के केंद्र में नाभिक होने की अवधारणा को जन्म दिया। (iii) कुछ अल्फा कणों का अधिक विक्षेपण यह दर्शाता है कि परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान और धन आवेश एक सूक्ष्म केंद्र में सुसंकुलित है। (iv) जिस प्रकार अल्फा कण विक्षेपित हुए उससे यह ज्ञात हुआ कि इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर गति करते हैं।
उत्तर

सही विकल्प: (ii) एवं (iii)। गलत: (i) एवं (iv)।

विकल्पनिर्णयकारण
(i) न्यूट्रॉनों की उपस्थिति दर्शाईगलतन्यूट्रॉन अनावेशित होते हैं, अतः वे α-कण पर कोई स्थिरवैद्युत बल नहीं लगाते और प्रकीर्णन प्रयोग में दिखाई ही नहीं दे सकते। न्यूट्रॉन की खोज 21 वर्ष बाद, वर्ष 1932 में जेम्स चैडविक ने की।
(ii) प्लम पुडिंग गलत सिद्ध, नाभिक की अवधारणासहीटॉमसन का एकसमान फैला धनावेश केवल अत्यंत सूक्ष्म विक्षेपण दे सकता था। बड़े कोण का विक्षेपण एवं वापसी उस मॉडल में असंभव है, अतः मॉडल को जाना पड़ा — और उसके स्थान पर सूक्ष्म, सघन, धनावेशित केंद्र आया।
(iii) द्रव्यमान एवं धनावेश सूक्ष्म केंद्र में सुसंकुलितसहीα-कण को बड़े कोण पर केवल वही लक्ष्य मोड़ सकता है जो अत्यधिक आवेशित भी हो और α-कण से कहीं भारी भी। चूँकि अधिकांश कण सीधे निकल गए, वह लक्ष्य परमाणु के आयतन के अति सूक्ष्म भाग में ही हो सकता है।
(iv) इलेक्ट्रॉनों की गति दर्शाईगलतयह प्रयोग इलेक्ट्रॉनों के विषय में कुछ नहीं बताता। α-कण इलेक्ट्रॉन से लगभग 7300 गुना भारी होता है, अतः मार्ग में आने वाले इलेक्ट्रॉन उसका पथ लगभग नहीं बदलते। इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था का ज्ञान बाद में बोर के स्पेक्ट्रम संबंधी कार्य से मिला।
ऐसा क्यों होता है: कोई प्रयोग केवल उसी के विषय में बता सकता है जिससे उसकी अन्योन्यक्रिया होती है। α-कण आवेशित एवं भारी हैं, अतः वे संकेंद्रित आवेश एवं संकेंद्रित द्रव्यमान की टोह लेते हैं — और कुछ नहीं।
प्र2.
बोर के परमाणु मॉडल के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही अथवा गलत हैं? प्रत्येक कथन के लिए एक कारण दीजिए। (i) इलेक्ट्रॉन निश्चित कक्षाओं में गति करते हुए अपनी ऊर्जा का ह्रास करते हैं और धीरे-धीरे नाभिक में गिर जाते हैं। (ii) इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर कहीं भी विद्यमान हो सकते हैं और उनकी ऊर्जा निश्चित नहीं होती। (iii) इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर निश्चित ऊर्जा की कक्षाओं में ऊर्जा ह्रास किए बिना चक्कर लगाते हैं। (iv) नाभिक के चारों ओर गति करते हुए इलेक्ट्रॉन ऊर्जा स्तरों के मध्य भी पाए जा सकते हैं।
उत्तर

केवल (iii) सही है। (i), (ii) एवं (iv) गलत हैं।

कथननिर्णयकारण
(i) ऊर्जा खोकर नाभिक में गिरते हैंगलतयह वही चिरसम्मत पूर्वानुमान है जिसे बोर ने अस्वीकार किया। रदरफोर्ड के मॉडल में ऐसा होता, और यही वह असफलता है जिसे सुधारने बोर आए। स्थायी अवस्था में ऊर्जा स्थिर रहती है।
(ii) कहीं भी, अनिश्चित ऊर्जा के साथगलतबोर का मूल विचार इसका ठीक उल्टा है — इलेक्ट्रॉन केवल कुछ अनुमत कोशों में ही रहते हैं, और प्रत्येक की ऊर्जा निश्चित होती है। ऊर्जा क्वांटित है, मनमानी नहीं।
(iii) निश्चित ऊर्जा की कक्षाओं में बिना ऊर्जा ह्रास के चक्करसहीयह ठीक स्थायी अवस्थाओं की अभिधारणा है। कोश K, L, M, N (n = 1, 2, 3, 4) में से प्रत्येक की ऊर्जा निश्चित है और उसमें गतिशील इलेक्ट्रॉन विकिरण नहीं करता।
(iv) ऊर्जा स्तरों के मध्य भी पाए जाते हैंगलतदो कोशों के बीच का स्थान अनुमत नहीं है। इलेक्ट्रॉन ठीक दोनों स्तरों के ऊर्जा-अंतर को अवशोषित अथवा उत्सर्जित करके कोश बदलता है — वह या तो एक स्तर पर है या दूसरे पर, बीच में कभी नहीं।
ऐसा क्यों होता है: ये चारों कथन बोर द्वारा जोड़े गए दो विचारों की जाँच-सूची हैं — कि केवल कुछ ऊर्जाएँ ही अनुमत हैं, और कि अनुमत अवस्था में इलेक्ट्रॉन विकिरण नहीं करता। कथन (i) दूसरे विचार का खंडन करता है; कथन (ii) एवं (iv) पहले का।
प्र3.
तीन परमाणु कणों X, Y और Z के नाभिकों का संघटन नीचे दिया गया है— प्रोटॉनों की संख्या X: 18, Y: 17, Z: 17; न्यूट्रॉनों की संख्या X: 19, Y: 18, Z: 20। निम्नलिखित के मध्य संबंध स्पष्ट कीजिए। (i) Y एवं Z (ii) Z एवं X
उत्तर

