कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 2 विग्रहवाक्यम् तथा उसके दो भेद के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
विग्रहवाक्य किसे कहते हैं — पुस्तक की परिभाषा तथा उदाहरण क्या है?
उत्तर

पुस्तक की परिभाषा (पृष्ठ 168) —

विग्रहवाक्यम् — वृत्त्यर्थस्य अवबोधकं वाक्यं विग्रहः। वृत्तिः नाम समासादिः। समासादेः अर्थं बोधयितुं यद् वाक्यम् उच्यते तद् वाक्यं विग्रहः इति व्यवह्रियते।

हिन्दी अर्थ — ‘वृत्ति’ का अर्थ है समास आदि (संक्षिप्त प्रयोग)। समास आदि का अर्थ समझाने के लिए जो वाक्य कहा जाता है, उसी को विग्रह कहते हैं।

पुस्तक का उदाहरण —

‘राष्ट्रनायकः’ इति समासः (समस्तपदम्)।
‘राष्ट्रस्य नायकः’ इति विग्रहवाक्यम्।
अत्र ‘राष्ट्र’ इति पूर्वपदं ‘नायकः’ इति उत्तरपदम्।
शब्दअर्थपहचान
वृत्तिःसंक्षिप्त प्रयोग — समास, कृत्, तद्धित, एकशेष आदिजहाँ अर्थ दबा हुआ है
समस्तपदम्समास बन जाने के बाद का एक पदराष्ट्रनायकः
विग्रहःउसी दबे अर्थ को खोलकर कहने वाला वाक्यराष्ट्रस्य नायकः
विग्रह ही उत्तर की कुंजी है: परीक्षा में ‘समासस्य नाम लिखत’ पूछा जाए तो सीधे नाम मत सोचिए — पहले विग्रह लिखिए। विग्रह में जो विभक्ति या जो शब्द (यस्य / येन / इव / एव / च / अनतिक्रम्य) आएगा, वही भेद का नाम बता देगा। बिना विग्रह के समास का नाम बताना अनुमान है, उत्तर नहीं।
प्र२.
स्वपदविग्रह क्या है — नियम और उदाहरण दीजिए।
उत्तर

पुस्तक पृष्ठ 168 पर एक रेखाचित्र देती है —

विग्रहः द्विधा
१. स्वपदविग्रहः   |   २. अस्वपदविग्रहः

१. स्वपदविग्रहः — पुस्तक के शब्दों में —

यदि समासस्य अर्थः समासे नाम समस्तपदे विद्यमानैः पदैः एव वर्णितः भवति तर्हि सः स्वपदविग्रहः भवति। तथा च — ‘समासघटकपदसहितं वाक्यं स्वपदविग्रहः’ इत्यर्थः। (स्वपदैः (समासपदैः) विग्रहः।)

हिन्दी अर्थ — यदि समास का अर्थ उन्हीं पदों से खुल जाए जो समस्तपद के भीतर मौजूद हैं, तो वह स्वपदविग्रह है — यानी विग्रह में कोई नया पद बाहर से नहीं लाना पड़ता।

पुस्तक का उदाहरण —

यथा — सुदामा कृष्णसखा अस्ति। कृष्णस्य सखा कृष्णसखा इति स्वपदविग्रहः।
समस्तपदउसके भीतर के पदविग्रहक्या बाहर से पद लाना पड़ा?
कृष्णसखाकृष्ण + सखाकृष्णस्य सखानहीं — केवल विभक्ति (षष्ठी) जोड़ी गई
राष्ट्रनायकःराष्ट्र + नायकराष्ट्रस्य नायकःनहीं
वृक्षमूलम्वृक्ष + मूलवृक्षस्य मूलम्नहीं
पहचानने का सरल तरीका: विग्रह लिखने के बाद उसे समस्तपद से मिलाइए। यदि विग्रह के सब शब्द समस्तपद में भी दिख रहे हैं (केवल विभक्ति अलग है), तो वह स्वपदविग्रह है। तत्पुरुष, कर्मधारय और द्वन्द्व के अधिकांश उदाहरण इसी कोटि के हैं।
प्र३.
अस्वपदविग्रह क्या है — और नित्यसमास से उसका क्या सम्बन्ध है?
उत्तर

