२. अस्वपदविग्रहः — पुस्तक के शब्दों में (पृष्ठ 168–169) —
यदि समासस्य अर्थः समासे नाम समस्तपदे विद्यमानानि पदानि विहाय अन्यैः पदैः वर्णितः भवति तर्हि सः अस्वपदविग्रहः भवति। तथा च — ‘समासघटकपदरहितं वाक्यम् अस्वपदविग्रहः’ इत्यर्थः। सामान्यतः अत्र एकं पदं समासघटकमेव भवति। नित्यसमासे अस्वपदविग्रहः भवति।
हिन्दी अर्थ — यदि विग्रह में समस्तपद के भीतर के पदों को छोड़कर कोई नया पद बाहर से लाना पड़े, तो वह अस्वपदविग्रह है। प्रायः एक पद तो समास का ही रहता है, दूसरा बाहर से आता है।
पुस्तक का उदाहरण (पृष्ठ 169) —
यथा — बालः यथामति कार्यं करोति। मतिम् अनतिक्रम्य यथामति इति अस्वपदविग्रहः। अत्र अनतिक्रम्य इति समासे अविद्यमानं पदं वर्तते।
नित्यसमास से सम्बन्ध — जिस समास का विग्रह उसके अपने ही पदों से हो ही नहीं सकता, वह नित्यसमास कहलाता है — जैसे यथाशक्ति, अभ्यग्नि, प्रतिदिनम्। ऐसे समास में विग्रह सदा अस्वपदविग्रह ही होगा, क्योंकि अर्थ खोलने के लिए बाहर का शब्द लाना अनिवार्य है।
क्यों: ‘यथामति’ में ‘यथा’ एक अव्यय है — उसका अपना कोई विभक्ति-रूप नहीं जिससे विग्रह बन सके। अतः उसका भाव (‘उल्लंघन किए बिना’) व्यक्त करने के लिए ‘अनतिक्रम्य’ जैसा क्रियार्थक पद बाहर से लाना ही पड़ता है। अव्ययीभाव और बहुव्रीहि — इन दो समासों में प्रायः अस्वपदविग्रह ही मिलेगा, क्योंकि पहले में अव्यय है और दूसरे में अर्थ ही बाहर के किसी पद का है।
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। नीचे दिए समस्तपदों का विग्रह कीजिए और बताइए कि वह स्वपदविग्रह है या अस्वपदविग्रह। उत्तर ढँककर पहले स्वयं कीजिए।
१. गृहगतः — गृहं गतः। स्वपदविग्रह (दोनों पद समास के भीतर ही हैं)।
२. निर्मशकम् — मशकानाम् अभावः। अस्वपदविग्रह (‘अभावः’ बाहर से आया; ‘निर्’ अव्यय है)।
३. नीलमेघः — नीलः मेघः। स्वपदविग्रह।
४. चक्रपाणिः — चक्रं पाणौ यस्य सः। अस्वपदविग्रह (बहुव्रीहि है, ‘यस्य सः’ बाहर का)।
५. उपग्रामम् — ग्रामस्य समीपे। अस्वपदविग्रह (‘उप’ के स्थान पर ‘समीपे’ लाना पड़ा)।
६. रामकृष्णौ — रामः च कृष्णः च। स्वपदविग्रह (केवल ‘च’ जोड़ा गया, जो योजक अव्यय है)।