(i) Y एवं Z समस्थानिक हैं। (ii) Z एवं X समभारिक हैं।

पहले A = p+ + n0 का उपयोग करके प्रत्येक के लिए Z (परमाणु क्रमांक) एवं A (द्रव्यमान संख्या) निकालिए।

कणप्रोटॉन = Zन्यूट्रॉनद्रव्यमान संख्या A = p + nतत्व
X181918 + 19 = 373718Ar (आर्गन)
Y171817 + 18 = 353517Cl (क्लोरीन)
Z172017 + 20 = 373717Cl (क्लोरीन)

(i) Y एवं Z — समस्थानिक। दोनों में 17 प्रोटॉन हैं, अतः दोनों क्लोरीन हैं, परंतु इनकी द्रव्यमान संख्याएँ 35 एवं 37 हैं। समान परमाणु क्रमांक, भिन्न द्रव्यमान संख्या = समस्थानिक। दोनों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (2, 8, 7) समान है, अतः रासायनिक गुणधर्म भी समान; केवल द्रव्यमान भिन्न है। ये वस्तुतः क्लोरीन के वही दो प्राकृतिक समस्थानिक हैं जो 3 : 1 के अनुपात में पाए जाते हैं।

(ii) Z एवं X — समभारिक। दोनों की द्रव्यमान संख्या 37 है, अतः दोनों नाभिकों में 37 न्यूक्लिऑन हैं, परंतु Z में 17 प्रोटॉन हैं और X में 18। समान द्रव्यमान संख्या, भिन्न परमाणु क्रमांक = समभारिक। ये भिन्न तत्व हैं — क्लोरीन एवं आर्गन — जिनका रसायन पूर्णतः अलग है: क्लोरीन (2, 8, 7) को एक इलेक्ट्रॉन चाहिए और वह अत्यधिक अभिक्रियाशील है, जबकि आर्गन (2, 8, 8) का अष्टक पूर्ण है और वह अक्रिय है।

ऐसा क्यों होता है: दोनों अवधारणाओं को अलग रखना सरल है यदि आप पूछें कि कौन-सी संख्या स्थिर रखी जा रही है। सम-स्थानिक में प्रोटॉन संख्या स्थिर है, अतः वे एक ही तत्व हैं। सम-भारिक में कुल न्यूक्लिऑन संख्या स्थिर है, अतः उनका भार समान है परंतु वे भिन्न तत्व हैं।
प्र4.
रदरफोर्ड ने स्वर्ण पर्णिका प्रयोग में ऐसे कुछ अल्फा कण जो पुनः लौट आए थे अथवा बड़े कोणों पर विक्षेपित हो गए थे, के आधार पर परमाणु के धनावेशित भाग की अवस्थिति और अभिलक्षणों के विषय में क्या निष्कर्ष निकाला?
उत्तर

रदरफोर्ड ने निष्कर्ष निकाला कि धनावेश पूरे परमाणु में फैला नहीं है बल्कि केंद्र के एक अति सूक्ष्म क्षेत्र में केंद्रित है, जिसे उन्होंने नाभिक कहा।

अवस्थिति। परमाणु के केंद्र में, जो उसके आयतन का अति सूक्ष्म भाग ही घेरता है। परमाणु का व्यास लगभग 10–10 m है; नाभिक का व्यास लगभग 10–15 m — अर्थात 105 गुना छोटा। इसके बाहर का सारा भाग व्यावहारिक रूप से रिक्त स्थान है जिसमें इलेक्ट्रॉन गति करते हैं।

अभिलक्षण।

  • इसमें परमाणु का संपूर्ण धनावेश होता है।
  • इसमें लगभग संपूर्ण द्रव्यमान होता है — बाहर के इलेक्ट्रॉन इतने हल्के हैं कि उनके द्रव्यमान की उपेक्षा की जा सकती है।
  • अतः यह अत्यंत सघन है।

