प्र1.
आप आश्चर्य कर रहे होंगे कि बोर का मॉडल परमाणु के स्थायित्व को किस प्रकार समझाता है?
उत्तर
एक अभिगृहीत के द्वारा — अनुमत वृत्ताकार पथ स्थायी अवस्थाएँ हैं, और स्थायी अवस्था में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा गतिमान रहते हुए भी स्थिर रहती है।
दोनों मॉडलों को आमने-सामने रखिए।
| रदरफोर्ड | बोर | |
|---|---|---|
| इलेक्ट्रॉन का पथ | कोई भी वृत्ताकार कक्षा | केवल निश्चित कोश K, L, M, N (n = 1, 2, 3, 4) |
| परिक्रमा के दौरान ऊर्जा | निरंतर विकिरित होती रहती है | स्थिर रहती है — कोई क्षय नहीं |
| पूर्वानुमानित परिणति | सर्पिलाकार पथ पर नाभिक में गिरना; परमाणु नष्ट | अपने कोश में बना रहता है; परमाणु स्थायी |
| ऊर्जा परिवर्तन | सतत | केवल छलाँग में, दो स्तरों के अंतर के बराबर |
बाहर की ओर जाने पर स्तरों की ऊर्जा बढ़ती जाती है: K (n = 1) नाभिक के सबसे निकट और न्यूनतम ऊर्जा वाला है; L (n = 2) में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा K से अधिक है। इलेक्ट्रॉन कोश तभी बदलता है जब वह ठीक दोनों स्तरों की ऊर्जा का अंतर अवशोषित अथवा उत्सर्जित करे — बीच में कुछ भी अनुमत नहीं, अतः भीतर की ओर धीरे-धीरे सर्पिल गति का कोई मार्ग ही नहीं बचता।
ऐसा क्यों होता है: बोर ने स्थायी अवस्थाओं की व्युत्पत्ति नहीं की; उन्होंने इन्हें मान लिया क्योंकि इससे मॉडल प्रयोगों से मेल खाने लगा, विशेषकर परमाणु स्पेक्ट्रम की तीक्ष्ण रेखाओं से। अभिगृहीत का अर्थ यही है — ऐसी मान्यता जिसका मूल्यांकन उसके परिणामों से होता है। बाद में क्वांटम यांत्रिकी ने समझाया कि केवल कुछ ऊर्जाएँ ही अनुमत क्यों हैं।