कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 1 दण्डान्वय के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
पुस्तक का उदाहरण-श्लोक तथा उसका पदच्छेद क्या है?
उत्तर

श्लोक (पृष्ठ 162, जैसा पुस्तक में छपा है) —

शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खाः यस्तु क्रियावान् पुरुषस्स विद्वान् ।
सुचिन्तितं चौषधमातुराणां न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ॥

पदच्छेदः (पुस्तक के अपने क्रम में, उन्नीस पद) — नीचे की संख्याएँ केवल गिनती की हैं; अन्वय का क्रम अलग है, वह अगले-अगले कार्ड में (पृष्ठ 163 की संख्या-सूची में) दिया गया है।

गणनापदम्क्या हैहिन्दी अर्थ
शास्त्राणिनपुं., द्वितीया बहुवचन (कर्म)शास्त्रों को
अधीत्यल्यबन्त अव्यय (अधि+इ)पढ़कर
अपिअव्ययभी
भवन्तिभू, लट्, प्रथमपुरुष बहुवचनहोते हैं
मूर्खाःपुं., प्रथमा बहुवचनमूर्ख
यःयद् शब्द, प्रथमा एकवचनजो
तुअव्ययपरन्तु / ही
क्रियावान्मतुप्-प्रत्ययान्त विशेषण, प्रथमा एकवचनकर्मशील, आचरण करने वाला
पुरुषःपुं., प्रथमा एकवचनपुरुष
१०सःतद् शब्द, प्रथमा एकवचनवह
११विद्वान्विद्वस् शब्द, प्रथमा एकवचनविद्वान्
१२सुचिन्तितम्‘औषधम्’ का विशेषण — नपुं., प्रथमा एकवचनभली-भाँति सोची-समझी हुई
१३अव्ययऔर
१४औषधम्नपुं., प्रथमा एकवचन (कर्ता)औषधि
१५आतुराणाम्पुं., षष्ठी बहुवचनरोगियों को / रोगियों का
१६निषेधार्थक अव्ययनहीं
१७नाममात्रेणनपुं., तृतीया एकवचनकेवल नाम लेने से
१८करोतिकृ, लट्, प्रथमपुरुष एकवचनकरती है
१९अरोगम्विशेषण, द्वितीया एकवचननीरोग
पदच्छेद पहले क्यों: श्लोक में सन्धि के कारण कई पद चिपके रहते हैं — शास्त्राणि + अधीत्य + अपि = शास्त्राण्यधीत्यापि (यण् तथा दीर्घ सन्धि), च + औषधम् = चौषधम् (वृद्धि सन्धि), आतुराणाम् + न = आतुराणां न, करोति + अरोगम् = करोत्यरोगम् (यण् सन्धि), यः + तु = यस्तु (विसर्ग सन्धि)। जब तक ये खुलें नहीं, यह पता ही नहीं चलता कि श्लोक में कितने पद हैं — और अन्वय पदों का ही तो क्रम है।
पुस्तक की छपाई का एक बिन्दु: पहली पंक्ति में पुस्तक ‘पुरुषस्स विद्वान्’ छापती है, अर्थात् ‘पुरुषः + स’ की सन्धि की हुई (विसर्ग का ‘स्’)। पदच्छेद में वही ‘पुरुषः, सः’ खोलकर दिया गया है। इसी पंक्ति में ‘मूर्खाः यः’ बिना सन्धि के छपा है — अन्य पाठों में ‘मूर्खा यस्तु’ मिलता है। दोनों बातें एक ही पंक्ति में हैं, इसलिए यह पुस्तक की मुद्रण-शैली है, कोई नियम-भेद नहीं।
प्र२.
इसी श्लोक का दण्डान्वय तथा पुस्तक का ‘विवरणम्’ क्या है?
उत्तर

दण्डान्वयः (पृष्ठ 162, पुस्तक के शब्दों में) —

(केचन) शास्त्राणि अधीत्यापि मूर्खाः भवन्ति ।
यः क्रियावान् सः पुरुषः तु विद्वान् (भवति) ।
(यथा) सुचिन्तितम् औषधं नाममात्रेण आतुराणाम् अरोगं न करोति ।

