कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 2 समासः के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
परिशिष्टम् २ ‘समासः’ में क्या है, और इसमें अभ्यास क्यों नहीं है?
उत्तर

शारदा के पृष्ठ 167 से 176 तक फैला यह भाग परिशिष्ट है, पाठ नहीं। पाठ में कथा या श्लोक होते हैं और अन्त में ‘अभ्यासाद् जायते सिद्धिः’ के नीचे प्रश्न होते हैं। इस परिशिष्ट में एक भी प्रश्न नहीं है — न कोई क्रम-संख्या वाला प्रश्न, न रिक्त स्थान, न कोई खाली खाना। जो भी तालिका छपी है, उसमें समस्तपद और विग्रह — दोनों पहले से भरे हुए हैं।

इसमें क्रम से यह सब है —

पृष्ठविषय
167समास की परिभाषा · समास किन पदों में होता है · परस्पर अन्वय की शर्त · पूर्वपद-उत्तरपद
168समास के बाद विभक्ति की प्रक्रिया (सीतापतिः) · विग्रहवाक्य · विग्रह के दो भेद — स्वपदविग्रह, अस्वपदविग्रह
169मुख्यतया समास द्विविध — केवलसमास, विशेषसमास · विशेषसमास चतुर्धा · समासस्य निर्णयः · उदाहरण (१) और (२)
170उदाहरण (३) और (४) · तत्पुरुष तथा द्वन्द्व की एक-पंक्ति परिभाषा
171बहुव्रीहि तथा अव्ययीभाव की परिभाषा · विभक्तितत्पुरुषः षड्विधः तालिका · कर्मधारयसमासः नवधा तालिका (आरम्भ)
172कर्मधारय तालिका (शेष) · द्विगुः समासः त्रिविध तालिका · नञ्-प्रभृतिः तत्पुरुषसमासः तालिका
173द्वन्द्वसमासः — भेद-वृक्ष · इतरेतरद्वन्द्व तालिका · समाहारद्वन्द्व तालिका
174बहुव्रीहिसमासः — भेद-वृक्ष · सामान्यबहुव्रीहि (षोढा) तालिका · विशेषबहुव्रीहि (नवधा) तालिका (आरम्भ)
175विशेषबहुव्रीहि तालिका (शेष) · अव्ययीभावसमासः — परिभाषा तथा बीस भेदों की तालिका (आरम्भ)
176अव्ययीभाव तालिका (शेष, भेद १२–२०) — यहीं परिशिष्ट समाप्त
तो पढ़ें कैसे: इसे कहानी की तरह एक बार में मत पढ़िए। पहले पृष्ठ 167–170 का सिद्धान्त-भाग समझ लीजिए — समास क्या है, विग्रह क्या है, और कौन-सा समास है यह कैसे तय होता है। यह समझ में आ गया तो आगे की सब तालिकाएँ अपने-आप खुल जाएँगी, क्योंकि हर तालिका बस उसी एक विधि के अलग-अलग रूप हैं।
ध्यान दें: इस पृष्ठ पर जहाँ भी «अभ्यास के लिए (स्वयं करें)» लिखा है, वे प्रश्न पुस्तक के नहीं हैं — केवल आपकी स्वयं-जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं, उत्तर सहित।
प्र२.
समास किसे कहते हैं — पुस्तक की अपनी परिभाषा तथा ‘महापुरुषः’ का उदाहरण क्या है?
उत्तर

पुस्तक का आरम्भिक वाक्य ही परिभाषा है —

समसनं समासः भवति। समसनं नाम सङ्क्षेपणम् इत्यर्थः।

अर्थात् समास का अर्थ है संक्षेपण — बात को छोटा कर देना। इसके बाद पुस्तक विस्तार से कहती है —

अर्थात् समासे अर्थयुक्तं पदद्वयं, पदत्रयम् अथवा अनेकपदं मिलित्वा एकं पदं भवति।
यथा — ‘महा’ तथा ‘पुरुष’ इति अर्थयुक्तं पदद्वयम् अस्ति। तद् द्वयमपि मिलित्वा एकपदं भवति महापुरुषः इति।
एवंविधानाम् अर्थवतां पदानाम् एकीभवनमेव समासः।