किस अवलोकन ने कौन-सा निष्कर्ष दिया —

अवलोकननिष्कर्ष
अधिकांश α-कण बिना विक्षेपित हुए सीधे निकल गएपरमाणु का अधिकांश भाग रिक्त है
कुछ बड़े कोणों पर विक्षेपित हुएकोई संकेंद्रित धनावेश है जो उन्हें प्रबल रूप से प्रतिकर्षित करता है
अत्यंत कम कण लगभग सीधे लौट आएवह आवेश α-कण से कहीं भारी वस्तु पर है और अत्यंत सूक्ष्म आयतन घेरता है
ऐसा क्यों होता है: बड़े विक्षेपणों की दुर्लभता उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितने स्वयं विक्षेपण। यदि वापसी सामान्य होती तो लक्ष्य बड़ा होना चाहिए था। चूँकि वह अत्यंत दुर्लभ थी, लक्ष्य अति सूक्ष्म होना चाहिए — और फिर भी कण को पूरा लौटाने के लिए सारा भारी एवं धनावेशित भाग उसी में सिमटा होना चाहिए।
प्र5.
निम्नलिखित कथनों की व्याख्या कीजिए और इन्हें सही कालक्रम में व्यवस्थित कीजिए जिससे यह ज्ञात हो सके कि समय के साथ परमाणु मॉडल कैसे विकसित हुए हैं। (i) बोर के मॉडल ने प्रस्तावित किया कि इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर निश्चित कक्षाओं में परिभ्रमण करते हैं और प्रत्येक कक्षा की एक निश्चित ऊर्जा होती है। (ii) टॉमसन के मॉडल ने परमाणु को एक ‘प्लम पुडिंग’ के रूप में दर्शाया है जिसमें इलेक्ट्रॉन धनावेश के एक गोले में धँसे होते हैं। (iii) रदरफोर्ड के मॉडल ने प्रस्तावित किया कि परमाणुओं में एक सघन केंद्रीय नाभिक होता है। (iv) डाल्टन के मॉडल ने परमाणुओं को अविभाज्य कणों के रूप में वर्णित किया।
उत्तर

सही कालक्रम: (iv) → (ii) → (iii) → (i), अर्थात डाल्टन → टॉमसन → रदरफोर्ड → बोर।

क्रममॉडलवर्षक्या प्रस्तावित कियाअगला मॉडल क्यों आवश्यक हुआ
पहला(iv) डाल्टन1808समस्त द्रव्य अविभाज्य परमाणुओं से बना है — द्रव्य का प्रथम वैज्ञानिक विवरणरेडियोधर्मिता एवं कैथोड किरणों ने दिखाया कि परमाणु सूक्ष्म कण उत्सर्जित करते हैं
दूसरा(ii) टॉमसन1897 के बादधनावेश के गोले में धँसे इलेक्ट्रॉन — प्लम पुडिंगस्वर्ण पर्णिका प्रयोग: कुछ α-कण पुनः लौट आए
तीसरा(iii) रदरफोर्ड1911सघन केंद्रीय नाभिक, अधिकांशतः रिक्त स्थान, परिक्रमा करते इलेक्ट्रॉनपरमाणु नष्ट क्यों नहीं होते, इसकी व्याख्या नहीं कर सका
चौथा(i) बोर1913निश्चित ऊर्जा वाले निश्चित कोशों में इलेक्ट्रॉन; कोश में रहते हुए ऊर्जा क्षय नहींबाद के कार्य ने दिखाया कि इलेक्ट्रॉन निश्चित कक्षाएँ नहीं, मेघ हैं — क्वांटम यांत्रिकीय मॉडल

इस क्रम का तर्क। प्रत्येक मॉडल को उस खोज की प्रतीक्षा करनी पड़ी जिसने उसे संभव बनाया। टॉमसन का मॉडल वर्ष 1897 में इलेक्ट्रॉन की खोज से पहले नहीं आ सकता था। रदरफोर्ड का मॉडल स्वर्ण पर्णिका प्रयोग से पहले नहीं। बोर का मॉडल तब तक नहीं आ सकता था जब तक परिक्रमा के लिए कोई नाभिक न हो — उनका मॉडल रदरफोर्ड के मॉडल में एक नया नियम जोड़ने भर से बनता है।

ऐसा क्यों होता है: ध्यान दीजिए कि कोई भी मॉडल पूरी तरह त्यागा नहीं गया। डाल्टन का परमाणु आज भी तत्व की इकाई है; टॉमसन का इलेक्ट्रॉन बना हुआ है; रदरफोर्ड का नाभिक बोर के मॉडल में और आधुनिक मॉडल में भी है। विज्ञान जो काम करता है उसे रखकर और जो असफल होता है उसे सुधारकर आगे बढ़ता है।
प्र6.
इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर कक्षाओं में गति करते हैं। वे परमाणु से बाहर क्यों नहीं निकल जाते? कौन-सा बल उन्हें नाभिक की ओर आकर्षित रखता है, व्याख्या कीजिए?
उत्तर

वे बाहर इसलिए नहीं निकलते क्योंकि ऋणावेशित इलेक्ट्रॉनों और धनावेशित नाभिक के बीच स्थिरवैद्युत आकर्षण बल कार्य करता है।

  • नाभिक में प्रोटॉन होते हैं, प्रत्येक पर +1 आवेश। प्रत्येक इलेक्ट्रॉन पर –1 आवेश। विपरीत आवेश आकर्षित करते हैं।
  • यह आकर्षण निरंतर केंद्र की ओर दिष्ट रहता है, अतः इलेक्ट्रॉन के गतिमान रहते हुए भी उसे भीतर की ओर खींचता रहता है। यही वह बल है जो इलेक्ट्रॉन के पथ को सीधी रेखा के बजाय एक बंद कोश में मोड़ देता है।
  • इसकी भूमिका वही है जो सूर्य की परिक्रमा करते ग्रह के लिए गुरुत्व की है: एक अंतर्मुखी बल जो गतिमान पिंड को बंद पथ में बनाए रखता है।

उत्तर का दूसरा भाग यह है कि इलेक्ट्रॉन भीतर गिरता क्यों नहीं, जो विपरीत संकट है। बोर की अभिधारणा इसका समाधान करती है: अनुमत कोश में रहते हुए इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा स्थिर रहती है, अतः वह न ऊर्जा विकिरित करता है और न भीतर की ओर सर्पिल गति करता है। वह तभी बाहर निकलता है जब उसे बाहर से इतनी ऊर्जा मिले कि वह बाह्यतम स्तर से भी आगे जा सके — और परमाणु के आयनन में ठीक यही होता है।