कहाँ-कहाँ कौन-सा नियम लगा —

अन्वय का अंशकौन-सा नियम
(केचन) … भवन्तिकर्ता नहीं था, अतः अध्याहार — ‘कदाचित् कर्तृपदं … न दृश्यते तदा … तत् पदं योजनीयम्’
शास्त्राणि अधीत्यापिल्यबन्त ‘अधीत्य’ अपनी क्रिया ‘भवन्ति’ से पूर्व — ‘क्त्वा-णमुल्-ल्यप्-प्रभृत्येवं पूर्वं’
मूर्खाः भवन्तिक्रियापद सबसे अन्त में — ‘सर्वान्ते क्रियापदं लिखेत्’
यः क्रियावान् सः पुरुषः तु विद्वान् (भवति)यद्-तद् का नित्य सम्बन्ध; क्रिया छपी नहीं थी, अतः (भवति) का अध्याहार
सुचिन्तितम् औषधम्विशेषण पहले, विशेष्य बाद में — ‘आद्ये विशेषणं योज्यं विशेष्यं तदनन्तरम्’
नाममात्रेण … अरोगं न करोतितृतीयान्त पद क्रिया से पहले, कर्म ‘अरोगम्’ उसके बाद, निषेध ‘न’ क्रिया से सटा हुआ

विवरणम् — पुस्तक की अपनी व्याख्या (पृष्ठ 162) — ‘अस्मिन् श्लोके ‘केचन’ इति शब्दः न प्रयुक्तः, ‘शास्त्राणि अधीत्यापि मूर्खाः भवन्ति’ इति वर्तते। तर्हि अत्र काचित् जिज्ञासा भवति यत् “शास्त्राणि अधीत्यापि के मूर्खाः भवन्ति” इति। तस्य उत्तरं यदि श्लोके विद्यते तर्हि तत् पदं पूर्वं स्थापनीयम्। परम् अस्मिन् श्लोके तु तत् पदं न प्रयुक्तम्। अतः अस्माभिः सुप्तं पदम् योजनीयम् (अध्याहार्यम्)। अत्र सुप्तं पदं ‘केचन’ इति भवितुमर्हति। … तथैव “यस्तु क्रियावान् पुरुषस्स विद्वान्” इत्यत्र क्रियापदं किमपि न प्रयुक्तम्। किन्तु वाक्यस्य पूर्तये क्रियापदम् आवश्यकम्। अतः अत्रापि सुप्तं क्रियापदं किञ्चन योजनीयम् (अध्याहार्यम्)। तच्च ‘भवति’ इति क्रियापदं योजितम्। अनेन प्रकारेण ‘यथा’ इति शब्दस्यापि अध्याहारः कृतः। तेन श्लोकस्य पूर्णः अर्थः स्पष्टः भवति।’

‘यथा’ क्यों जोड़ा गया: तीसरा वाक्य कोई नई बात नहीं कहता — वह पहली बात का दृष्टान्त है। औषधि का नाम लेने से रोग नहीं जाता, वैसे ही शास्त्र का नाम जानने से मूर्खता नहीं जाती। ‘यथा’ जोड़ देने से यह दृष्टान्त-सम्बन्ध स्पष्ट हो जाता है — इसीलिए पुस्तक कहती है ‘तेन श्लोकस्य पूर्णः अर्थः स्पष्टः भवति’।
प्र३.
‘क्रमशः योजनम्’ क्या है — पदों को संख्या देकर अन्वय कैसे बनाया जाता है?
उत्तर

यह कक्षा में करने की विधि है। पुस्तक पृष्ठ 162 के अन्त में कहती है — ‘अत्र शिक्षकः प्रश्नोत्तरमाध्यमेनापि अन्वयं कर्तुं शक्नोति। प्रथमं पदच्छेदं कृत्वा तदनन्तरम् अध्यापकः प्रश्नं कुर्वन् श्लोके विद्यमानेभ्यः पदेभ्यः संख्यां प्रददाति। ततः परं छात्राः क्रमशः पदानि योजयित्वा अन्वयं कर्तुमर्हन्ति।’ — अर्थात् शिक्षक हर पद पर उसका अन्वय-क्रमांक लिख देते हैं, और छात्र उन्हीं संख्याओं के क्रम से पद जोड़कर अन्वय बना लेते हैं।

पुस्तक की संख्या-सूची (पृष्ठ 163) — उन्नीस पद, अन्वय के क्रम में —

१. शास्त्राणि२. अधीत्य३. अपि४. मूर्खाः
५. भवन्ति६. यः७. क्रियावान्८. सः
९. पुरुषः१०. तु११. विद्वान्१२. सुचिन्तितं
१३. औषधम्१४. नाममात्रेण१५. च१६. आतुराणां
१७. अरोगम्१८. न१९. करोति

