कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 1 खण्डान्वय के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
पुस्तक का दूसरा उदाहरण-श्लोक तथा उसका पदच्छेद क्या है?
उत्तर

श्लोकः (पृष्ठ 165) —

सम्पूर्णकुम्भो न करोति शब्दमर्धो घटो घोषमुपैति नूनम् ।
विद्वान् कुलीनो न करोति गर्वमल्पो जनो जल्पति साट्टहासम् ॥

पदच्छेदः (पुस्तक के शब्दों में, अठारह पद) — सम्पूर्णकुम्भः, न, करोति, शब्दम्, अर्धः, घटः, घोषम्, उपैति, नूनम्, विद्वान्, कुलीनः, न, करोति, गर्वम्, अल्पः, जनः, जल्पति, साट्टहासम्।

सन्धि-विच्छेद, जिससे पदच्छेद बना —

श्लोक मेंविच्छेदसन्धि
सम्पूर्णकुम्भो नसम्पूर्णकुम्भः + नविसर्ग सन्धि (उत्व)
शब्दमर्धो घटोशब्दम् + अर्धः + घटःम्-सन्धि + विसर्ग सन्धि
घोषमुपैतिघोषम् + उपैतिम्-सन्धि (उप + एति = उपैति — वृद्धि सन्धि)
कुलीनो नकुलीनः + नविसर्ग सन्धि
गर्वमल्पो जनोगर्वम् + अल्पः + जनःम्-सन्धि + विसर्ग सन्धि
साट्टहासम्स (सह) + अट्टहासम्अट्टहास-सहित — यहाँ क्रियाविशेषण
पदों के अर्थ: सम्पूर्णकुम्भः = पूरा भरा घड़ा · शब्दम् = आवाज़ · अर्धः घटः = आधा भरा घड़ा · घोषम् = शोर · उपैति = प्राप्त होता है, करता है · नूनम् = निश्चय ही · कुलीनः = अच्छे कुल का, सुसंस्कृत · गर्वम् = घमंड · अल्पः जनः = ओछा/अल्पज्ञ मनुष्य · जल्पति = बकबक करता है · साट्टहासम् = ठहाके लगाते हुए।
प्र२.
पुस्तक की खण्डान्वय-तालिका पूरी दीजिए — शिक्षक क्या पूछते हैं और छात्र क्या उत्तर देते हैं?
उत्तर

पृष्ठ 165–166 की पूरी तालिका नीचे ज्यों-की-त्यों दी गई है। यह प्रश्न-पत्र नहीं है — दोनों स्तम्भ पुस्तक में पहले से भरे हुए छपे हैं। यह कक्षा का एक आदर्श संवाद है, जिसे देखकर छात्र स्वयं किसी भी श्लोक पर यही क्रम चला सकते हैं।

क्र.सं.शिक्षकः प्रश्नान् करोति।छात्राः उत्तराणि वदन्ति।
प्रथमचरणे क्रियापदं किम् ?करोति।
कः न करोति ?सम्पूर्णकुम्भः न करोति।
सम्पूर्णकुम्भः किं न करोति ?सम्पूर्णकुम्भः शब्दं न करोति।
द्वितीयचरणे क्रियापदं किम् ?उपैति।
कः उपैति ?घटः उपैति।
कीदृशः घटः उपैति ?अर्धः घटः उपैति।
अर्धः घटः किम् उपैति ?अर्धः घटः घोषम् उपैति।
अर्धः घटः घोषं कथम् उपैति ?अर्धः घटः घोषं नूनम् उपैति।
तृतीयचरणे क्रियापदं किम् ?करोति।
१०कः न करोति ?विद्वान् न करोति।
११कीदृशः विद्वान् न करोति ?कुलीनः विद्वान् न करोति।
१२कुलीनः विद्वान् किं न करोति ?कुलीनः विद्वान् गर्वं न करोति।
१३चतुर्थचरणे क्रियापदं किम् ?जल्पति।
१४कः जल्पति ?जनः जल्पति।
१५कीदृशः जनः जल्पति ?अल्पः जनः जल्पति।
१६अल्पः जनः कथं जल्पति ?अल्पः जनः साट्टहासं जल्पति।
तालिका का साँचा पकड़िए — हर चरण में वही चार कदम: (क) क्रियापदं किम् ? — क्रिया पकड़ो; (ख) कः ? — कर्ता जोड़ो; (ग) कीदृशः ? — कर्ता का विशेषण जोड़ो; (घ) किम् / कथम् ? — कर्म या क्रियाविशेषण जोड़ो। ध्यान दीजिए कि हर उत्तर में पिछला उत्तर भी दुहराया जाता है — इसीलिए अन्तिम उत्तर ही उस चरण का पूरा अन्वय बन जाता है। यही पुस्तक का कथन है — ‘अन्ते समग्रस्य श्लोकस्य अन्वयः स्वयमेव भविष्यति’।
पुस्तक की छपाई के तीन बिन्दु (जैसा छपा है, वैसा ही बताया जा रहा है): (१) क्र.सं. का स्तम्भ पुस्तक में खाली छपा है — ऊपर की संख्याएँ पढ़ने की सुविधा के लिए यहाँ जोड़ी गई हैं; (२) आठवीं पंक्ति का प्रश्न पुस्तक में प्रश्नवाचक चिह्न के स्थान पर पूर्णविराम के साथ छपा है — ‘अर्धः घटः घोषं कथम् उपैति।’; (३) अन्तिम पंक्ति का उत्तर पुस्तक में प्रश्नवाचक चिह्न के साथ छपा है — ‘अल्पः जनः साट्टहासं जल्पति ?’। दोनों मुद्रण-स्खलन हैं; ऊपर की तालिका में चिह्न ठीक करके दिए गए हैं, शब्द वही हैं जो पुस्तक में हैं।
प्र३.
तालिका से निकला पूरा अन्वय, अर्थ तथा भाव क्या है?
उत्तर