ऐसा क्यों होता है: आकर्षण की प्रबलता यह भी समझाती है कि भिन्न कोशों के इलेक्ट्रॉन इतने भिन्न व्यवहार क्यों करते हैं। K-कोश का इलेक्ट्रॉन नाभिक के निकट है, प्रबल रूप से बँधा है और उसे हटाना कठिन है। बाहरी कोश का संयोजकता इलेक्ट्रॉन दूर है और शिथिल रूप से बँधा है — इसीलिए सोडियम (2, 8, 1) अपना एकमात्र बाहरी इलेक्ट्रॉन इतनी सरलता से त्याग देता है और जल के साथ तीव्रता से अभिक्रिया करता है।
प्र7.
नीचे दिए गए अभिकथन एवं कारण को पढ़िए और उनके संबंध में आगे दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए। अभिकथन— अवपरमाणुक कणों की खोज ने परमाणु संरचना को समझने में सहायता की। कारण— किसी परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रोटॉनों की संख्या के समान होती है। (i) अभिकथन और कारण दोनों सत्य हैं और कारण अभिकथन की सही व्याख्या करता है। (ii) अभिकथन और कारण दोनों सत्य हैं परंतु कारण अभिकथन की सही व्याख्या नहीं करता है। (iii) अभिकथन सत्य है परंतु कारण असत्य है। (iv) अभिकथन असत्य है परंतु कारण सत्य है।
उत्तर

सही विकल्प है (ii) अभिकथन और कारण दोनों सत्य हैं परंतु कारण अभिकथन की सही व्याख्या नहीं करता है।

अभिकथन सत्य है। परमाणु संरचना की समझ में प्रत्येक अगला कदम किसी अवपरमाणुक कण की खोज से ही आया। इलेक्ट्रॉन (टॉमसन, 1897) ने सिद्ध किया कि परमाणु विभाज्य है; प्रोटॉन ने नाभिक को उसका आवेश दिया; न्यूट्रॉन (चैडविक, 1932) ने अंततः परमाणु द्रव्यमानों की व्याख्या की। इन खोजों के बिना परमाणु का कोई मॉडल होता ही नहीं।

कारण भी सत्य है। उदासीन परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रोटॉनों के बराबर होती ही है — इसी से परमाणु पर कोई परिणामी आवेश नहीं होता, और इसी से परमाणु क्रमांक Z प्रोटॉन-गणना और इलेक्ट्रॉन-गणना दोनों का काम करता है।

परंतु कारण अभिकथन की व्याख्या नहीं करता। कारण एक विशिष्ट तथ्य है जो हमें कणों की खोज होने के कारण पता चला — वह परिणाम है, हेतु नहीं। वह यह नहीं बताता कि कणों की खोज ने समझ को आगे क्यों बढ़ाया। अभिकथन पूरे विषय के इतिहास का कथन है; कारण उसके भीतर का एक छोटा-सा विवरण।

ऐसा क्यों होता है: तीर की दिशा जाँचिए। पूछिए — 'क्या कारण से अभिकथन निकलता है?' यह जानना कि इलेक्ट्रॉन = प्रोटॉन, स्वयं में यह नहीं बताता कि परमाणु संरचना की समझ कैसे विकसित हुई। अब पूछिए — 'क्या अभिकथन से कारण निकलता है?' हाँ — इलेक्ट्रॉन एवं प्रोटॉन की खोज होने पर ही हम यह समानता कह सके। तीर उल्टी दिशा में है, अतः कारण अभिकथन की व्याख्या नहीं हो सकता।
प्र8.
मैग्नीशियम अनेक जैविक प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक है जिसमें मांसपेशियों का संकुचन भी सम्मिलित है। मैग्नीशियम के परमाणु की द्रव्यमान संख्या 24 और परमाणु क्रमांक 12 है तो उसमें (i) प्रोटॉनों की संख्या (ii) न्यूट्रॉनों की संख्या (iii) इलेक्ट्रॉनों की संख्या ज्ञात कीजिए। मैग्नीशियम परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था को भी चित्रात्मक रूप से दर्शाइए।
उत्तर

(i) 12 प्रोटॉन (ii) 12 न्यूट्रॉन (iii) 12 इलेक्ट्रॉन। इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 2, 8, 2 है।

सूत्र: Z = प्रोटॉनों की संख्या = उदासीन परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की संख्या; n0 = A – Z।

दिया है: A = 24, Z = 12

(i) प्रोटॉनों की संख्या = Z = 12

(ii) न्यूट्रॉनों की संख्या = A – Z
= 24 – 12
= 12

(iii) परमाणु विद्युत उदासीन है, अतः
इलेक्ट्रॉनों की संख्या = Z = 12

12 इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था। पहले K भरिए (अधिकतम 2 × 1² = 2), फिर L (अधिकतम 2 × 2² = 8), शेष M में।

