हाँ — एक स्थिर, शुद्ध गुंजार सुनाई देती है।
टक्कर से दोनों भुजाएँ एक-दूसरे की ओर तथा दूर कंपन करने लगती हैं। प्रत्येक बाहर की ओर गति भुजा के पास की वायु को संपीडित करती है और प्रत्येक भीतर की ओर गति उसे विरल करती है, अतः संपीडनों-विरलनों की एक श्रृंखला आपके कान तक पहुँचती है।
ध्वनि के प्रयोगों में स्वरित्र द्विभुज ही क्यों: वाणी या घंटी के विपरीत यह लगभग एकल आवृत्ति (एक शुद्ध स्वर) देता है। इसकी आवृत्ति भुजाओं की लंबाई, मोटाई और पदार्थ से निश्चित होती है, अतः चाहे जितने ज़ोर से टकराइए वह बदलती नहीं — अधिक ज़ोर से टकराने पर ध्वनि केवल प्रबल होती है, तीक्ष्ण नहीं।
संकेत: इसे सदैव नरम रबड़ पैड पर ही टकराइए, कभी मेज़ या किसी कठोर किनारे पर नहीं। कठोर सतह से भुजाएँ मुड़ या टूट सकती हैं और स्वरित्र की आवृत्ति स्थायी रूप से बदल जाती है।