कण फिर भी विक्षेपित होते, परंतु नाभिक द्वारा प्रतिकर्षित होने के बजाय आकर्षित होते — अतः विक्षेपण दूसरी दिशा में मुड़ता और कोई भी कण नाभिक से सीधा टकराकर वापस नहीं लौटता।
| α-कण (आवेश +2) | ऋणावेशित कण (जैसे इलेक्ट्रॉन) | |
|---|---|---|
| नाभिक से बल | प्रतिकर्षण | आकर्षण |
| नाभिक के निकट पथ | दूर धकेला जाता है, बाहर की ओर मुड़ता है | भीतर खिंचता है, नाभिक के चारों ओर मुड़ता है |
| बड़े कोण पर वापसी | हाँ, कुछ कण लौट आते हैं | सीधी वापसी नहीं; कण पास से घूमकर निकल जाते हैं |
| परमाणु के अपने इलेक्ट्रॉनों का प्रभाव | लगभग शून्य (α लगभग 7300 गुना भारी है) | प्रबल — द्रव्यमान समान होने से प्रत्येक टक्कर पथ बहुत बदल देती है |
ऋणावेशित कणों से प्रयोग और भी दो कारणों से बिगड़ जाता —
- इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान परमाणु के अपने इलेक्ट्रॉनों के बराबर है, अतः वह उन्हीं से बुरी तरह प्रकीर्ण हो जाता। α-कण इलेक्ट्रॉन से लगभग 7300 गुना भारी होने के कारण उन्हें अनदेखा करके निकल जाता है और केवल नाभिक ही उसे मोड़ सकता है। यही α-कण को इतना स्वच्छ अन्वेषी बनाता है।
- आकर्षण बल कण को लक्ष्य से दूर धकेलने के बजाय उसकी ओर खींचता है, अतः कण प्रकीर्ण होने के बजाय पकड़ा भी जा सकता है।