प्र१.
खण्डान्वय किसे कहते हैं, और पुस्तक ने उसके नियम किन श्लोकों में दिए हैं?
उत्तर
परिभाषा — पुस्तक कहती है — ‘खण्डशः अन्वयः खण्डान्वयः इति। तन्नाम आरम्भे एव श्लोकस्य पूर्णभागस्य अन्वयः न क्रियते अपि तु प्रतिपदं परस्परम् अन्वयः क्रियते। तदपि प्रश्नोत्तरमाध्यमेन। अन्ते समग्रस्य श्लोकस्य अन्वयः स्वयमेव भविष्यति।’ — अर्थात् आरम्भ में ही पूरे श्लोक का अन्वय नहीं किया जाता; एक-एक पद जोड़ा जाता है, वह भी प्रश्नोत्तर के द्वारा — और अन्त में पूरा अन्वय अपने आप बन जाता है।
नियम-श्लोक (पृष्ठ 163, दो श्लोक) —
कर्तृ-कर्म-क्रियास्तावच्छ्लोके योज्यास्ततः परम् ।
किमो रूपं पुरस्कृत्य तृतीयादीनि योजयेत् ॥
ल्यबन्तञ्च तुमुन्तञ्च क्त्वान्तं कर्मविभूषितम् ।
अन्वयस्थपदानाञ्च यथा लिङ्गविशेषणे ॥
किमो रूपं पुरस्कृत्य तृतीयादीनि योजयेत् ॥
ल्यबन्तञ्च तुमुन्तञ्च क्त्वान्तं कर्मविभूषितम् ।
अन्वयस्थपदानाञ्च यथा लिङ्गविशेषणे ॥
चारों पंक्तियों का अर्थ —
| पंक्ति | अर्थ | व्यवहार |
|---|---|---|
| कर्तृ-कर्म-क्रियास्तावत् श्लोके योज्याः | पहले श्लोक में कर्ता, कर्म और क्रिया — ये तीन जोड़िए | ‘करोति’ → ‘सम्पूर्णकुम्भः’ → ‘शब्दम्’ |
| ततः परं किमो रूपं पुरस्कृत्य तृतीयादीनि योजयेत् | उसके बाद ‘किम्’ शब्द के रूपों (कः, किम्, केन, कस्मै, कस्मात्, कस्य, कस्मिन्, कीदृशः, कथम्…) को आगे रखकर, अर्थात् उन्हीं प्रश्नों से, तृतीया आदि विभक्ति वाले पद जोड़िए | ‘कथम् उपैति ?’ → ‘नूनम्’ |
| ल्यबन्तञ्च तुमुन्तञ्च क्त्वान्तं कर्मविभूषितम् | ल्यबन्त (आगत्य), तुमुन्नन्त (गन्तुम्) तथा क्त्वान्त (गत्वा) पदों को उनके कर्म-सहित जोड़िए | ‘शास्त्राणि अधीत्य’ — कर्म ‘शास्त्राणि’ ल्यबन्त के साथ ही |
| अन्वयस्थपदानाञ्च यथा लिङ्गविशेषणे | अन्वय में रखे पदों का लिङ्ग तथा विशेषण जैसा उपयुक्त हो, वैसा (विशेष्य के अनुसार) रखिए | ‘अर्धः घटः’ — दोनों पुंलिङ्ग, प्रथमा, एकवचन |
‘किमो रूपं पुरस्कृत्य’ यही विधि का हृदय है: ‘किमः’ अर्थात् ‘किम्’ शब्द का। ‘किम्’ के रूप ही प्रश्न-शब्द हैं — कः, कम्, केन, कस्मै, कस्मात्, कस्य, कस्मिन्, तथा उससे बने कीदृशः, कथम्, कदा, कुत्र, किमर्थम्। हर विभक्ति का अपना प्रश्न है — और हर प्रश्न ठीक उसी विभक्ति का पद खींच लाता है। इसीलिए इस विधि का दूसरा नाम आकाङ्क्षाविधिः है।