२. अस्वपदविग्रहः — पुस्तक के शब्दों में (पृष्ठ 168–169) —

यदि समासस्य अर्थः समासे नाम समस्तपदे विद्यमानानि पदानि विहाय अन्यैः पदैः वर्णितः भवति तर्हि सः अस्वपदविग्रहः भवति। तथा च — ‘समासघटकपदरहितं वाक्यम् अस्वपदविग्रहः’ इत्यर्थः। सामान्यतः अत्र एकं पदं समासघटकमेव भवति। नित्यसमासे अस्वपदविग्रहः भवति।

हिन्दी अर्थ — यदि विग्रह में समस्तपद के भीतर के पदों को छोड़कर कोई नया पद बाहर से लाना पड़े, तो वह अस्वपदविग्रह है। प्रायः एक पद तो समास का ही रहता है, दूसरा बाहर से आता है।

पुस्तक का उदाहरण (पृष्ठ 169) —

यथा — बालः यथामति कार्यं करोति। मतिम् अनतिक्रम्य यथामति इति अस्वपदविग्रहः। अत्र अनतिक्रम्य इति समासे अविद्यमानं पदं वर्तते।
समस्तपदविग्रहबाहर से आया पद
यथामतिमतिम् अनतिक्रम्यअनतिक्रम्य — यह समास में कहीं नहीं है
यथाशक्तिशक्तिम् अनतिक्रम्यअनतिक्रम्य
प्रतिदिनम्दिने दिने‘प्रति’ का स्थान वीप्सा (द्विरुक्ति) ने ले लिया
पीताम्बरःपीतम् अम्बरं यस्य सः (विष्णुः)यस्य सः — बहुव्रीहि में सदा बाहर का पद आता है

नित्यसमास से सम्बन्ध — जिस समास का विग्रह उसके अपने ही पदों से हो ही नहीं सकता, वह नित्यसमास कहलाता है — जैसे यथाशक्ति, अभ्यग्नि, प्रतिदिनम्। ऐसे समास में विग्रह सदा अस्वपदविग्रह ही होगा, क्योंकि अर्थ खोलने के लिए बाहर का शब्द लाना अनिवार्य है।

क्यों: ‘यथामति’ में ‘यथा’ एक अव्यय है — उसका अपना कोई विभक्ति-रूप नहीं जिससे विग्रह बन सके। अतः उसका भाव (‘उल्लंघन किए बिना’) व्यक्त करने के लिए ‘अनतिक्रम्य’ जैसा क्रियार्थक पद बाहर से लाना ही पड़ता है। अव्ययीभाव और बहुव्रीहि — इन दो समासों में प्रायः अस्वपदविग्रह ही मिलेगा, क्योंकि पहले में अव्यय है और दूसरे में अर्थ ही बाहर के किसी पद का है।
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। नीचे दिए समस्तपदों का विग्रह कीजिए और बताइए कि वह स्वपदविग्रह है या अस्वपदविग्रह। उत्तर ढँककर पहले स्वयं कीजिए।

१. गृहगतः — गृहं गतः। स्वपदविग्रह (दोनों पद समास के भीतर ही हैं)।
२. निर्मशकम् — मशकानाम् अभावःअस्वपदविग्रह (‘अभावः’ बाहर से आया; ‘निर्’ अव्यय है)।
३. नीलमेघः — नीलः मेघः। स्वपदविग्रह
४. चक्रपाणिः — चक्रं पाणौ यस्य सःअस्वपदविग्रह (बहुव्रीहि है, ‘यस्य सः’ बाहर का)।
५. उपग्रामम् — ग्रामस्य समीपेअस्वपदविग्रह (‘उप’ के स्थान पर ‘समीपे’ लाना पड़ा)।
६. रामकृष्णौ — रामः च कृष्णः च। स्वपदविग्रह (केवल ‘च’ जोड़ा गया, जो योजक अव्यय है)।
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