कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 5 पूरे परिशिष्ट का सार के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
पाँचों लकारों के परस्मैपद तथा आत्मनेपद प्रत्यय एक साथ कैसे याद करें?
उत्तर

सीधा उत्तर — परिशिष्ट की अट्ठाईस तालिकाओं में जो कुछ बदलता है वह अङ्ग है; प्रत्यय केवल दस समूहों के हैं — पाँच लकार × दो पद। इन्हें एक बार देख लेने पर हर तालिका अपने आप पढ़ी जाने लगती है।

ध्यान दें — नीचे की यह सारणी पुस्तक में छपी हुई नहीं है। यह ऊपर दी गई पुस्तक की अपनी तालिकाओं से निकाली गई है, ताकि सब कुछ एक दृष्टि में आ जाए। पुस्तक स्वयं केवल पूरे रूप देती है, प्रत्यय अलग से नहीं गिनाती।
लकारःपदम्प्रथमपुरुषः (एक./द्वि./बहु.)मध्यमपुरुषःउत्तमपुरुषः
लट्परस्मैपदति · तः · अन्तिसि · थः · थमि · वः · मः
लट्आत्मनेपदते · एते · अन्तेसे · एथे · ध्वेए · आवहे · आमहे
लृट्परस्मैपदस्यति · स्यतः · स्यन्तिस्यसि · स्यथः · स्यथस्यामि · स्यावः · स्यामः
लृट्आत्मनेपदस्यते · स्येते · स्यन्तेस्यसे · स्येथे · स्यध्वेस्ये · स्यावहे · स्यामहे
लङ्परस्मैपदत् · ताम् · अन्स् (→ विसर्ग) · तम् · तअम् · व · म
लङ्आत्मनेपदत · एताम् · अन्तथाः · एथाम् · ध्वम्इ/ए · आवहि · आमहि
लोट्परस्मैपदतु/तात् · ताम् · अन्तु— /तात् · तम् · तआनि · आव · आम
लोट्आत्मनेपदताम् · एताम् · अन्ताम्स्व · एथाम् · ध्वम्ऐ · आवहै · आमहै
विधिलिङ्परस्मैपदएत् · एताम् · एयुःएः · एतम् · एतएयम् · एव · एम
विधिलिङ्आत्मनेपदएत · एयाताम् · एरन्एथाः · एयाथाम् · एध्वम्एय · एवहि · एमहि
दो जगह ‘एक से अधिक रूप’ क्यों लिखे हैं: (क) लङ् आत्मनेपद उत्तमपुरुष एकवचन में प्रत्यय ‘इ’ है, पर भ्वादि जैसे अ-कारान्त अङ्ग में वह अङ्ग के ‘अ’ से मिलकर ‘ए’ बन जाता है — इसीलिए अवर्धे, अलभे पर अशयि, अभुञ्जि। (ख) लोट् परस्मैपद में ‘तु/तात्’ तथा मध्यमपुरुष एकवचन में ‘शून्य/तात्’ — दोनों विकल्प शुद्ध हैं। शेष सब खाने एक ही रूप के हैं।
अङ्ग बनाम प्रत्यय — एक उदाहरण से पूरी बात —
प्रत्यय अन्ते (लट्, आत्मनेपद, प्रथमपुरुष बहुवचन) सब जगह वही है, अङ्ग बदलता है :
वर्ध् + अन्ते = वर्धन्ते · लभ् + अन्ते = लभन्ते · शी + अन्ते = शेरते (न् → र्) · भुञ्ज् + अन्ते = भुञ्जते (अ लुप्त)
प्र२.
पाँचों धातुओं के मुख्य रूप एक ही सारणी में — तुरन्त दोहराने के लिए
उत्तर
ध्यान दें — यह सारणी भी पुस्तक में छपी हुई नहीं है। इसके सब रूप ऊपर दी गई पुस्तक की तालिकाओं से ही लिए गए हैं; यहाँ केवल एक साथ रख दिए गए हैं ताकि परीक्षा से पहले पाँच मिनट में पूरा परिशिष्ट दोहराया जा सके।
धातुः (अर्थ)पदम्लट्लृट्लङ्लोट्विधिलिङ्
पठ् (पढ़ना)परस्मैपदपठतिपठिष्यतिअपठत्पठतुपठेत्
पठि (णिच् — पढ़ाना)परस्मैपदपाठयति
वृधु (बढ़ना)आत्मनेपदवर्धतेवर्धिष्यतेअवर्धतवर्धताम्वर्धेत
लभ् (पाना)आत्मनेपदलभतेलप्स्यतेअलभतलभताम्लभेत
शीङ् (सोना)आत्मनेपदशेतेशयिष्यतेअशेतशेताम्शयीत
भुज् (खाना)आत्मनेपदभुङ्क्तेभोक्ष्यतेअभुङ्क्तभुङ्क्ताम्भुञ्जीत

