कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 1 अन्वय करने की पूरी विधि के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
किसी भी श्लोक का अन्वय करने के लिए क्रम से क्या-क्या करें?
उत्तर

छह चरण — यही पूरे परिशिष्ट का निचोड़ है।

चरणक्या करेंपुस्तक का आधार
पदच्छेद कीजिए — सन्धि खोलकर सब पद अलग-अलग लिखिए।दोनों उदाहरणों में सबसे पहले यही है
क्रियापद ढूँढ़िए — कितने वाक्य हैं, यह क्रियाओं की गिनती से पता चलता है।‘प्रथमतः क्रियापदेन आकाङ्क्षाप्रश्नः क्रियते’
हर क्रिया का कर्ता (प्रथमान्त पद) और कर्म (द्वितीयान्त पद) जोड़िए।‘कर्तृ-कर्म-क्रियास्तावत् श्लोके योज्याः’
विशेषण अपने विशेष्य से ठीक पहले रखिए; लिङ्ग-वचन-विभक्ति मिलाकर जाँचिए।‘आद्ये विशेषणं योज्यं विशेष्यं तदनन्तरम्’ · ‘यथा लिङ्गविशेषणे’
तृतीयादि पद, क्त्वान्त/ल्यबन्त/तुमुन्नन्त तथा अव्यय अपने-अपने सम्बद्ध पद के साथ जमाइए; क्त्वान्त आदि क्रिया से पहले।‘किमो रूपं पुरस्कृत्य तृतीयादीनि योजयेत्’ · ‘क्त्वा-णमुल्-ल्यप्-प्रभृत्येवं पूर्वम्’
क्रियापद अन्त में रखिए; कर्ता या क्रिया गायब हो तो अध्याहार करके कोष्ठक में जोड़िए।‘सर्वान्ते क्रियापदं लिखेत्’ · ‘सुप्तं पदम् योजनीयम्’
साँचा — (अध्याहृत पद) · कर्ता का विशेषण · कर्ता · षष्ठी/सप्तमी पद · तृतीया/चतुर्थी/पञ्चमी पद · क्त्वान्त-ल्यबन्त · कर्म का विशेषण · कर्म · अव्यय (न, अपि, तु, हि, नूनम्) · क्रिया
जाँच का एक सरल उपाय: अन्वय लिख लेने के बाद उसे पढ़िए और गिनिए — क्या श्लोक का हर पद अन्वय में एक बार आया? न कोई छूटा, न कोई दुहराया गया? यदि हाँ, और वाक्य का अर्थ बन रहा है, तो अन्वय ठीक है। अन्वय में पद घटते-बढ़ते नहीं, केवल जगह बदलते हैं — कोष्ठक वाले अध्याहृत पद इसका अपवाद हैं।
प्र२.
अन्वय करते समय छात्र कौन-सी भूलें सबसे अधिक करते हैं?
उत्तर
भूलअशुद्धशुद्धनियम
पदच्छेद किए बिना अन्वय शुरू कर देना‘शास्त्राण्यधीत्यापि’ को एक पद मान लेनाशास्त्राणि + अधीत्य + अपिपहले सन्धि-विच्छेद
क्रिया बीच में छोड़ देनासम्पूर्णकुम्भः न करोति शब्दम्सम्पूर्णकुम्भः शब्दं न करोतिसर्वान्ते क्रियापदं लिखेत्
विशेषण को विशेष्य से दूर रखनाअर्धः घोषं नूनं घटः उपैतिअर्धः घटः घोषं नूनम् उपैतिआद्ये विशेषणं योज्यम्
‘न’ को क्रिया से अलग कर देनान कुलीनः विद्वान् गर्वं करोतिकुलीनः विद्वान् गर्वं न करोतिनिषेध क्रिया से सटा रहता है
क्त्वान्त/ल्यबन्त को क्रिया के बाद रखनामूर्खाः भवन्ति शास्त्राणि अधीत्यशास्त्राणि अधीत्य मूर्खाः भवन्तिक्त्वा-णमुल्-ल्यप्-प्रभृत्येवं पूर्वम्
अध्याहृत पद बिना कोष्ठक के लिखनाकेचन शास्त्राणि अधीत्य…(केचन) शास्त्राणि अधीत्य…जोड़ा हुआ पद कोष्ठक में
अन्वय के बदले हिन्दी अर्थ लिख देना‘भरा घड़ा आवाज़ नहीं करता’सम्पूर्णकुम्भः शब्दं न करोतिअन्वय संस्कृत में ही होता है
यद्-तद् का जोड़ा तोड़ देनाक्रियावान् यः सः विद्वान्यः क्रियावान् सः पुरुषः तु विद्वान्‘यः’ वाला वाक्यांश पहले, ‘सः’ वाला बाद में
एक सुनहरा नियम: अन्वय लिखने के बाद उसे ज़ोर से पढ़िए। यदि वह सरल गद्य जैसा सुनाई दे — जैसे कोई सामान्य संस्कृत वाक्य — तो अन्वय ठीक बना है। यदि पढ़ने में अटके, तो कहीं कोई पद अपनी जगह पर नहीं है।
प्र३.
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — कुछ श्लोकों का अन्वय कीजिए
उत्तर
सूचना — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। शारदा का परिशिष्टम् १ केवल विधि सिखाता है, कोई अभ्यास नहीं देता। नीचे के श्लोक और उनके उत्तर केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं। पहले उत्तर ढँककर स्वयं अन्वय लिखिए, फिर मिलाइए।