K-कोश: 2 इलेक्ट्रॉन  →  12 – 2 = 10 शेष
L-कोश: 8 इलेक्ट्रॉन  →  10 – 8 = 2 शेष
M-कोश: 2 इलेक्ट्रॉन
Mg का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = 2, 8, 2
MgK = 2    L = 8    M = 2नाभिक में 12 प्रोटॉन एवं 12 न्यूट्रॉन
मैग्नीशियम परमाणु (Z = 12) में इलेक्ट्रॉन व्यवस्था — 12 इलेक्ट्रॉन K → L → M क्रम में 2, 8, 2 के रूप में भरे गए। बाह्यतम कोश के दो इलेक्ट्रॉन संयोजकता इलेक्ट्रॉन हैं।
ऐसा क्यों होता है: बाह्यतम M-कोश के दो इलेक्ट्रॉन ही संयोजकता इलेक्ट्रॉन हैं। मैग्नीशियम इन्हें त्यागकर स्थायी विन्यास 2, 8 प्राप्त करता है, इसीलिए उसकी संयोजकता 2 है और वह Mg²⁺ आयन बनाता है — मैग्नीशियम आपकी मांसपेशियों में और पर्णहरित में इसी रूप में कार्य करता है।
प्र9.
चित्र 8.17 में दर्शाए गए तत्वों के लिए निम्नलिखित जानकारी ज्ञात कीजिए। (i) तत्व का नाम (ii) प्रतीक (iii) इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या (iv) संयोजकता इलेक्ट्रॉनों की संख्या (v) तत्व की संयोजकता (vi) प्रोटॉनों की संख्या (vii) परमाणु क्रमांक
उत्तर

चित्र 8.17 में प्रत्येक कोश पर बने इलेक्ट्रॉनों को गिनने पर विन्यास 2,1 · 2,5 · 2,8,3 · 2,7 मिलते हैं, जिनसे चारों तत्वों की पहचान हो जाती है।

(क)(ख)(ग)(घ)
चित्र में बने इलेक्ट्रॉन (K, L, M)2, 12, 52, 8, 32, 7
(i) तत्व का नामलीथियमनाइट्रोजनऐलुमिनियमफ्लुओरीन
(ii) प्रतीकLiNAlF
(iii) इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या37139
(iv) संयोजकता इलेक्ट्रॉनों की संख्या1537
(v) संयोजकता1 (1 त्यागता है)3 (3 ग्रहण करता है)3 (3 त्यागता है)1 (1 ग्रहण करता है)
(vi) प्रोटॉनों की संख्या37139
(vii) परमाणु क्रमांक Z37139
Li(क) Li2, 1N(ख) N2, 5Al(ग) Al2, 8, 3F(घ) F2, 7
चित्र 8.17 के चारों परमाणु — मुद्रित चित्र से इलेक्ट्रॉन गिनकर बनाए गए: लीथियम (2,1), नाइट्रोजन (2,5), ऐलुमिनियम (2,8,3) एवं फ्लुओरीन (2,7)।

प्रत्येक पंक्ति कैसे प्राप्त हुई। सभी कोशों के इलेक्ट्रॉन जोड़िए — यही इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या है। परमाणु उदासीन है, अतः प्रोटॉनों की संख्या एवं परमाणु क्रमांक वही संख्या है। बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉन संयोजकता इलेक्ट्रॉन हैं। संयोजकता के लिए नियम लगाइए: संयोजकता इलेक्ट्रॉन 4 से कम → त्यागता है; 4 से अधिक → 8 तक पहुँचने के लिए ग्रहण करता है।

(क) 2 + 1 = 3 इलेक्ट्रॉन → Z = 3 → Li; 1 संयोजकता इलेक्ट्रॉन, अतः 1 त्यागता है → संयोजकता 1
(ख) 2 + 5 = 7 इलेक्ट्रॉन → Z = 7 → N; 5 संयोजकता इलेक्ट्रॉन, 8 – 5 = 3 चाहिए → संयोजकता 3
(ग) 2 + 8 + 3 = 13 इलेक्ट्रॉन → Z = 13 → Al; 3 संयोजकता इलेक्ट्रॉन, अतः 3 त्यागता है → संयोजकता 3
(घ) 2 + 7 = 9 इलेक्ट्रॉन → Z = 9 → F; 7 संयोजकता इलेक्ट्रॉन, 8 – 7 = 1 चाहिए → संयोजकता 1
स्वयं जाँचिए: (ख) और (ग) दोनों की संयोजकता 3 निकलती है, परंतु कारण विपरीत हैं — नाइट्रोजन तीन इलेक्ट्रॉन ग्रहण करता है, ऐलुमिनियम तीन त्यागता है। इसीलिए ये दोनों 1 : 1 अनुपात में संयोजित होकर AlN बनाते हैं।
प्र10.
रदरफोर्ड और बोर दोनों के प्रतिरूपों में इलेक्ट्रॉन नाभिक की परिक्रमा करते हैं परंतु रदरफोर्ड का मॉडल, परमाणु के स्थायित्व को समझाने में असफल क्यों रहा जबकि बोर का मॉडल सफल रहा?
उत्तर

क्योंकि रदरफोर्ड ने इलेक्ट्रॉन को कोई भी कक्षा दे दी और चिरसम्मत भौतिकी को अपना काम करने दिया, जबकि बोर ने केवल कुछ निश्चित कक्षाएँ अनुमत कीं और यह अभिगृहीत रखा कि उनमें रहते हुए इलेक्ट्रॉन ऊर्जा विकिरित नहीं करता।

