कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 13 अभ्यास प्रश्न के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
पारितंत्र में जैव-भू रासायनिक चक्रों की भूमिका का वर्णन करने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त विकल्प चुनिए। (i) समस्त जीवों को प्रत्यक्ष रूप से भोजन उपलब्ध कराना। (ii) जैविक और अजैविक घटकों के मध्य आवश्यक पोषक पुनर्चक्रण करना। (iii) सजीवों के उपयोग के लिए नए तत्वों का निर्माण करना। (iv) जीव से प्रदूषक और विषाक्त पदार्थों को हटाना।
उत्तर

सही विकल्प: (ii) जैविक और अजैविक घटकों के मध्य आवश्यक पोषक पुनर्चक्रण करना।

अन्य विकल्प क्यों ग़लत हैं:
  • (i) ग़लत है — भोजन उत्पादक प्रकाश संश्लेषण द्वारा बनाते हैं। चक्र केवल कच्ची सामग्री (कार्बन, नाइट्रोजन, जल) को घुमाता है; वह भोजन नहीं बाँटता।
  • (iii) ग़लत है — किसी भी जैविक या रासायनिक प्रक्रिया से तत्वों का निर्माण नहीं हो सकता। चक्र कार्बन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन के उन्हीं सीमित परमाणुओं को बार-बार प्रयोग करते हैं।
  • (iv) ग़लत है — यह किसी जीव के उत्सर्जी अंगों का कार्य है, किसी वैश्विक चक्र का नहीं।
अध्याय की अपनी परिभाषा से यह स्पष्ट है — "अजैविक और जैविक घटकों के मध्य, द्रव्य और ऊर्जा का यह चक्रीय संचलन जैव-भू रासायनिक चक्र कहलाता है", और यह "सुनिश्चित करती है कि आवश्यक पोषक तत्व, जैसे— कार्बन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन पुनः चक्रण द्वारा पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए उपलब्ध रहते हैं।"
प्र2.
निम्नलिखित में से कौन-सा विकल्प पृथ्वी के गर्म होने के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी है? (i) सौर विकिरण शीघ्रता से कार्बन डाईआक्साइड द्वारा अवशोषित हो जाती है, जो इसे ऊष्मा के रूप में निर्मुक्त करती है। (ii) वायुमंडल के सूक्ष्म कण आगामी सौर विकिरण को अवशोषित करते हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी को गर्म करते हैं। (iii) पृथ्वी की सतह, सौर विकिरण का अवशोषण करती है, जो पुन: विकिरित होती है और हरित गृह गैसों द्वारा रोक ली जाती है। (iv) पृथ्वी का वातावरण बादलों द्वारा परावर्तित सौर विकिरण से ही गर्म होता है।
उत्तर

सही विकल्प: (iii) पृथ्वी की सतह, सौर विकिरण का अवशोषण करती है, जो पुन: विकिरित होती है और हरित गृह गैसों द्वारा रोक ली जाती है।

सूर्य का प्रकाश (मुख्यतः दृश्य) वायुमंडल से गुज़रकर भूमि द्वारा अवशोषित
भूमि गर्म → अवरक्त रूप में पुनः विकिरित (क्योंकि पृथ्वी सूर्य से बहुत ठंडी है)
हरितगृह गैसें (CO2, CH4, जलवाष्प) इस अवरक्त को अवशोषित कर लेती हैं
उसका कुछ भाग पुनः नीचे भेजा जाता है → सतह जीवन के लिए पर्याप्त गर्म बनी रहती है
अन्य विकल्प क्यों असफल हैं:
  • (i) CO2 आते हुए दृश्य सूर्य-प्रकाश के लिए बहुत हद तक पारदर्शी है। वह बाहर जाती अवरक्त विकिरण अवशोषित करती है, आती हुई नहीं।
  • (ii) कण थोड़ा अवशोषण और प्रकीर्णन अवश्य करते हैं, परंतु यह प्रभाव छोटा है; वायुमंडल मुख्यतः नीचे से, अर्थात् सतह से गर्म होता है। इसीलिए क्षोभमंडल में ऊँचाई के साथ ताप घटता है।
  • (iv) बादलों द्वारा परावर्तित विकिरण तो अंतरिक्ष में चली गई ऊर्जा है — वह पृथ्वी को गर्म कर ही नहीं सकती। "ही" शब्द इस विकल्प को स्पष्टतः ग़लत बना देता है।
प्र3.
स्पष्ट कीजिए कि जलवायु परिवर्तन, जल चक्र को किस प्रकार प्रभावित करता है? उदाहरणों द्वारा दर्शाइए।
उत्तर

