कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 5 विशिष्टधातवः (आत्मनेपदिनः) के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र१.
‘भुज्’ धातुः, लट्-लकारः — पृष्ठ 205
उत्तर

धातु — भुज् (रुधादिगण, अर्थ — खाना, भोगना)। पुस्तक इसे ‘विशिष्टधातवः (आत्मनेपदिनः)’ के नीचे रखती है, क्योंकि खाने के अर्थ में यह आत्मनेपदी है — फल खाने वाले को ही मिलता है। इसकी विशेषता यह है कि विकरण बाहर नहीं, धातु के भीतर लगता है।

श्नम् विकरण — रुधादिगण में धातु के अन्तिम स्वर के बाद न् घुस जाता है :
भुज् → भु + न् + ज् — इससे दो अङ्ग बनते हैं
भुनज् (बलवत्/strong — जहाँ न् के बाद ‘अ’ आता है)
भुञ्ज् (दुर्बल/weak — जहाँ न् सीधे ज् से मिलकर ञ् हो जाता है, श्चुत्व से)
‘भुज्’- धातुः, लट्-लकारः — पृष्ठ 205
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःभुङ्क्तेभुञ्जातेभुञ्जते
मध्यमपुरुषःभुङ्क्षेभुञ्जाथेभुङ्ग्ध्वे
उत्तमपुरुषःभुञ्जेभुञ्ज्वहेभुञ्ज्महे
‘भुङ्क्ते’ कैसे बना — तीन सन्धियाँ एक साथ: भुञ्ज् + ते → (क) ज् के आगे कठोर त् है, इसलिए ज् का क् हो जाता है (चोः कुः तथा खरि च); (ख) अब ञ् के आगे क् वर्ग आ गया, इसलिए ञ् का ङ् हो जाता है (परसवर्ण) → भुङ्क्ते। इसी तरह भुञ्ज् + से → भुङ्क्षे और भुञ्ज् + ध्वे → ज् का ग् (जश्त्व) → भुङ्ग्ध्वे। जहाँ आगे स्वर है वहाँ कुछ नहीं बदलता — भुञ्जाते, भुञ्जते, भुञ्जे।
भुज् वस्तुतः उभयपदी है: ‘खाना, भोगना’ अर्थ में यह आत्मनेपदी (भुङ्क्ते) और ‘रक्षा करना, पालन करना’ अर्थ में परस्मैपदी (भुनक्ति) होती है — भुजोऽनवने सूत्र यही कहता है। पुस्तक ने केवल आत्मनेपद के रूप दिए हैं, क्योंकि पाठ्यक्रम में ‘खाना’ अर्थ ही आता है। यह पुस्तक की चूक नहीं, चयन है — पर जानकारी के लिए दूसरा पक्ष भी याद रखिए : भुनक्ति, भुङ्क्तः, भुञ्जन्ति।

प्रयोग — बालकः फलं भुङ्क्ते। (बालक फल खाता है) · ते ओदनं भुञ्जते। · अहं मिष्टान्नं भुञ्जे। · वयं सह भुञ्ज्महे

प्र२.
‘भुज्’ धातुः, लृट्-लकारः — पृष्ठ 205
उत्तर

नियम — लृट् में श्नम् नहीं लगता — विकरण केवल सार्वधातुक लकारों (लट्, लङ्, लोट्, विधिलिङ्) में आता है। यहाँ धातु सीधी लेकर गुण किया जाता है : भुज् → गुण से भोज् → भोज् + स्य + ते → ज् का क्, फिर स् का ष्भोक्ष्यते। भुज् अनिट् है, इसलिए ‘इ’ नहीं लगता।