ऊपर की पंक्ति में ‘—’ क्यों है — पुस्तक ने णिच्-प्रत्ययान्त रूप केवल लट्-लकार में दिए हैं (पाठयति आदि), शेष लकारों में नहीं। शीर्षक भी यही कहता है — ‘परस्मैपदिधातूनां लट्-लकारः णिच्-प्रत्ययान्तानां प्रयोगः’। यदि आवश्यकता पड़े तो वे अङ्ग ‘पाठय’ पर पठ् का ही साँचा लगाकर बन जाते हैं — पाठयिष्यति, अपाठयत्, पाठयतु, पाठयेत्

परिशिष्ट की सबसे बड़ी सीख: पाँच धातुएँ चुनने में पुस्तक ने बहुत सोच-समझकर काम किया है — पठ् से परस्मैपद का सरल साँचा, वृधु से आत्मनेपद जहाँ अङ्ग में गुण होता है, लभ् से आत्मनेपद जहाँ अङ्ग बिलकुल नहीं बदलता, शीङ् से वह धातु जिसमें विकरण ही नहीं लगता, और भुज् से वह जिसमें विकरण धातु के भीतर घुसता है। पाँच धातुओं में संस्कृत क्रिया-रचना के लगभग सभी प्रकार आ गए। इसीलिए इन्हें भर याद कर लेना दर्जनों अन्य धातुओं की कुंजी दे देता है।
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ५ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं।
  1. नीचे दिए रूपों का लकार, पुरुष तथा वचन बताइए — (क) अपठाम (ख) लप्स्यध्वे (ग) शेरताम् (घ) भुञ्जीथाः।
    उत्तर — (क) लङ्, उत्तमपुरुष, बहुवचन (ख) लृट्, मध्यमपुरुष, बहुवचन (ग) लोट्, प्रथमपुरुष, बहुवचन (घ) विधिलिङ्, मध्यमपुरुष, एकवचन।
  2. इनमें से कौन-सा रूप आत्मनेपद का नहीं है — वर्धसे, पठथः, लभेरन्, शेध्वम्?
    उत्तर — पठथः — यह परस्मैपद (लट्, मध्यमपुरुष द्विवचन) है।
  3. ‘वह पढ़ेगा’, ‘वे दोनों बढ़े’, ‘तुम खाओ’ — तीनों वाक्य संस्कृत में लिखिए।
    उत्तर — सः पठिष्यति। · तौ अवर्धेताम्। · त्वं भुङ्क्ष्व।
  4. पाँच लकारों के नाम क्रम से लिखिए और प्रत्येक का एक-एक चिह्न बताइए।
    उत्तर — लट् (ति/ते) · लृट् (स्य) · लङ् (आगे अ) · लोट् (तु/ताम्/आनि/ऐ) · विधिलिङ् (ए/ई)।
  5. ‘शयीत’ और ‘भुञ्जीत’ में ‘ई’ क्यों है जबकि ‘वर्धेत’ में ‘ए’?
    उत्तर — विधिलिङ् का चिह्न मूलतः ‘ई’ (यासुट्) है। भ्वादि अङ्ग के अन्त में ‘अ’ होने से अ + ई = ए बन जाता है (वर्धेत), पर शीङ् तथा भुज् के अङ्ग में वह ‘अ’ है ही नहीं, इसलिए ‘ई’ ज्यों-का-त्यों रह जाता है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