प्र1.
मान लीजिए कि आपने टॉमसन के विवरणानुसार स्वयं एक ‘परमाणु’ बनाया जिसमें धनात्मक आवेश के लिए मिट्टी और वितरित इलेक्ट्रॉनों के लिए छोटे मोतियों का उपयोग किया। क्या होगा यदि — (i) मिट्टी पर धनावेश उसमें वितरित मोतियों के कुल ऋणावेश से कम हो? (ii) त्रुटिवश यदि मिट्टी में थोड़ा-सा भी ऋणावेश हो तो क्या आपका मॉडल अब भी उदासीन परमाणु को प्रदर्शित करेगा?
उत्तर
(i) मॉडल पर परिणामी ऋणावेश होगा — यह उदासीन परमाणु नहीं, बल्कि ऋणायन (ऐनायन) को प्रदर्शित करेगा।
परिणामी आवेश = (मिट्टी पर धनावेश) + (मोतियों पर कुल ऋणावेश)
यदि धनावेश का परिमाण ऋणावेश से कम है तो योग ऋणात्मक होगा
जैसे — मिट्टी +8, मोती 10 × (–1) = –10 → परिणामी = –2
यदि धनावेश का परिमाण ऋणावेश से कम है तो योग ऋणात्मक होगा
जैसे — मिट्टी +8, मोती 10 × (–1) = –10 → परिणामी = –2
वास्तविक उदाहरण ऑक्साइड आयन O2– है: 8 प्रोटॉन, 10 इलेक्ट्रॉन, परिणामी आवेश –2।
(ii) नहीं — यह उदासीन परमाणु को प्रदर्शित नहीं करेगा, बल्कि यह परमाणु का मॉडल ही नहीं रह जाएगा।
- गणितीय रूप से आवेश कभी निरस्त हो ही नहीं सकते: ऋणात्मक मिट्टी + ऋणात्मक मोती का योग सदैव ऋणात्मक ही होगा।
- वैचारिक रूप से टॉमसन के मॉडल का पूरा आधार यही है कि परमाणु का धनावेश गोले में और ऋणावेश उसमें धँसे कणों में रहता है। यदि गोला ही ऋणावेशित हो जाए तो इलेक्ट्रॉनों को संतुलित करने के लिए कुछ बचता ही नहीं।
ऐसा क्यों होता है: उदासीनता एक सटीक हिसाब की शर्त है — प्रोटॉनों की संख्या = इलेक्ट्रॉनों की संख्या, अतः कुल धनावेश एवं कुल ऋणावेश परिमाण में समान होकर निरस्त हो जाते हैं। उदासीन परमाणु के किसी भी मॉडल को यह शर्त पूरी करनी ही होगी।