हिन्दी अर्थ — समास में अर्थ रखने वाले दो पद, तीन पद अथवा अनेक पद मिलकर एक ही पद बन जाते हैं। जैसे ‘महा’ और ‘पुरुष’ — ये दो अर्थवान् पद हैं; दोनों मिलकर एक पद बन गए — ‘महापुरुषः’। इस प्रकार अर्थवान् पदों का एक हो जाना ही समास है

परिभाषा का अंशउसका आशय
समसनम् = सङ्क्षेपणम्समास का प्रयोजन संक्षेप है — ‘राष्ट्रस्य नायकः’ चार अक्षर बचाकर ‘राष्ट्रनायकः’ हो गया
अर्थयुक्तं पदद्वयम्जुड़ने वाले दोनों टुकड़े अपने-आप में अर्थवान् पद होने चाहिए — केवल अक्षर या प्रत्यय नहीं
पदत्रयम् अथवा अनेकपदम्समास केवल दो पदों तक सीमित नहीं — द्वन्द्व में चार-पाँच पद तक जुड़ सकते हैं
एकं पदं भवतिपरिणाम एक ही पद होता है — इसीलिए विभक्ति भी केवल एक बार, अन्त में लगती है
समास और सन्धि में अन्तर: सन्धि में केवल वर्ण मिलते हैं और अर्थ नहीं बदलता (विद्या + आलयः = विद्यालयः — यह वर्णों का मेल है)। समास में पद मिलते हैं, विभक्तियाँ लुप्त हो जाती हैं और एक नया पद बनता है, जिसका अर्थ खोलने के लिए विग्रह करना पड़ता है। इसीलिए सन्धि का ‘विच्छेद’ होता है और समास का ‘विग्रह’।
प्र३.
समास किन पदों के बीच होता है — सुबन्त, परस्पर अन्वय और द्वन्द्व की विशेषता क्या है?
उत्तर

पुस्तक तीन बातें क्रम से कहती है —

(क) समास सुबन्तों के बीच होता है, और एक बार में दो के बीच —

समासः सामान्यतः परस्परं सुबन्तानां मध्ये भवति। तथैव समासः युगपत् द्वयोः द्वयोः सुबन्तयोः मध्ये भवति।
यथा — सीतायाः पतिः = सीतापतिः

सुबन्त = जिसके अन्त में सुप् (विभक्ति) प्रत्यय लगा हो, अर्थात् नाम-पद। ‘सीतायाः’ (षष्ठी) और ‘पतिः’ (प्रथमा) — दोनों सुबन्त हैं, इसलिए इनका समास हो सका। क्रियापद का समास नहीं होता।

(ख) द्वन्द्व में एक साथ बहुत-से सुबन्तों का समास —

द्वन्द्वसमासे तु युगपत् बहूनां सुबन्तानां मध्ये समासः भवति।
यथा — हरिश्च हरश्च गुरुश्च = हरिहरगुरवः

यही द्वन्द्व की विशेषता है — बाकी समास दो-दो पदों को जोड़ते हैं, द्वन्द्व एक साथ तीन-चार-पाँच को जोड़ लेता है।

(ग) सबसे बड़ी शर्त — परस्पर अन्वय —

परस्परम् अन्वितयोः (सम्बद्धयोः) सुबन्तयोः एव समासः भवति। यदि पदानां मध्ये परस्परम् अन्वयः (सम्बन्धः) न भवति तर्हि समासः अपि न भवति।
वाक्यअन्वय है या नहींसमास?
सः राज्ञः पुत्रः (राजपुत्रः) गच्छति।‘राज्ञः’ का अन्वय सीधे ‘पुत्रः’ से हैहाँ — राजपुत्रः
भवति दर्शनं राज्ञः, पुत्रः कृषकस्य गच्छति।‘राज्ञः’ का अन्वय ‘दर्शनम्’ से है, ‘पुत्रः’ का ‘कृषकस्य’ से — दोनों का आपस में कोई सम्बन्ध नहींनहीं