रदरफोर्ड का मॉडल क्यों असफल होता है।

  • वृत्ताकार पथ में गतिशील इलेक्ट्रॉन की दिशा निरंतर बदलती है, अतः वह त्वरित हो रहा है।
  • चिरसम्मत भौतिकी के अनुसार त्वरित आवेश को ऊर्जा विकिरित करनी चाहिए।
  • ऊर्जा खोते हुए उसकी कक्षा सिकुड़ती जाएगी; वह सर्पिलाकार पथ पर भीतर जाकर नाभिक में गिर जाएगा।
  • परमाणु क्षण भर में नष्ट हो जाता — परंतु हमारे चारों ओर का द्रव्य स्थायी है। अतः यह मॉडल, जैसा था, अधूरा था।

बोर का मॉडल क्यों सफल होता है।

  • इलेक्ट्रॉन केवल कुछ अनुमत कोशों — स्थायी अवस्थाओं K, L, M, N (n = 1, 2, 3, 4) — में ही रह सकते हैं, बीच में कहीं नहीं।
  • स्थायी अवस्था में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा स्थिर रहती है, भले ही वह गतिमान हो, अतः कोई ऊर्जा विकिरित नहीं होती।
  • ऊर्जा का आदान-प्रदान केवल दो स्तरों के बीच छलाँग में होता है, उनके ऊर्जा-अंतर के बराबर। चूँकि कोशों के बीच कोई अनुमत अवस्था नहीं है और K-कोश से नीचे भी कोई नहीं, भीतर जाने का कोई सतत मार्ग बचता ही नहीं।
रदरफोर्ड (1911)बोर (1913)
अनुमत कक्षाएँकोई भी त्रिज्याकेवल निश्चित कोश
परिक्रमा के दौरान ऊर्जानिरंतर विकिरितस्थिर
परमाणु के लिए पूर्वानुमाननष्ट हो जाता हैस्थायी रहता है
ऐसा क्यों होता है: बोर ने परमाणु का चित्र नहीं बदला — उन्होंने रदरफोर्ड का नाभिक और कक्षाएँ ज्यों की त्यों रखीं। उन्होंने जो बदला वह इन पर लागू होने वाला नियम था, जिसमें एक ऐसा प्रतिबंध जोड़ा जो चिरसम्मत भौतिकी में है ही नहीं। इसीलिए दोनों मॉडल चित्र में एक जैसे दिखते हैं परंतु विपरीत परिणति का पूर्वानुमान देते हैं। बोर का नियम एक मान्यता थी, जिसका औचित्य इसी बात से सिद्ध हुआ कि वह काम करती थी — इसने परमाणु स्पेक्ट्रम की तीक्ष्ण रेखाओं की भी व्याख्या की, जो सतत विकिरण कभी नहीं कर सकता था।
प्र11.
एक परमाणु ⁷⁰X में 31 इलेक्ट्रॉन हैं। बताइए कि इसके नाभिक में कितने न्यूट्रॉन हैं?
उत्तर

39 न्यूट्रॉन।

संकेतन पढ़ना: 70X में ऊपर लिखी संख्या द्रव्यमान संख्या है, अतः A = 70। परमाणु उदासीन है, अतः प्रोटॉन = इलेक्ट्रॉन।

इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 31
⇒ प्रोटॉनों की संख्या, Z = 31
द्रव्यमान संख्या, A = 70

न्यूट्रॉनों की संख्या = A – Z
= 70 – 31
= 39 न्यूट्रॉन

Z = 31 से तत्व की पहचान गैलियम के रूप में होती है, अतः 70X वस्तुतः 7031Ga है।

स्वयं जाँचिए: 31 प्रोटॉन + 39 न्यूट्रॉन = 70 न्यूक्लिऑन ✓। ध्यान दीजिए कि यहाँ न्यूट्रॉन पहले ही प्रोटॉनों से अधिक हैं (अनुपात 39 : 31 ≈ 1.26) — वही प्रवृत्ति जिसका वर्णन अध्याय में है कि भारी नाभिकों को बँधे रहने के लिए अनुपात में अधिक न्यूट्रॉन चाहिए।
प्र12.
एक परमाणु में 79 प्रोटॉन हैं और उसकी द्रव्यमान संख्या 197 है। इसमें (i) न्यूट्रॉनों की संख्या और (ii) इलेक्ट्रॉनों की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर

(i) 118 न्यूट्रॉन (ii) 79 इलेक्ट्रॉन। यह तत्व गोल्ड (स्वर्ण) है, 19779Au।

दिया है: प्रोटॉनों की संख्या = 79, द्रव्यमान संख्या A = 197

(i) न्यूट्रॉनों की संख्या = A – प्रोटॉनों की संख्या
= 197 – 79
= 118

(ii) परमाणु विद्युत उदासीन है, अतः
इलेक्ट्रॉनों की संख्या = प्रोटॉनों की संख्या
= 79

Z = 79 अर्थात स्वर्ण — वही धातु जिसकी पर्णिका पीटकर गाइगर एवं मार्सडेन ने प्रकीर्णन प्रयोग किया था।

ऐसा क्यों होता है: 79 प्रोटॉन एक साथ ठुँसे होने के कारण स्वर्ण के नाभिक में स्थिरवैद्युत प्रतिकर्षण अत्यधिक होता है। इसे बाँधे रखने के लिए 118 न्यूट्रॉन चाहिए — न्यूट्रॉन-प्रोटॉन अनुपात लगभग 1.49 — ताकि पर्याप्त अल्प-परास नाभिकीय बल मिले और प्रोटॉनों के बीच पर्याप्त दूरी भी। इसकी तुलना कार्बन से कीजिए, जिसका काम 6 और 6 से चल जाता है।
प्र13.
तालिका 8.5 को पूर्ण कीजिए। (पंक्ति 1) परमाणु क्रमांक 5, न्यूट्रॉनों की संख्या 6; (पंक्ति 2) द्रव्यमान संख्या 14, इलेक्ट्रॉनों की संख्या 7, नाइट्रोजन; (पंक्ति 3) द्रव्यमान संख्या 24, प्रोटॉनों की संख्या 12; (पंक्ति 4) परमाणु क्रमांक 15, न्यूट्रॉनों की संख्या 16; (पंक्ति 5) द्रव्यमान संख्या 1, न्यूट्रॉनों की संख्या 0।
उत्तर

