प्र1.
मौसम संबंधी पूर्वानुमान कभी-कभी त्रुटिपूर्ण क्यों हो जाते हैं?
उत्तर
क्योंकि मौसम अनेक साथ-साथ बदलती राशियों पर निर्भर करता है, और आज की परिस्थितियों का अत्यंत सूक्ष्म अंतर भी कुछ दिनों में पूरी तरह भिन्न मौसम बन जाता है।
- वायुमंडल की स्थिति ताप, दाब, आर्द्रता और वायु से तय होती है — हर स्थान पर और हर ऊँचाई पर।
- पूर्वानुमान इन मापनों को एक मॉडल में डालकर किया जाता है। परंतु मापन केंद्र और उपग्रह कई किलोमीटर की दूरी पर हैं, अतः उनके बीच की स्थिति अनुमान से भरनी पड़ती है।
- इस आरंभिक चित्र की छोटी-सी त्रुटि छोटी नहीं रहती। वह दुगुनी होती है, फिर दुगुनी — और कुछ दिनों में स्वयं मौसम जितनी बड़ी हो जाती है।
आज एक स्थान पर त्रुटि ≈ 0.1 °C
लगभग प्रत्येक 1–2 दिन में दुगुनी
8 दिन बाद ≈ 0.1 °C × 2⁵ ≈ 3 °C — पूरे मौसम-परिवर्तन जितनी बड़ी
लगभग प्रत्येक 1–2 दिन में दुगुनी
8 दिन बाद ≈ 0.1 °C × 2⁵ ≈ 3 °C — पूरे मौसम-परिवर्तन जितनी बड़ी
ऐसा क्यों होता है: वायुमंडल केवल जटिल नहीं, संवेदनशील है। वायु-प्रवाह के समीकरण स्वयं पर लौटते हैं — थोड़ा गर्म भाग कुछ तेज़ी से ऊपर उठता है, जिससे और वायु खिंचती है, जिससे बादल खिसकता है, जिससे सूर्य अगली जगह ज़मीन गर्म करता है। यही कारण है कि पूर्वानुमान कुछ घंटों, यहाँ तक कि कुछ दिनों के लिए तो विश्वसनीय रहते हैं, किंतु आगे की अवधि के लिए उनकी विश्वसनीयता घटती जाती है। ध्यान दीजिए कि कारण यह नहीं है कि भौतिकी गलत है या मॉडल खराब बना है — सीमा इस बात से आती है कि आरंभिक स्थिति कभी पूर्णतः मापी ही नहीं जा सकती।
क्या आप जानते हैं? इसी कारण मौसम विज्ञानी एक ही मॉडल को थोड़ी-थोड़ी भिन्न आरंभिक स्थितियों से कई बार चलाते हैं। यदि 50 में से 45 बार वर्षा आती है तो वे कहते हैं “वर्षा की 90% संभावना”। इन परिणामों का फैलाव ही इस बात का ईमानदार माप है कि पूर्वानुमान पर कितनी दूर तक भरोसा किया जा सकता है।