‘भुज्’- धातुः, लृट्-लकारः — पृष्ठ 205
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःभोक्ष्यतेभोक्ष्येतेभोक्ष्यन्ते
मध्यमपुरुषःभोक्ष्यसेभोक्ष्येथेभोक्ष्यध्वे
उत्तमपुरुषःभोक्ष्येभोक्ष्यावहेभोक्ष्यामहे
‘न्’ अचानक गायब क्यों: भुङ्क्ते–भुञ्जते में जो ‘न्/ञ्’ था वह श्नम् विकरण का था, और विकरण केवल वहीं लगता है जहाँ प्रत्यय सार्वधातुक हो। लृट् का ‘स्य’ आर्धधातुक है, इसलिए विकरण नहीं आया और धातु अपने मूल रूप में लौट आई। यही कारण है कि लृट् और विधिलिङ् की तालिकाएँ देखने में एकदम अलग लगती हैं — पर विधिलिङ् में ‘न्’ फिर आ जाता है (भुञ्जीत), क्योंकि विधिलिङ् सार्वधातुक है।

प्रयोग — सः सायं भोक्ष्यते। · वयं सर्वे सह भोक्ष्यामहे

प्र३.
‘भुज्’ धातुः, लङ्-लकारः — पृष्ठ 205
उत्तर
‘भुज्’- धातुः, लङ्-लकारः — पृष्ठ 205
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःअभुङ्क्तअभुञ्जाताम्अभुञ्जत
मध्यमपुरुषःअभुङ्क्थाःअभुञ्जाथाम्अभुङ्ग्ध्वम्
उत्तमपुरुषःअभुञ्जिअभुञ्ज्वहिअभुञ्ज्महि
वही दो अङ्ग, वही सन्धियाँ, केवल आगे ‘अ’: लट् की तालिका पर उँगली रखकर मिलाइए — भुङ्क्ते → भुङ्क्त, भुञ्जते → भुञ्जत, भुङ्ग्ध्वे → भुङ्ग्ध्वम्। जहाँ आगे कठोर व्यञ्जन है वहाँ ‘भुङ्क्’, जहाँ स्वर है वहाँ ‘भुञ्ज्’। उत्तमपुरुष एकवचन अभुञ्जि है (शीङ् के ‘अशयि’ की तरह — लङ् आत्मनेपद का उत्तमपुरुष एकवचन प्रत्यय ‘इ’ है)।

प्रयोग — सः ह्यः फलम् अभुङ्क्त। · ते सर्वे अभुञ्जत। · अहं तत्र अभुञ्जि

प्र४.
‘भुज्’ धातुः, लोट्-लकारः — पृष्ठ 206
उत्तर
‘भुज्’- धातुः, लोट्-लकारः — पृष्ठ 206
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःभुङ्क्ताम्भुञ्जाताम्भुञ्जताम्
मध्यमपुरुषःभुङ्क्ष्वभुञ्जाथाम्भुङ्ग्ध्वम्
उत्तमपुरुषःभुनजैभुनजावहैभुनजामहै
अन्तिम पंक्ति ही इस धातु का सबसे सुन्दर पाठ है: पूरी आत्मनेपद-रूपावली में केवल यही तीन रूप ऐसे हैं जिनमें ‘भुनज्’ दिखता है, ‘भुञ्ज्’ नहीं — भुनजै, भुनजावहै, भुनजामहै। कारण यह कि लोट् के उत्तमपुरुष प्रत्ययों में ‘आट्’ आगम जुड़ने से वे पित् (और इसलिए बलवत्/strong) हो जाते हैं, और बलवत् अङ्ग ‘भुनज्’ है। शेष सब आत्मनेपद प्रत्यय दुर्बल हैं, इसीलिए वहाँ ‘भुञ्ज्’ आता है। ठीक यही बात रुध् में भी दिखती है — रुणधै, रुणधावहै, रुणधामहै।
ध्यान दें: यहाँ ‘भुञ्जै’ लिखना अशुद्ध है। ‘भुनजै’ में न् के बाद ‘अ’ है, इसलिए न् का ञ् नहीं होता; जहाँ न् सीधे ज् से टकराता है वहीं ‘ञ्ज’ बनता है। एक ही तालिका में दोनों अङ्ग साथ-साथ छपे हैं — भुञ्जताम् (दुर्बल) और भुनजामहै (बलवत्) — यह देखकर नियम स्वयं स्पष्ट हो जाता है।

प्रयोग — अतिथिः भुङ्क्ताम्। (अतिथि भोजन करें) · त्वं भुङ्क्ष्व। · अहं भुनजै? (क्या मैं खाऊँ?)

