परिभाषा (पुस्तक के शब्दों में) — ‘अपेक्षित-विषयस्य ज्ञाने इच्छा आकाङ्क्षा। पूर्वपदस्य अग्रिमपदस्य वा ज्ञाने इच्छा इत्यपि वक्तुं शक्नुमः।’ — जो बात अभी अधूरी है, उसे जानने की इच्छा ही आकाङ्क्षा है। एक पद सुनते ही मन अपने-आप पूछता है — ‘और?’
पुस्तक इसके दो भेद देती है —
(क) पूर्वपदस्य ज्ञाने इच्छा — ‘पठति, लिखति, खादति, ददाति, पश्यति, नयति, भवन्ति, कुर्वन्ति, कुरु, स्मर, त्यज, गतम्, प्राप्तम्, लब्धम्, कृतम्, ज्ञातव्यम्, त्यक्तव्यम्’ — ऐसे क्रियापद श्लोक में हो सकते हैं। ‘तर्हि अत्र क्रियापदस्य श्रवणानन्तरं काचित् जिज्ञासा (ज्ञातुम् इच्छा) भवति।’ जैसे ‘पठति’ सुनते ही ये प्रश्न उठते हैं :
| प्रश्न | क्या खोज रहा है | विभक्ति / कोटि |
|---|---|---|
| कः पठति ? | कर्ता | प्रथमा |
| किं पठति ? | कर्म | द्वितीया |
| कुत्र पठति ? | स्थान | सप्तमी (अधिकरण) |
| कदा पठति ? | समय | कालवाचक |
| कथं पठति ? | प्रकार | क्रियाविशेषण / तृतीया |
| किमर्थं पठति ? | प्रयोजन | चतुर्थी / तादर्थ्य |
| किं निमित्तं पठति ? | निमित्त | हेतु |
| किं कृत्वा पठति ? | पूर्वकालिक क्रिया | क्त्वान्त / ल्यबन्त |
(ख) अग्रिमपदस्य ज्ञाने इच्छा — ‘श्लोके प्रथमान्तं पदं किम् ? द्वितीयान्तं पदं किम् ? तृतीयान्तं पदं किम् ? इत्यादिकम् अत्र उदाहरणं भवितुमर्हति।’ — यहाँ प्रश्न विभक्ति के नाम से पूछा जाता है और उत्तर में वह पद ढूँढ़ा जाता है।