गर्म वायुमंडल अधिक जलवाष्प धारण करता है, इसलिए जल चक्र तेज़ और उग्र हो जाता है — कहीं अत्यधिक तीव्र वर्षा, कहीं लंबा सूखा, और जमे हुए जल का भंडार निरंतर घटता हुआ।

जल चक्र का चरणजलवायु परिवर्तन से क्या बदलता हैअध्याय से उदाहरण
वाष्पनगर्म समुद्र और स्थल से वाष्पन तेज़; गर्म वायु अधिक नमी धारण करती हैगर्म अरब सागर दक्षिण-पश्चिम मानसून को नमी देता है
वर्षणअधिक नमी थोड़े समय में तीव्र झड़ी के रूप में गिरती है; अन्य क्षेत्रों को कुछ नहीं मिलता"कुछ क्षेत्रों (जैसे तीव्र मानसून) में अधिक वर्षा और कुछ अन्य क्षेत्रों में सूखा"
हिम का पिघलना (हिममंडल)हिमानियाँ तेज़ी से पिघलती हैं — अभी नदियों में जल बढ़ता है, आगे चलकर समुद्र स्तर"हिमानियों के पिघलने से नदियों में जल की अधिकता से दीर्घकाल में समुद्र का जल स्तर बढ़ सकता है और वह तटीय शहरों, जैसे— मुंबई और चेन्नई के लिए संकट बन सकता है"
अपवाहतीव्र वर्षा रिसने के बजाय सतह से बह जाती है और मृदा का अपरदन करती है"आकस्मिक तीव्र वर्षा से सतही जल का अपवाह बढ़ जाता है और मृदा क्षरण होता है"
अंतःस्यंदन और भूजलजल कम रिसता है, इसलिए भूजल का पुनर्भरण नहीं हो पाता"जल का कम रिसाव भूजल के पुनर्भरण को कम कर देता है जिसके परिणामस्वरुप कृषि को विशेषकर शुष्क महीनों के दौरान बनाए रखना कठिन हो जाता है"
ऊष्मा चक्र को तेज़ क्यों करती है: वाष्पन के लिए ऊर्जा चाहिए, और गर्म सतह वह ऊर्जा तेज़ी से देती है। गर्म वायु संतृप्त होने से पहले अधिक जलवाष्प धारण भी कर सकती है, इसलिए वर्षा से पहले वह अधिक बोझ ढोती है। जब वह बोझ अंततः गिरता है तो अधिक भारी वर्षा के रूप में गिरता है। ध्यान दीजिए — पृथ्वी पर जल की कुल मात्रा तनिक भी नहीं बदली; वही जल केवल तेज़ी से और अधिक असमान रूप से इधर-उधर पहुँचाया जा रहा है।
अध्याय जिस जुड़ाव पर बल देता है: "जल चक्र, हिममंडल (glaciers), जलमंडल (नदियाँ और महासागर), वायुमंडल (नमी), भूमंडल (मृदा अपरदन और अंत: स्यंदन में कमी) और जैवमंडल (फसलें और मत्स्य पालन) को परस्पर जोड़ता है।" ताप में हुआ एक ही परिवर्तन इसी एक चक्र के माध्यम से पाँचों मंडलों तक पहुँच जाता है।
प्र4.
वर्णन कीजिए कि एल्बिडो किस प्रकार पृथ्वी की सतह के ताप और इसकी जलवायु को प्रभावित करता है।
उत्तर

एल्बिडो तय करता है कि आती हुई धूप का कितना अंश सीधे वापस लौटा दिया जाएगा। उच्च एल्बिडो वाली सतह अधिकांश परावर्तित कर ठंडी रहती है; निम्न एल्बिडो वाली सतह अधिकांश अवशोषित कर गर्म हो जाती है। चूँकि पृथ्वी के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों का एल्बिडो बहुत भिन्न है, इसलिए एल्बिडो प्रत्येक क्षेत्र की जलवायु तय करने में सहायक होता है।

एल्बिडो, a = परावर्तित विकिरण ÷ प्राप्त विकिरण (एक शुद्ध संख्या, 0 से 1)
प्रति इकाई क्षेत्र अवशोषित ऊर्जा = (1 – a) × सूर्यातप

