इसका कोई निश्चित उत्तर नहीं है, और यही ईमानदार स्थिति है। परंतु हम स्पष्ट रूप से यह कह सकते हैं कि हम क्या जानते हैं, क्या बदला है और कठिनाई कहाँ है।
इस अध्याय का इतिहास क्या संकेत देता है। हर पीढ़ी को अपना मॉडल पूर्ण लगा, और हर पीढ़ी को सुधारा गया।
- डाल्टन: परमाणु अविभाज्य है — कैथोड किरणों एवं रेडियोधर्मिता ने उलट दिया।
- टॉमसन: आवेश एक गोले में फैला है — स्वर्ण पर्णिका प्रयोग ने उलट दिया।
- रदरफोर्ड: इलेक्ट्रॉन ग्रहों की भाँति परिक्रमा करते हैं — स्थायित्व की व्याख्या नहीं कर सका।
- बोर: इलेक्ट्रॉन निश्चित कोशों में — बाद में यह एक सन्निकटन सिद्ध हुआ।
- आज: इलेक्ट्रॉन को मेघ के रूप में वर्णित किया जाता है। हम उस क्षेत्र का पूर्वानुमान लगा सकते हैं जहाँ उसके होने की संभावना सर्वाधिक है, परंतु यह नहीं बता सकते कि किसी क्षण वह ठीक कहाँ है।
वास्तविक कठिनाई कहाँ है। बोर की कक्षा से इलेक्ट्रॉन मेघ तक का परिवर्तन केवल बेहतर चित्र बनाना नहीं है। यह इस बात का कथन है कि कुछ प्रश्नों के सटीक उत्तर हो ही नहीं सकते — कि इस पैमाने पर प्रकृति का वर्णन निश्चित स्थितियों से नहीं, संभावनाओं से होता है। यह सीमा भौतिकी में ही अंतर्निहित है, केवल हमारे उपकरणों की सीमा नहीं।
दो पक्ष, दोनों तर्कसंगत
- सैद्धांतिक रूप से हाँ — बेहतर सिद्धांत एवं बेहतर उपकरण (STM, TEM, कण त्वरक) सीमा को निरंतर आगे बढ़ाते रहते हैं। अब हम जानते हैं कि प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन की भी आंतरिक संरचना है, जिसकी कल्पना रदरफोर्ड नहीं कर सकते थे।
- पूर्ण रूप से नहीं — क्योंकि 'इलेक्ट्रॉन इस क्षण ठीक कहाँ है' यह ऐसा प्रश्न हो सकता है जिसका उपकरण चाहे जितने अच्छे हो जाएँ, कोई सटीक उत्तर है ही नहीं।
सशक्त उत्तर दोनों को जोड़ता है: हमारा वर्णन निरंतर बेहतर एवं अधिक उपयोगी होता जा रहा है, परंतु क्रिकेट की गेंद की स्थिति के विषय में जैसी निश्चितता हमें है वैसी निश्चितता परमाणु के भीतर उपलब्ध नहीं है। हम जो कर सकते हैं — पूर्वानुमान लगाना, गणना करना और विश्वास के साथ निर्माण करना — वह कभी बढ़ना बंद नहीं हुआ। जैसा अध्याय कहता है, परमाणु के रहस्यों की खोज की यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है।