प्रत्येक रिक्त स्थान दो संबंधों से भरा जाता है: Z = प्रोटॉनों की संख्या = इलेक्ट्रॉनों की संख्या (उदासीन परमाणु) तथा A = प्रोटॉनों की संख्या + न्यूट्रॉनों की संख्या

परमाणु क्रमांकद्रव्यमान संख्यान्यूट्रॉनों की संख्याप्रोटॉनों की संख्याइलेक्ट्रॉनों की संख्यातत्वों के नाम
511655बोरॉन
714777नाइट्रोजन
1224121212मैग्नीशियम
1531161515फॉस्फोरस
11011हाइड्रोजन

पंक्ति-दर-पंक्ति:

पंक्ति 1: Z = 5 ⇒ प्रोटॉन = 5, इलेक्ट्रॉन = 5। A = 5 + 6 = 11। Z = 5 → बोरॉन, 115B

पंक्ति 2: इलेक्ट्रॉन = 7 ⇒ Z = 7, प्रोटॉन = 7। न्यूट्रॉन = 14 – 7 = 7। दिया है: नाइट्रोजन, 147N ✓

पंक्ति 3: प्रोटॉन = 12 ⇒ Z = 12, इलेक्ट्रॉन = 12। न्यूट्रॉन = 24 – 12 = 12। Z = 12 → मैग्नीशियम, 2412Mg

पंक्ति 4: Z = 15 ⇒ प्रोटॉन = 15, इलेक्ट्रॉन = 15। A = 15 + 16 = 31। Z = 15 → फॉस्फोरस, 3115P

पंक्ति 5: A = 1 एवं न्यूट्रॉन = 0 ⇒ प्रोटॉन = 1 – 0 = 1, अतः Z = 1 एवं इलेक्ट्रॉन = 1। Z = 1 → हाइड्रोजन, 11H
क्या आप जानते हैं? पंक्ति 5 प्रोटियम है — पूरी आवर्त सारणी का एकमात्र ऐसा परमाणु जिसके नाभिक में एक भी न्यूट्रॉन नहीं होता, केवल एक अकेला प्रोटॉन। प्राकृतिक हाइड्रोजन का लगभग 99.98% भाग यही है।
प्र14.
अमन अपने सहपाठियों के साथ परमाणु की संरचना पर चर्चा कर रहा था। चर्चा के समय उसे ज्ञात हुआ कि किसी तत्व X की द्रव्यमान संख्या 35 है और उसमें 18 न्यूट्रॉन हैं। इस जानकारी के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए— (i) तत्व X में कितने इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन हैं? (ii) इसका परमाणु क्रमांक क्या है? (iii) तत्व X की पहचान कीजिए। (iv) इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए। (v) इसमें कितने संयोजकता इलेक्ट्रॉन हैं? (vi) यदि इसके नाभिक में दो न्यूट्रॉन और जोड़ दिए जाएँ तो इसकी द्रव्यमान संख्या क्या होगी? (vii) X का नए परमाणु के साथ क्या संबंध होगा?
उत्तर

A = 35 एवं n0 = 18 से आरंभ कीजिए।

(i) 17 प्रोटॉन एवं 17 इलेक्ट्रॉन।

प्रोटॉनों की संख्या = A – न्यूट्रॉनों की संख्या
= 35 – 18
= 17
परमाणु उदासीन है, अतः इलेक्ट्रॉनों की संख्या = प्रोटॉनों की संख्या = 17

(ii) परमाणु क्रमांक Z = 17, क्योंकि Z की परिभाषा ही प्रोटॉनों की संख्या है।

(iii) तत्व क्लोरीन (Cl) है, जिसे 3517Cl लिखा जाता है।

(iv) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = 2, 8, 7।

K-कोश (अधिकतम 2 × 1² = 2): 2 इलेक्ट्रॉन → 17 – 2 = 15 शेष
L-कोश (अधिकतम 2 × 2² = 8): 8 इलेक्ट्रॉन → 15 – 8 = 7 शेष
M-कोश: 7 इलेक्ट्रॉन
विन्यास = 2, 8, 7

(v) 7 संयोजकता इलेक्ट्रॉन — बाह्यतम (M) कोश के इलेक्ट्रॉन। क्लोरीन को अष्टक पूर्ण करने के लिए 8 – 7 = 1 और चाहिए, अतः उसकी संयोजकता 1 है और वह अत्यधिक अभिक्रियाशील है।

(vi) नई द्रव्यमान संख्या = 37।

न्यूट्रॉनों की नई संख्या = 18 + 2 = 20
प्रोटॉन अपरिवर्तित, 17
नई द्रव्यमान संख्या A′ = 17 + 20
= 37, अर्थात 3717Cl

(vii) X एवं नया परमाणु परस्पर समस्थानिक हैं। दोनों का Z = 17 है, अतः दोनों क्लोरीन हैं, परंतु इनकी द्रव्यमान संख्याएँ 35 एवं 37 हैं — समान परमाणु क्रमांक, भिन्न द्रव्यमान संख्या।