सूर्यातप = 1000 W m–2 लेने पर:
ताज़ी हिम, a = 0.85 → अवशोषित = (1 – 0.85) × 1000 = 150 W m–2
महासागरीय जल, a = 0.06 → अवशोषित = (1 – 0.06) × 1000 = 940 W m–2
यह जलवायु को कैसे गढ़ता है:
  • ध्रुवीय प्रदेश जमे रहते हैं। हिम और बर्फ आती हुई विकिरण का 0.80 – 0.90 भाग परावर्तित कर देती हैं, इसलिए बहुत कम ऊर्जा अवशोषित होती है। अध्याय भी यही कहता है — उच्च एल्बिडो के कारण "ध्रुवीय प्रदेश अत्यधिक ठंडे रहते हैं"।
  • महासागर और काली मृदा ऊष्मा संचित करते हैं। निम्न एल्बिडो के कारण वे लगभग सब कुछ अवशोषित कर लेते हैं और "अपेक्षाकृत अधिक गर्म रहते हैं" — और महासागर, जिसकी ऊष्मा-धारिता विशाल है, फिर पृथ्वी का ऊष्मा-भंडार बन जाता है।
  • शहर ऊष्मा द्वीप बन जाते हैं। गहरे रंग की डामर सड़कें और कंक्रीट निम्न एल्बिडो वाले हैं, प्रबलता से अवशोषित करते हैं और रात में पुनः विकिरित करते हैं। यही शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव है, जिससे वातानुकूलन की माँग बढ़ जाती है।
  • वनोन्मूलन एल्बिडो बदल देता है। अध्याय कहता है कि वनों की कटाई "सतही एल्बिडो को भी बदल देता है", अर्थात् भूमि-उपयोग में परिवर्तन सीधे स्थानीय ऊर्जा-संतुलन बदल देता है।
  • हिम–एल्बिडो पुनर्भरण। बर्फ पिघलने पर गहरे रंग का महासागर उघड़ जाता है; महासागर अधिक अवशोषित कर अधिक गर्म होता है और और बर्फ पिघलाता है। छोटा-सा तापन स्वयं को बढ़ा लेता है।
रोज़मर्रा की जाँच: अध्याय के अपने उदाहरण गली-मुहल्ले के स्तर पर भी काम करते हैं — गहरे रंग की सड़कें हल्के रंग की सतहों की तुलना में जल्दी गर्म हो जाती हैं, और ग्रीष्म में गहरे रंग के कपड़े श्वेत कपड़ों की तुलना में अधिक गर्म लगते हैं। सूर्य वही, एल्बिडो भिन्न।
प्र5.
पर्वतीय और घाटी समीर किस प्रकार बनती हैं? मान लीजिए दो पर्वत हैं, एक घास द्वारा आच्छादित है और दूसरा बंजर चट्टानों से, क्या दोनों पर्वतीय समीरों के ताप भिन्न-भिन्न होंगे? यदि ऐसा है तो किस प्रकार?
उत्तर

दोनों समीर ढलान और घाटी के तल के भिन्न दरों से गर्म तथा ठंडे होने से बनती हैं। और हाँ — दोनों पर्वतीय समीरों के ताप भिन्न होंगे: बंजर चट्टानों वाले पर्वत से उतरने वाली समीर घास से ढके पर्वत की समीर से अधिक ठंडी होगी।

भाग 1 — दोनों समीर कैसे बनती हैं

घाटी समीर (दिन)पर्वतीय समीर (रात)
पहले क्या गर्म/ठंडा होता हैधूप वाली ढलान घाटी के तल से तेज़ी से गर्म होती हैढलान तेज़ी से ऊष्मा खोती है; घाटी का तल अपेक्षाकृत गर्म रहता है
ढलान की वायुगर्म होकर फैलती है, कम सघन होती है, ऊपर उठती हैठंडी होकर सघन हो जाती है, नीचे बैठती है
दाबढलान के ऊपर निम्न दाब क्षेत्र बनता हैसघन शीतल वायु ढलान से नीचे दबाव डालती है
पवन की दिशाघाटी की ठंडी वायु ढलान पर ऊपर चढ़ती हैढलान की शीतल वायु नीचे घाटी में उतरती है