दूसरे वाक्य पर पुस्तक का अपना विवेचन यह है — ‘अत्र राज्ञः अन्वयः दर्शनम् इति पदेन सह भवति। पुत्रः इत्यस्य अन्वयः कृषकस्य इत्यनेन सह अस्ति। अतः अस्मिन् वाक्ये राज्ञः पुत्रः एतयोः मध्ये परस्परम् अन्वयः नास्ति अतः तयोः समासः अपि नास्ति।’

यह नियम क्यों जरूरी है: संस्कृत में पदों का क्रम स्वतन्त्र है, इसलिए दो पद केवल पास-पास छपे होने से जुड़े हुए नहीं मान लिए जाते। जुड़े वे तब हैं जब अर्थ की दृष्टि से एक दूसरे को खींचता हो। यही कारण है कि समास करने से पहले अन्वय देखना पड़ता है — और इसीलिए परिशिष्टम् १ (अन्वयः) इस परिशिष्ट से पहले रखा गया है।
प्र४.
पूर्वपद और उत्तरपद क्या हैं — और समास बनने पर विभक्ति का क्या होता है?
उत्तर

पूर्वपद-उत्तरपद (पृष्ठ 167–168) —

समासे पूर्वपदम् उत्तरपदम् इति द्विविधं भवति। पूर्वं प्रयुक्तं पदं पूर्वपदम्, अनन्तरं प्रयुक्तं पदम् उत्तरपदम् इति।
यथा — सीतापतिः इत्यत्र ‘सीता’ इति पूर्वं प्रयुक्तं, ‘पतिः’ इति अनन्तरं प्रयुक्तम्। अतः अत्र ‘सीता’ इति पूर्वपदं, ‘पतिः’ इति उत्तरपदं च भवति।

ये दो नाम आगे बार-बार आएँगे, क्योंकि चारों समासों की पहचान इसी पर टिकी है — कौन-सा पद प्रधान है, पूर्व या उत्तर

समास बनने पर विभक्ति की प्रक्रिया (पृष्ठ 168) —

समासे कृते पूर्वपदम् उत्तरपदं च प्रातिपदिकरूपेण स्थितं भवति। तदनन्तरं समस्तात् पदात् विभक्तिः योजनीया।

पुस्तक इसे चरण-दर-चरण दिखाती है —

चरणक्या होता है
१. विग्रहवाक्यसीतायाः पतिः
२. दोनों पद विभक्ति सहितसीता + ङस् + पति + सु
३. दोनों विभक्तियों का लोप= सीतापति  (ङस् तथा सु एतयोः लोपः) — अब यह केवल प्रातिपदिक है
४. समस्त पद से नयी विभक्तिसीतापति + सु = सीतापतिः

पुस्तक के अपने शब्दों में — ‘अत्र ‘सीतापति’ इति प्रातिपदिकं समस्तपदं च, तस्मात् विभक्तिप्रत्ययः योजितः। तदा सीतापतिः इति रूपं भवति। एवमेव समासविषये सर्वत्र अवबोद्धव्यम्।’

यह चरण-३ ही सबसे महत्त्वपूर्ण है: समास बनते ही भीतर की विभक्तियाँ लुप्त हो जाती हैं। इसीलिए ‘सीतापतिः’ को देखकर यह नहीं पता चलता कि भीतर षष्ठी थी या सप्तमी — वह तो विग्रह करने पर ही खुलता है। और इसीलिए तत्पुरुष के भेदों के नाम विभक्ति के नाम पर रखे गए हैं (द्वितीयातत्पुरुष, तृतीयातत्पुरुष…) — वे बताते हैं कि लुप्त हुई विभक्ति कौन-सी थी।
परीक्षा-सूत्र: समस्तपद में विभक्ति केवल एक बार, सबसे अन्त में लगती है। यदि आपने ‘सीतायाःपतिः’ जैसा कुछ लिखा तो वह समास नहीं, केवल दो पद हैं जिन्हें जोड़कर लिख दिया गया है।
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