कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 10 पाठ्य प्रश्न के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
मानव एवं जंतु ध्वनि किस प्रकार उत्पन्न करते हैं? बोलते समय अथवा गाते समय अपने गले को धीरे से स्पर्श कीजिए। क्या आपको कहीं कंपन का अनुभव हुआ?
उत्तर

हाँ — गले के अगले भाग में, वाक् यंत्र (कंठ) पर स्पष्ट झनझनाहट अनुभव होती है।

मनुष्यों और अनेक जंतुओं में ध्वनि वाक् तंतुओं के कंपन से उत्पन्न होती है — ये कंठ के भीतर कसकर खिंची हुई पेशीय पट्टियाँ हैं। फेफड़ों से ऊपर आती वायु इनके बीच से निकलती है और इन्हें कंपित कर देती है; यही कंपन आपकी वाणी बनते हैं।

  • इसके बाद जीभ, होंठ, मुँह और नासा-गुहा इस मूल ध्वनि को वाणी अथवा संगीत में रूपांतरित करते हैं।
  • जंतु दूसरे ढंग से भी ध्वनि बनाते हैं: टिड्डे और झींगुर अपने पंखों अथवा टाँगों को रगड़कर ध्वनि उत्पन्न करते हैं, अतः रगड़ने वाले पृष्ठ ही कंपन करने वाला स्रोत होते हैं।
वाणी का तारत्व भिन्न क्यों होता है: वाक् तंतु क्रियाकलाप 10.1 के तने हुए रबड़ बैंड जैसा व्यवहार करते हैं। किशोरावस्था में लड़कों के वाक् तंतु लंबे और मोटे हो जाते हैं, अतः वे प्रति सेकंड कम बार कंपन करते हैं — आवृत्ति कम, और वाणी में गहनता आ जाती है। प्रत्येक व्यक्ति की ध्वनि-गुणता उसके गले, मुँह और नासा-गुहा की आकृति पर भी निर्भर करती है, इसीलिए आप मित्र की वाणी तुरंत पहचान लेते हैं।
स्वयं जाँचिए: गले पर अँगुलियाँ रखकर पहले गुनगुनाइए, फिर वही शब्द फुसफुसाकर कहिए। फुसफुसाने पर झनझनाहट लुप्त हो जाती है — फुसफुसाहट में वाक् तंतु कंपन नहीं करते।
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