भाग 2 — घास वाली ढलान बनाम बंजर चट्टान

तर्क:
  • दिन में नंगी चट्टान अधिक गर्म होती है। चट्टान की विशिष्ट ऊष्मा-धारिता कम है और उस पर छाया देने या वाष्पोत्सर्जन करने वाली वनस्पति नहीं है, इसलिए उसकी सतह का ताप तेज़ी से चढ़ता है। इसके विपरीत घास वाष्पोत्सर्जन से ठंडी रहती है — वाष्पित होता जल गुप्त ऊष्मा ले जाता है — और वनस्पति की छाया मृदा को ठंडा रखती है।
  • रात में नंगी चट्टान अधिक ठंडी भी होती है। अध्याय भवन-सामग्री के विषय में ठीक यही बात कहता है: कंक्रीट रात में अपनी संचित ऊष्मा प्रबलता से पुनःविकिरित करता है, जबकि गाढ़ी मिट्टी और लकड़ी की दीवारें "ठंडक का अनुभव कराती हैं, क्योंकि इनसे ऊष्मा का पुनःविकिरण कम हो जाता है।" खुली चट्टान की सतह स्वच्छ आकाश की ओर मुक्त रूप से विकिरण कर अपनी ऊष्मा शीघ्र खो देती है।
  • घास वाली ढलान अपनी ऊष्मा रोक लेती है। नम मृदा और पादप ऊतक अधिकांशतः जल हैं, और जल की विशिष्ट ऊष्मा-धारिता बहुत अधिक (4200 J kg–1 °C–1) है, इसलिए उतनी ही ऊष्मा खोने पर ताप में गिरावट कहीं कम होती है। घास जो जलवाष्प छोड़ती है, वह ढलान के ठीक ऊपर की वायु में एक हरितगृह गैस जोड़ देती है, जिससे विकिरण द्वारा शीतलन और धीमा पड़ जाता है।
निष्कर्ष: बंजर चट्टान पर टिकी वायु अधिक नीचे ताप तक ठंडी होती है, इसलिए उससे उतरती पर्वतीय समीर अधिक ठंडी होती है। घास से ढके पर्वत की समीर अपेक्षाकृत मंद और अधिक नम होती है। (दिन में यही अंतर बंजर पर्वत की घाटी समीर को अधिक प्रबल बना देता है, क्योंकि उसे चलाने वाला ताप-अंतर बड़ा होता है।)
संकेत: पूरा उत्तर विगत कक्षाओं की एक ही अवधारणा पर टिका है — जिस पदार्थ में जल अधिक हो, उसका ताप धीरे बदलता है। घास और नम मृदा में जल है; नंगी चट्टान में नहीं।
प्र6.
आप पवन, तूफान और वर्षा आदि मौसमी परिघटनाओं के साक्षी रहे हैं। वायुमंडल की कौन-सी परतें इनके लिए उत्तरदायी हैं? और इन परिघटनाओं के होने का प्रमुख कारण क्या है?
उत्तर

क्षोभमंडल — सबसे निचली परत, 0 – 12 km, जिसमें "लगभग सभी मौसम संबंधी परिघटनाएँ" घटित होती हैं। प्रमुख कारण यह है कि क्षोभमंडल नीचे से, अर्थात् पृथ्वी की सतह से गर्म होता है, इसलिए इसमें ऊँचाई के साथ ताप घटता है (लगभग 6.5 °C प्रति km) और भूमि के पास की गर्म वायु ऊपर उठ सकती है।

सतह सूर्य का प्रकाश अवशोषित करती है → सतह गर्म हो जाती है
उसके संपर्क की वायु गर्म → फैलती है, कम सघन हो जाती है
कम सघन वायु ऊपर उठती है → संवहन धाराएँ बनती हैं
ऊपर उठती वायु ठंडी होती है → जलवाष्प संघनित होती है → बादल → वर्षा
ऊपर उठी वायु का स्थान लेने दौड़ती वायु = पवन; उठान प्रचंड हो तो = तूफ़ान
ऊपर की परत में तूफ़ान क्यों नहीं आते: समतापमंडल (12 – 50 km) में ओजोन परत पराबैंगनी किरणें अवशोषित करती है, इसलिए यह परत ऊपर से गर्म होती है और इसमें ऊँचाई के साथ ताप बढ़ता है। ठंडी वायु के ऊपर गर्म वायु का होना एक स्थायी व्यवस्था है — उसमें से होकर कुछ भी ऊपर उठना नहीं चाहता। अध्याय कहता है कि यह "वायु के ऊर्ध्वाधर मिश्रण की कमी के कारण इस परत को शांत कर देती है, जिससे मौसम क्षोभमंडल तक ही सीमित रहता है।" इसी स्थायित्व के कारण वायुयान क्षोभमंडल के शिखर और निचले समतापमंडल में, मौसम के ऊपर, उड़ान भरते हैं।
ध्यान दीजिए: वायुमंडल की लगभग सारी जलवाष्प भी क्षोभमंडल में ही रहती है — और जलवाष्प के बिना न बादल, न वर्षा, न तूफ़ान चलाने वाली गुप्त ऊष्मा। क्षोभमंडल की ऊँचाई भूमध्य रेखा के ऊपर सबसे अधिक (जहाँ ऊष्मण सबसे तीव्र है) और ध्रुवों के ऊपर सबसे कम होती है।
प्र7.
नाइट्रोजन चक्र में होने वाली प्रक्रियाओं की व्याख्या कीजिए। यदि नाइट्रोजन का चक्रण नहीं हो तो पृथ्वी पर जीवन किस प्रकार प्रभावित होगा?
उत्तर