अन्वयः (पृष्ठ 166, पुस्तक का अन्तिम वाक्य) —

सम्पूर्णकुम्भः शब्दं न करोति । अर्धः घटः घोषं नूनम् उपैति ।
कुलीनः विद्वान् गर्वं न करोति । अल्पः जनः साट्टहासं जल्पति ॥

अर्थ —

अन्वयहिन्दी अर्थ
सम्पूर्णकुम्भः शब्दं न करोति।पूरा भरा हुआ घड़ा आवाज़ नहीं करता।
अर्धः घटः घोषं नूनम् उपैति।आधा भरा घड़ा निश्चय ही शोर करता है।
कुलीनः विद्वान् गर्वं न करोति।कुलीन (सुसंस्कृत) विद्वान् घमंड नहीं करता।
अल्पः जनः साट्टहासं जल्पति।ओछा (अल्पज्ञ) मनुष्य ठहाके लगाते हुए बकबक करता रहता है।

भावः — जिसमें सचमुच गुण है, वह चुप रहता है; जिसमें थोड़ा-सा है, वही शोर मचाता है। कवि ने घड़े का दृष्टान्त देकर यह बात कही है — भरा घड़ा छलकता नहीं। पहली दो पंक्तियाँ दृष्टान्त हैं, अगली दो दार्ष्टान्तिक (जिस पर दृष्टान्त लागू होता है)। यह दृष्टान्त अलङ्कार का सुन्दर उदाहरण है।

अन्वय कैसे बना, एक दृष्टि में: श्लोक का क्रम था — ‘सम्पूर्णकुम्भो न करोति शब्दम्’ (क्रिया बीच में, कर्म अन्त में) — क्योंकि छन्द ऐसा माँगता था। अन्वय ने उसे गद्य-क्रम में लाया — ‘सम्पूर्णकुम्भः शब्दं न करोति’ (कर्ता → कर्म → क्रिया)। इसी प्रकार ‘अर्धो घटो घोषमुपैति नूनम्’ का ‘नूनम्’ क्रिया के बाद था, अन्वय में क्रिया से पहले आ गया।
प्र४.
यह तालिका अभ्यास नहीं है तो छात्र इसका उपयोग कैसे करें?
उत्तर

इसे ‘हल’ नहीं करना, इसकी नक़ल पर चलना है। तालिका के दोनों स्तम्भ भरे हुए हैं, इसलिए इसमें कुछ लिखना शेष नहीं है। उपयोग की विधि यह है :

चरण १ — कोई भी श्लोक लीजिए और पहले उसका पदच्छेद कीजिए।
चरण २ — श्लोक को चार चरणों में बाँटिए।
चरण ३ — हर चरण पर बारी-बारी वही चार प्रश्न पूछिए — क्रियापदं किम् ? · कः ? · कीदृशः ? · किम् / कथम् / केन ?
चरण ४ — हर उत्तर में पिछला उत्तर दुहराइए, ताकि वाक्य बढ़ता जाए।
चरण ५ — हर चरण का अन्तिम उत्तर लिख लीजिए — चारों मिलकर पूरा अन्वय बन जाएँगे।

उसी विधि से एक और श्लोक (यहाँ पूरी तरह करके दिखाया गया) —काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः।

प्रश्नःउत्तरम्
प्रथमचरणे क्रियापदं किम् ?(अस्ति) — अध्याहार्यम्।
कः कृष्णः (अस्ति) ?काकः कृष्णः (अस्ति)।
अन्यः कः कृष्णः (अस्ति) ?पिकः (अपि) कृष्णः (अस्ति)।
तर्हि कः भेदः ?पिककाकयोः कः भेदः (अस्ति) ?

अन्वयः — काकः कृष्णः (अस्ति), पिकः (अपि) कृष्णः (अस्ति)। पिककाकयोः कः भेदः (अस्ति) ?

अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं — परिशिष्ट पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए हैं। पहले स्वयं तालिका बनाइए, फिर उत्तर देखिए।
  1. निम्न पंक्ति पर खण्डान्वय के प्रश्न-उत्तर बनाइए — ‘बालः चन्द्रं पश्यति।’
    उत्तर — क्रियापदं किम् ? — पश्यति। कः पश्यति ? — बालः पश्यति। बालः किं पश्यति ? — बालः चन्द्रं पश्यति। अन्वयः — बालः चन्द्रं पश्यति।
  2. निम्न श्लोक का अन्वय कीजिए —
    अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम् ।
    अधनस्य कुतो मित्रम् अमित्रस्य कुतः सुखम् ॥

    अन्वयः — अलसस्य विद्या कुतः ? अविद्यस्य धनं कुतः ? अधनस्य मित्रं कुतः ? अमित्रस्य सुखं कुतः ?
    (चारों चरणों में क्रिया अध्याहार्य है — ‘भवति’। षष्ठ्यन्त पद ‘अलसस्य’ आदि अपने-अपने प्रथमान्त पद से जुड़े हैं।)
  3. निम्न श्लोक का अन्वय कीजिए —
    पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम् ।
    कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम् ॥

    अन्वयः — या विद्या तु पुस्तकस्था (अस्ति), (यत्) धनं परहस्तगतम् (अस्ति), कार्यकाले समुत्पन्ने सा विद्या न (भवति), तत् धनं न (भवति)।
    (यद्-तद् का सम्बन्ध पकड़िए; ‘कार्यकाले समुत्पन्ने’ सप्तमी में भावलक्षण-सप्तमी है — ‘काम आ पड़ने पर’।)
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