क्रमशः योजनम् (पुस्तक का उत्तर) —

(केचन) शास्त्राणि अधीत्य अपि मूर्खाः भवन्ति ।
यः क्रियावान् सः पुरुषः तु विद्वान् (भवति) ।
सुचिन्तितम् औषधं नाममात्रेण च आतुराणाम् अरोगं न करोति ।
संख्या देने से लाभ क्या: छात्र को पूरा वाक्य एक साथ नहीं जमाना पड़ता। उसे केवल ‘१ के बाद २, २ के बाद ३’ लिखना है — और अन्वय अपने आप बन जाता है। यही कारण है कि पुस्तक पहले पदच्छेद कराती है, फिर संख्या देती है, फिर योजन कराती है : कठिन काम को तीन आसान कामों में तोड़ना
पुस्तक में एक छोटा-सा अन्तर: पृष्ठ 162 का दण्डान्वयः तीसरे वाक्य में ‘च’ नहीं रखता पर ‘(यथा)’ जोड़ता है — ‘(यथा) सुचिन्तितम् औषधं नाममात्रेण आतुराणाम् अरोगं न करोति’। पृष्ठ 163 का क्रमशः योजनम् उल्टा करता है — ‘(यथा)’ छोड़ता है और ‘च’ (संख्या १५) रखता है। दोनों शुद्ध हैं : पहला अर्थ की दृष्टि से पूरा है, दूसरा संख्या-सूची का पालन करता है। परीक्षा में कोई भी लिख सकते हैं, पर एक ही में स्थिर रहिए।
प्र४.
इस श्लोक का हिन्दी अर्थ तथा भाव क्या है?
उत्तर

अन्वयानुसार अर्थ —

अन्वयहिन्दी अर्थ
(केचन) शास्त्राणि अधीत्य अपि मूर्खाः भवन्ति।कुछ लोग शास्त्रों को पढ़कर भी मूर्ख ही रह जाते हैं।
यः क्रियावान् सः पुरुषः तु विद्वान् (भवति)।परन्तु जो पुरुष क्रियावान् (पढ़े हुए पर आचरण करने वाला) है, वही विद्वान् है।
(यथा) सुचिन्तितम् औषधं नाममात्रेण च आतुराणाम् अरोगं न करोति।जैसे भली-भाँति सोच-समझकर चुनी हुई औषधि भी केवल नाम लेने मात्र से रोगियों को नीरोग नहीं करती।

भावः — ज्ञान का मूल्य आचरण से है, केवल पढ़ लेने से नहीं। जैसे रोगी दवा का नाम रटता रहे और उसे खाए नहीं तो रोग नहीं जाता, वैसे ही जो शास्त्र पढ़कर उसे जीवन में उतारता नहीं, वह पढ़ा-लिखा तो है पर विद्वान् नहीं। विद्या का प्रमाण पुस्तक नहीं, व्यवहार है।

अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं — परिशिष्ट पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए हैं।
  1. निम्न श्लोक का पदच्छेद तथा दण्डान्वय कीजिए —
    उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
    न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥

    पदच्छेदः — उद्यमेन, हि, सिध्यन्ति, कार्याणि, न, मनोरथैः, न, हि, सुप्तस्य, सिंहस्य, प्रविशन्ति, मुखे, मृगाः।
    दण्डान्वयः — कार्याणि उद्यमेन हि सिध्यन्ति, मनोरथैः न (सिध्यन्ति)। हि सुप्तस्य सिंहस्य मुखे मृगाः न प्रविशन्ति।
    (कर्ता ‘कार्याणि’ पहले, तृतीयान्त ‘उद्यमेन’ उसके बाद, क्रिया अन्त में; दूसरे वाक्य में षष्ठ्यन्त ‘सुप्तस्य सिंहस्य’ अपने विशेष्य के साथ, अधिकरण ‘मुखे’ क्रिया से पहले।)
  2. निम्न श्लोक का दण्डान्वय कीजिए —
    विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् ।
    पात्रत्वाद् धनमाप्नोति धनाद् धर्मं ततः सुखम् ॥

    दण्डान्वयः — विद्या विनयं ददाति। विनयात् पात्रतां याति। पात्रत्वात् धनम् आप्नोति। धनात् धर्मं (आप्नोति)। ततः सुखम् (आप्नोति)।
    (अन्तिम दो वाक्यों में क्रिया छपी नहीं है — ‘आप्नोति’ का अध्याहार करना पड़ा।)
  3. ऊपर के दोनों उत्तरों में जहाँ-जहाँ अध्याहार हुआ है, उन पदों को छाँटकर लिखिए।
    उत्तर — पहले श्लोक में (सिध्यन्ति); दूसरे श्लोक में (आप्नोति) — दो बार।
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