नाइट्रोजन का सबसे बड़ा भंडार वायुमंडल में है, परंतु N2 गैस अक्रियाशील है, इसलिए जीवन के उपयोग में आने से पहले उसे घुलनशील यौगिकों में बदलना पड़ता है। पाँच प्रक्रियाएँ मिलकर इस बंद लूप को पूरा करती हैं।

वायुमंडलीय N₂ (78%) अमोनिया NH₃ नाइट्राइट NO₂⁻ नाइट्रेट NO₃⁻ पादप → जंतु अपघटक नाइट्रोजन स्थिरीकरण (राइजोबियम, एजोटोबैक्टर, तड़ित) नाइट्रीकरण नाइट्रीकरण स्वांगीकरण मृत्यु, अपशिष्ट विनाइट्रीकरण (स्यूडोमोनास) अमोनीकरण नाइट्रोजन को अमोनिया के रूप में मृदा में लौटाता है
नाइट्रोजन चक्र (चित्र 13.15 से तुलना कीजिए)। नाइट्रोजन वायु से केवल स्थिरीकरण द्वारा निकलती है और वायु में केवल विनाइट्रीकरण द्वारा लौटती है।
प्रक्रियाक्या होता हैकौन करता है
नाइट्रोजन स्थिरीकरणवायुमंडलीय N2 → अमोनिया (NH3)फलीदार पादपों की जड़ ग्रंथियों में राइजोबियम, मृदा में एजोटोबैक्टर; तड़ित और हाबर–बॉश प्रक्रिया भी
नाइट्रीकरणNH3 → नाइट्राइट (NO2) → नाइट्रेट (NO3)नाइट्रोसोमोनास, फिर नाइट्रोबैक्टर
स्वांगीकरणपादप मृदा से नाइट्रेट लेकर प्रोटीन और न्यूक्लीक अम्ल बनाते हैं; जंतु खाकर नाइट्रोजन प्राप्त करते हैंपादप, फिर जंतु
अमोनीकरणमृत शरीर और अपशिष्ट का अपघटन होकर अमोनिया मृदा में लौट आती हैअपघटक जीवाणु और कवक
विनाइट्रीकरणकुछ नाइट्रेट पुनः N2 गैस बनकर वायुमंडल में लौट जाती है — चक्र पूरास्यूडोमोनास
यदि नाइट्रोजन का चक्रण न हो: नाइट्रोजन "सभी सजीवों में प्रोटीनों और न्यूक्लीक अम्लों के संश्लेषण के लिए एक आवश्यक तत्व है"। प्रोटीन एंज़ाइम, पेशी और प्रत्येक कोशिकीय संरचना बनाते हैं; न्यूक्लीक अम्ल (DNA और RNA) जीवन के निर्देश ढोते हैं। चक्र रुकने पर—
  • वायु की 78 प्रतिशत N2 व्यर्थ रह जाएगी, क्योंकि "पादप तथा जंतु इसका प्रत्यक्षतः उपयोग नहीं कर सकते हैं।"
  • मृदा का नाइट्रेट उगते पादप खा जाएँगे और वह कभी भरा नहीं जाएगा, इसलिए पादप प्रोटीन नहीं बना पाएँगे — वृद्धि, मरम्मत और बीज-निर्माण रुक जाएगा।
  • जंतु, जो नाइट्रोजन केवल पादप या अन्य जंतुओं को खाकर पाते हैं, प्रोटीन के अभाव में मर जाएँगे।
  • अपघटक मृत पदार्थ में बंद नाइट्रोजन को लौटा नहीं पाएँगे, इसलिए वह सदा के लिए संचरण से बाहर हो जाएगी।
जीवन, जैसा हम जानते हैं, चल नहीं पाएगा। प्रत्येक जीव का प्रोटीन उधार ली हुई नाइट्रोजन है, जिसे अंततः लौटाना ही पड़ता है।
क्या आप जानते हैं? अध्याय का आइए, और आगे बढ़ें बताता है कि "मानव शरीर में उपस्थित आधे से भी अधिक नाइट्रोजन परमाणु इसी हाबर–बॉश प्रक्रिया से बनते हैं" — वायुमंडलीय नाइट्रोजन से अमोनिया बनाने की वह औद्योगिक प्रक्रिया जिसे "वायु से अन्न" कहा गया और जिसने भारत की हरित क्रांति संभव बनाई। इसकी क़ीमत यह है कि यह वैश्विक ऊर्जा का लगभग 1 – 2 प्रतिशत खपाती है, और इससे बने उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग ने मृदा तथा जल को क्षति पहुँचाई है।
प्र8.
वनोन्मूलन का पृथ्वी के ऑक्सीजन और कार्बन चक्रों पर क्या प्रभाव पड़ता है? वनोन्मूलन के अन्य परिणाम क्या हैं?
उत्तर

