धातु — भुज् (रुधादिगण, अर्थ — खाना, भोगना)। पुस्तक इसे ‘विशिष्टधातवः (आत्मनेपदिनः)’ के नीचे रखती है, क्योंकि खाने के अर्थ में यह आत्मनेपदी है — फल खाने वाले को ही मिलता है। इसकी विशेषता यह है कि विकरण बाहर नहीं, धातु के भीतर लगता है।
भुज् → भु + न् + ज् — इससे दो अङ्ग बनते हैं
भुनज् (बलवत्/strong — जहाँ न् के बाद ‘अ’ आता है)
भुञ्ज् (दुर्बल/weak — जहाँ न् सीधे ज् से मिलकर ञ् हो जाता है, श्चुत्व से)
| ‘भुज्’- धातुः, लट्-लकारः — पृष्ठ 205 | |||
|---|---|---|---|
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | भुङ्क्ते | भुञ्जाते | भुञ्जते |
| मध्यमपुरुषः | भुङ्क्षे | भुञ्जाथे | भुङ्ग्ध्वे |
| उत्तमपुरुषः | भुञ्जे | भुञ्ज्वहे | भुञ्ज्महे |
प्रयोग — बालकः फलं भुङ्क्ते। (बालक फल खाता है) · ते ओदनं भुञ्जते। · अहं मिष्टान्नं भुञ्जे। · वयं सह भुञ्ज्महे।