प्र५.
‘भुज्’ धातुः, विधिलिङ्-लकारः — पृष्ठ 206
उत्तर

नियम — विधिलिङ् सार्वधातुक है, इसलिए श्नम् फिर लौट आता है — और चूँकि यासुट् का ‘ई’ स्वर है, अङ्ग दुर्बल भुञ्ज् रहता है : भुञ्ज् + ई + त = भुञ्जीत

‘भुज्’- धातुः, विधिलिङ्-लकारः — पृष्ठ 206
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःभुञ्जीतभुञ्जीयाताम्भुञ्जीरन्
मध्यमपुरुषःभुञ्जीथाःभुञ्जीयाथाम्भुञ्जीध्वम्
उत्तमपुरुषःभुञ्जीयभुञ्जीवहिभुञ्जीमहि
यहाँ पूरी तालिका एक-रस क्यों है: विधिलिङ् के सब प्रत्यय ‘ई’ से आरम्भ होते हैं, अर्थात् सब स्वरादि हैं — इसलिए कहीं भी कठोर व्यञ्जन से टकराव नहीं होता और ‘भुङ्क्’ रूप एक बार भी नहीं आता। नौ के नौ खाने ‘भुञ्जी-’ से शुरू होते हैं। तुलना कीजिए — शीङ् में भी विधिलिङ् इसी तरह एक-रस था (शयी-)।
भुज् के पाँचों लकार एक पंक्ति में (प्रथमपुरुष एकवचन) —
लट् — भुङ्क्ते (खाता है) · लृट् — भोक्ष्यते (खाएगा) · लङ् — अभुङ्क्त (खाया)
लोट् — भुङ्क्ताम् (खाए) · विधिलिङ् — भुञ्जीत (खाना चाहिए)

प्रयोग — रोगी लघु भोजनं भुञ्जीत। (रोगी को हल्का भोजन करना चाहिए) · अतिथयः सह भुञ्जीरन्। · अहं मितं भुञ्जीय

अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। परिशिष्ट ५ पर शारदा कोई अभ्यास नहीं देती; ये केवल स्वयं जाँच के लिए यहाँ जोड़े गए हैं।
  1. ‘भुङ्क्ते’ में ज् का क् और ञ् का ङ् क्यों हुआ?
    उत्तर — आगे कठोर ‘त्’ होने से ज् का क् (चोः कुः, खरि च), और फिर क् वर्ग के कारण ञ् का ङ् (परसवर्ण)।
  2. ‘भुनजै’ में ‘भुनज्’ अङ्ग क्यों है, ‘भुञ्ज्’ क्यों नहीं?
    उत्तर — लोट् के उत्तमपुरुष प्रत्यय ‘आट्’ के कारण पित् (बलवत्) हो जाते हैं, और बलवत् अङ्ग भुनज् है। पूरी आत्मनेपद-तालिका में केवल ये तीन रूप बलवत् हैं।
  3. ‘भोक्ष्यते’ में ‘न्’ क्यों नहीं दिखता?
    उत्तर — श्नम् विकरण केवल सार्वधातुक लकारों में लगता है; लृट् का ‘स्य’ आर्धधातुक है, इसलिए विकरण नहीं आया।
  4. ‘भुञ्जीरन्’ का लकार, पुरुष तथा वचन बताइए।
    उत्तर — विधिलिङ्, प्रथमपुरुष, बहुवचन — ‘उन्हें खाना चाहिए’।
  5. ‘रुध्’ धातु को भुज् के साँचे पर चलाकर लट् प्रथमपुरुष एकवचन तथा लोट् उत्तमपुरुष एकवचन लिखिए।
    उत्तर — रुन्धे; रुणधै।
  6. ‘भुज्’ किस अर्थ में परस्मैपदी होती है और तब उसका लट् प्रथमपुरुष एकवचन क्या होगा?
    उत्तर — ‘रक्षा/पालन करना’ अर्थ में — तब भुनक्ति। पुस्तक ने केवल आत्मनेपद (खाना अर्थ) के रूप दिए हैं।
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