वनोन्मूलन दोनों चक्रों पर एक ही ओर से प्रहार करता है: यह उस तंत्र को हटा देता है जो वायु से CO2 लेकर O2 देता था, और साथ ही वृक्षों में संचित कार्बन को मुक्त भी कर देता है।

चक्रवन काटने का प्रभाव
ऑक्सीजन चक्रवायुमंडलीय O2 को पुनर्स्थापित करने वाली एकमात्र बड़ी प्रक्रिया प्रकाश संश्लेषण है। वृक्ष कम होने से O2 का उत्पादन घटता है, जबकि श्वसन और दहन उसका उपभोग करते रहते हैं — इसलिए चक्र का संतुलन उपभोग की ओर झुक जाता है।
कार्बन चक्रएक साथ दो चोटें। (क) एक कार्बन अवशोषक हट जाता है — वृक्ष प्रकाश संश्लेषण के लिए CO2 नहीं ले पाते। (ख) एक कार्बन स्रोत बन जाता है — कटे वृक्षों के जलने या सड़ने से उनका संचित कार्बन CO2 बनकर निकल जाता है। अध्याय कहता है कि जीवाश्म ईंधनों का दहन और वनोन्मूलन मिलकर "वन तथा महासागर जैसे प्राकृतिक कार्बन अवशोषक" संतृप्त कर रहे हैं।

अध्याय में दिए गए अन्य परिणाम:

  • स्थानीय वर्षा में कमी। "वनों की कटाई से प्रकाश संश्लेषण में कमी आती है और वाष्पोत्सर्जन घट जाता है जिससे स्थानीय वर्षा में कमी हो सकती है।" वृक्ष भूजल को वायु में पंप करते हैं; वृक्ष हटे तो नमी की वह आपूर्ति भी रुक जाती है।
  • एल्बिडो में परिवर्तन। "यह सतही एल्बिडो को भी बदल देता है", जिससे स्थानीय ऊर्जा-संतुलन और ताप बदल जाते हैं।
  • मृदा अपरदन। "मृदा को बाँधकर रखने वाली वृक्षों की जड़ों के अभाव में मृदा अपरदन बढ़ सकता है" — ऊपरी मृदा बह जाती है, नदियों में गाद भरती है और बाढ़ बढ़ जाती है।
  • पर्यावास और जैव विविधता की हानि। "समय के साथ पर्यावास नष्ट हो सकते हैं। परिणामस्वरूप अनेक जाति (species) अपने प्राकृतिक आवास खो देंगी और जैव विविधता में कमी आएगी।"
एक ही कार्य के इतने प्रभाव क्यों: वन केवल वृक्षों का समूह नहीं है — वह एक साथ चार मंडलों का कार्यशील अंग है। वह वायुमंडल से गैसों का आदान-प्रदान करता है, जलमंडल में जल वाष्पोत्सर्जित करता है, अपनी जड़ों से भूमंडल को बाँधता है और जैवमंडल को आश्रय देता है। उसे काटने से चारों संबंध एक ही प्रहार में कट जाते हैं।
प्र9.
उपयुक्त चित्र से उस पथ की व्याख्या कीजिए जिससे कार्बन पुन: वायुमंडल में जाता है। इस चित्र का आरंभ आप पादपों द्वारा वायुमंडलीय CO2 के उपयोग से कर सकते हैं।
उत्तर

कार्बन वायुमंडल से केवल एक मुख्य द्वार से निकलता है — प्रकाश संश्लेषण — परंतु लौटता चार द्वारों से है: श्वसन, अपघटन, जीवाश्म ईंधनों का दहन, और महासागर से निर्मुक्ति।