ऐसा क्यों होता है: न्यूट्रॉन जोड़ने से तत्व नहीं बदल सकता, क्योंकि तत्व की परिभाषा केवल प्रोटॉनों की संख्या से होती है। दोनों परमाणुओं में अब भी 17 इलेक्ट्रॉन 2, 8, 7 व्यवस्था में हैं, अतः दोनों प्रत्येक रासायनिक अभिक्रिया में एक जैसा व्यवहार करेंगे। अंतर केवल द्रव्यमान का है। ये दोनों वस्तुतः क्लोरीन के वास्तविक समस्थानिक हैं जो प्रकृति में 3 : 1 के अनुपात में मिश्रित हैं, इसीलिए क्लोरीन का औसत परमाणु द्रव्यमान 35.5 u है।
प्र15.
किसी परमाणु के नाभिक में 12 प्रोटॉन और 12 न्यूट्रॉन हैं। अब कल्पना कीजिए कि सभी इलेक्ट्रॉनों को किन्हीं काल्पनिक कणों से प्रतिस्थापित कर दिया जाता है जिनका आवेश इलेक्ट्रॉनों के समान ही है परंतु वे 500 गुना अधिक भारी हैं। इस प्रतिस्थापन का परमाणु के निम्नलिखित गुणों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? (i) परमाणु क्रमांक (ii) परमाणु द्रव्यमान (iii) द्रव्यमान संख्या (iv) समग्र आवेश
उत्तर

यह परमाणु मैग्नीशियम है: 12 प्रोटॉन, 12 न्यूट्रॉन और इसलिए 12 इलेक्ट्रॉन।

(i) परमाणु क्रमांक — कोई परिवर्तन नहीं। यह 12 ही रहेगा। परमाणु क्रमांक की परिभाषा प्रोटॉनों की संख्या है, और नाभिक को छुआ ही नहीं गया।

(ii) परमाणु द्रव्यमान — बढ़ेगा, लगभग 3.3 u। केवल यही राशि बदलती है।

एक इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान ≈ प्रोटॉन के द्रव्यमान का 1/1836 ≈ 5.5 × 10–4 u

एक भारी कण का द्रव्यमान = 500 × 5.5 × 10–4 u
= 0.275 u

ऐसे 12 कणों का कुल द्रव्यमान = 12 × 0.275 u
= ≈ 3.3 u

मूल परमाणु द्रव्यमान ≈ 24 u (12 प्रोटॉन + 12 न्यूट्रॉन; इलेक्ट्रॉन नगण्य)
नया परमाणु द्रव्यमान ≈ 24 u + 3.3 u = ≈ 27.3 u

महत्त्व केवल संख्या का नहीं, उसके अर्थ का है: सामान्यतः 12 इलेक्ट्रॉन केवल 12 × 5.5 × 10–4 u ≈ 0.0066 u का योगदान देते हैं, इसीलिए हम उनकी उपेक्षा करते हैं। 500 गुना भारी होने पर वे परमाणु में लगभग 14% जोड़ देते हैं और अब उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।

(iii) द्रव्यमान संख्या — कोई परिवर्तन नहीं। यह 24 ही रहेगी।

द्रव्यमान संख्या A = प्रोटॉनों की संख्या + न्यूट्रॉनों की संख्या
= 12 + 12
= 24 (इलेक्ट्रॉन इस गणना में कभी नहीं आते, उनका द्रव्यमान चाहे जो हो)

(iv) समग्र आवेश — कोई परिवर्तन नहीं। परमाणु उदासीन ही रहेगा। प्रतिस्थापी कणों पर इलेक्ट्रॉनों के समान ही आवेश है और उनकी संख्या भी अब भी 12 है।

कुल धनावेश = 12 × (+1) = +12
कुल ऋणावेश = 12 × (–1) = –12
परिणामी आवेश = +12 – 12 = 0
ऐसा क्यों होता है: यह प्रश्न तीन ऐसी अवधारणाओं को अलग करता है जिन्हें विद्यार्थी अक्सर मिला देते हैं। आवेश केवल इस पर निर्भर है कि धनात्मक एवं ऋणात्मक इकाइयाँ कितनी हैं, उनके द्रव्यमान पर नहीं। द्रव्यमान संख्या न्यूक्लिऑनों की गिनती है — एक परिभाषा, अतः नाभिक के बाहर की किसी बात से यह प्रभावित हो ही नहीं सकती। परमाणु द्रव्यमान वास्तविक द्रव्यमान है, अतः इसमें प्रत्येक कण का योगदान होता है; हम इलेक्ट्रॉनों को केवल इसलिए छोड़ देते हैं क्योंकि उनका योगदान अत्यंत सूक्ष्म है, और यह सन्निकटन उसी क्षण टूट जाता है जब वे भारी हो जाएँ।
क्या आप जानते हैं? ठीक ऐसा कण वास्तव में विद्यमान है — म्यूऑन, जिस पर इलेक्ट्रॉन जितना ही आवेश होता है परंतु वह लगभग 207 गुना भारी होता है। भौतिक वैज्ञानिक इनसे 'म्यूऑनिक परमाणु' बनाते हैं। भारी कण नाभिक के कहीं अधिक निकट परिक्रमा करता है, जिससे ऐसे परमाणु नाभिक के आकार को मापने का संवेदनशील साधन बन जाते हैं।
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