१. उद्यम का महत्त्व —

उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः ॥

अन्वयः — लक्ष्मीः उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति। कापुरुषाः ‘दैवेन देयम्’ इति वदन्ति। दैवं निहत्य आत्मशक्त्या पौरुषं कुरु। यत्ने कृते यदि न सिध्यति (तर्हि) अत्र कः दोषः ?
(कर्ता ‘लक्ष्मीः’ पहले; ल्यबन्त ‘निहत्य’ अपनी क्रिया ‘कुरु’ से पूर्व; तृतीयान्त ‘आत्मशक्त्या’ क्रिया से पहले; ‘यत्ने कृते’ भावलक्षण-सप्तमी; ‘तर्हि’ अध्याहार्य।)

२. संगति का फल —

सङ्गः सर्वात्मना त्याज्यः स चेत् त्यक्तुं न शक्यते ।
स सद्भिः सह कर्तव्यः सन्तः सङ्गस्य भेषजम् ॥

अन्वयः — सङ्गः सर्वात्मना त्याज्यः (अस्ति)। सः चेत् त्यक्तुं न शक्यते, (तर्हि) सः सद्भिः सह कर्तव्यः। सन्तः सङ्गस्य भेषजम् (सन्ति)।
(तीनों वाक्यों में ‘अस्ति/सन्ति’ अध्याहार्य; तुमुन्नन्त ‘त्यक्तुम्’ अपनी क्रिया ‘शक्यते’ से पहले; तृतीयान्त ‘सद्भिः’ के साथ अव्यय ‘सह’।)

३. वाणी का गुण —

केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजाः ।
वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम् ॥

अन्वयः — केयूराणि पुरुषं न भूषयन्ति, चन्द्रोज्ज्वलाः हाराः न (भूषयन्ति), स्नानं न, विलेपनं न, कुसुमं न, अलङ्कृताः मूर्धजाः न (भूषयन्ति)। या संस्कृता (वाणी) धार्यते सा एका वाणी पुरुषं समलङ्करोति। भूषणानि खलु क्षीयन्ते, वाग्भूषणं सततं भूषणम् (भवति)।
(‘न भूषयन्ति’ बार-बार अध्याहार्य है; ‘या … सा’ का जोड़ा मिलाइए; ‘खलु’ तथा ‘सततम्’ अव्यय अपनी क्रिया के पास।)

४. छोटा गद्य-वाक्य (खण्डान्वय की विधि से) — ‘गुरुः शिष्याय ज्ञानं ददाति।’

प्रश्नोत्तर — क्रियापदं किम् ? — ददाति। कः ददाति ? — गुरुः ददाति। गुरुः किं ददाति ? — गुरुः ज्ञानं ददाति। गुरुः कस्मै ज्ञानं ददाति ? — गुरुः शिष्याय ज्ञानं ददाति। अन्वयः — गुरुः शिष्याय ज्ञानं ददाति।
(‘कस्मै ?’ चतुर्थी का प्रश्न है — सम्प्रदान कारक ‘शिष्याय’ को खींच लाता है।)

आगे क्या: यही विधि अब शारदा के हर पाठ के श्लोकों पर लगाइए — पाठ २, ३, ६, ७ और ९ के सुभाषित इसी अभ्यास के लिए सबसे अच्छे हैं। जब अन्वय स्वयं बनने लगे, तब अर्थ और भाव लिखना अपने-आप सरल हो जाएगा — पुस्तक का यही वाक्य याद रखिए : ‘तदनन्तरमेव श्लोकस्य अर्थम् अवगन्तुं शक्यते।’
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