वायुमंडल में CO₂ पादप (ग्लूकोस) जंतु मृत जैव पदार्थ जीवाश्म ईंधन जल में CO₂ प्रकाश संश्लेषण (भीतर जाने का एकमात्र मार्ग) श्वसन श्वसन अपघटन दहन आदान-प्रदान खाया जाना मृत्यु लाखों वर्षों तक दबे रहना
हरे तीर: वायुमंडल से कार्बन का निकलना। लाल तीर: चार वापसी-पथ। धूसर बिंदुदार तीर: सजीव और दबे हुए भंडारों के बीच कार्बन का संचलन।
पथ, लिखित रूप में:
वायु की CO2प्रकाश संश्लेषण → पादप में ग्लूकोस
   → (1) पादप का श्वसन → CO2 वायु में वापस
   → जंतु द्वारा खाया जाना → (2) जंतु का श्वसन → CO2 वायु में वापस
   → पादप/जंतु की मृत्यु → (3) सूक्ष्मजीवों द्वारा अपघटन → CO2 वायु में वापस
   → लाखों वर्ष दबे रहना → कोयला, तेल, गैस → (4) दहन → CO2 वायु में वापस
   → समुद्री जल में कार्बोनेट/हाइड्रोजन कार्बोनेट के रूप में घुलना → वायु के साथ आदान-प्रदान
एक नहीं, दो घड़ियाँ। अध्याय इन्हें सावधानी से अलग करता है।
  • द्रुत चक्र "कुछ दिनों से वर्षों तक" चलता है — प्रकाश संश्लेषण, श्वसन और अपघटन।
  • मंद चक्र "लाखों वर्षों" तक चलता है — मृत जीवों का दबना और जीवाश्म ईंधनों में बदलना।
यही जलवायु समस्या का मूल है। जिस कार्बन को मंद चक्र ने लाखों वर्षों में दबाया, उसे दहन "बहुत कम समय में" लौटा दे रहा है। हम एक मंद भंडार को एक तेज़ नल से खाली कर रहे हैं।
प्र10.
वायुमंडल में CO2 की अधिकता को अवांछनीय क्यों माना जाता है जबकि पादपों को इसकी आवश्यकता होती है?
उत्तर

क्योंकि पादपों के लिए CO2 की उपयोगिता और पृथ्वी के ताप पर उसका प्रभाव दो अलग-अलग बातें हैं, और इनमें से केवल एक की एक सीमा है। पादप एक हद तक ही उपयोग कर सकते हैं; हरितगृह प्रभाव बढ़ता ही जाता है।

"आवश्यक" और "अधिकता" में विरोध क्यों नहीं है:
  • पादप की माँग की एक छत है। प्रकाश संश्लेषण जल, प्रकाश, ताप और खनिज-आपूर्ति से भी सीमित होता है, केवल CO2 से नहीं। जैसे ही कोई दूसरा कारक सीमाकारी बन जाता है, अतिरिक्त CO2 कुछ नहीं जोड़ती।
  • हरितगृह प्रभाव की ऐसी कोई छत नहीं है। प्रत्येक अतिरिक्त CO2 अणु बाहर जाती और अधिक अवरक्त विकिरण रोक लेता है। अध्याय के शब्दों में — "यद्यपि पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने और उसे पर्याप्त गर्म रखने के लिए कुछ मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड की आवश्यकता होती है", संतुलन ही निर्णायक है।
अध्याय में गिनाए गए परिणाम:
हरितगृह प्रभाव तीव्र → वैश्विक तापन
→ हिमानियों और आर्कटिक समुद्री बर्फ का पिघलना
→ समुद्र के जल स्तर का बढ़ना → तटीय शहरों पर संकट
→ मौसम की अधिक चरम परिस्थितियाँ
→ भारत में प्रचंड मानसून और बदलते वर्षा पैटर्न → कृषि पर खतरा
→ समुद्र में अधिक CO2 घुलना → महासागरीय अम्लीकरण → प्लवक और प्रवाल को हानि
प्रमाण: चित्र 13.14 (कीलिंग वक्र) दिखाता है कि CO2 वर्ष 1960 के लगभग 315 ppm से बढ़कर आज लगभग 420 ppm हो गई है — अर्थात् 105 ppm की वृद्धि, जो 33% बनती है (पुस्तक इसे "लगभग 35 प्रतिशत" लिखती है), और अध्याय इसे "मानव सभ्यता के इतिहास में असामान्य" कहता है। वक्र के छोटे-छोटे आरीनुमा दाँते उत्तरी गोलार्ध की वनस्पति का प्रत्येक ग्रीष्म में साँस लेना और शीत में छोड़ना हैं — यह प्रमाण है कि पादप CO2 अवशोषित कर रहे हैं, और साथ ही यह भी प्रमाण है कि वे इस चढ़ाई को रोक पाने जितना अवशोषित नहीं कर पा रहे।
प्र11.
पृथ्वी की सतह से ऊष्मा का क्षय किस प्रकार होता है? इसकी क्या सार्थकता है?
उत्तर

सतह चार प्रकार से ऊष्मा खोती है — अवरक्त विकिरण द्वारा, स्पर्श में आई वायु तक चालन द्वारा, गर्म वायु के ऊपर उठने अर्थात् संवहन द्वारा, और वाष्पन द्वारा जो गुप्त ऊष्मा ले जाता है। इनमें से केवल विकिरण ही ऊर्जा को सीधे अंतरिक्ष तक पहुँचा सकता है।

ऊष्मा-क्षय की विधिकैसे कार्य करती हैऊर्जा कहाँ जाती है
विकिरणगर्म सतह अवरक्त विकिरण उत्सर्जित करती है (वह सूर्य से बहुत ठंडी है, इसलिए दृश्य प्रकाश नहीं, अवरक्त छोड़ती है)कुछ भाग हरितगृह गैसें अवशोषित कर लेती हैं; शेष अंतरिक्ष में निकल जाता है
चालनऊष्मा भूमि के सीधे संपर्क में आई वायु की पतली परत तक पहुँचती हैसबसे निचली वायु परत में
संवहनवही गर्म वायु फैलकर कम सघन होती है और ऊपर उठती है; उसका स्थान ठंडी वायु ले लेती हैक्षोभमंडल में ऊपर की ओर ले जाई जाती है
वाष्पनजल द्रव से वाष्प बनने के लिए गुप्त ऊष्मा लेता है और जिस सतह से उठा उसे ठंडा कर देता हैवाष्प में संचित; ऊपर जाकर बादल बनते समय मुक्त हो जाती है
यह क्षय क्यों सार्थक है — चार कारण:
  1. इससे पृथ्वी का ताप स्थिर रहता है। वर्ष भर में पृथ्वी को उतनी ही ऊर्जा खोनी पड़ती है जितनी वह सूर्य से पाती है। यदि वह कम खोती तो बिना किसी सीमा के गर्म होती चली जाती।
  2. हरितगृह प्रभाव इसी चरण पर काम करता है। हरितगृह गैसें आते हुए सूर्य-प्रकाश को नहीं रोकतीं; वे बाहर जाती अवरक्त विकिरण को धीमा करती हैं। वायुमंडल न होता तो "पृथ्वी इतनी ठंडी होती कि यहाँ पर जीवन संभव नहीं हो पाता"; और CO2 बहुत अधिक हो जाए तो यह क्षय आवश्यकता से अधिक धीमा पड़ जाता है और पृथ्वी गर्म होने लगती है।
  3. यही मौसम चलाता है। संवहन ऊष्मा को ऊपर ले जाता है — इसी से पवन और तूफ़ान बनते हैं। वाष्पन और संघनन जल तथा गुप्त ऊष्मा को पृथ्वी भर में घुमाते हैं — यही जल चक्र है।
  4. इससे दैनिक ताप-अंतर समझ में आता है। रात में कोई आती हुई विकिरण नहीं होती, परंतु सतह विकिरण करती रहती है — इसीलिए रातें ठंडी होती हैं, और इसीलिए स्वच्छ शुष्क रात बादल वाली रात से अधिक ठंडी होती है, क्योंकि बादल कुछ अवरक्त लौटा देते हैं।
रोज़मर्रा की जाँच: अध्याय का वह उदाहरण कि पक्के मकान में रात में गर्मी लगती है, इसी विचार का छोटा रूप है — कंक्रीट दिन में ऊष्मा संचित करता है और रात में पुनःविकिरण द्वारा उसे कमरे में छोड़ता है। गाढ़ी मिट्टी और लकड़ी की दीवारें कम पुनःविकिरण करती हैं, इसलिए ठंडी रहती हैं।
प्र12.
यदि पृथ्वी गोलाकार न होकर एक तश्तरी के समान चपटी होती तब सौर विकिरण और ताप के पैटर्न किस प्रकार भिन्न होते?
उत्तर

सूर्य के सामने रखी चपटी तश्तरी पर प्रत्येक बिंदु को किरणें एक ही कोण पर मिलतीं, इसलिए सूर्यातप सर्वत्र समान होता। भूमध्य रेखा और ध्रुवों के बीच कोई ताप-अंतर न होता — और इसलिए न वायुदाब पट्टियाँ बनतीं, न ग्रहीय पवन, न ऊष्मा ढोने वाली महासागरीय धाराएँ।

गोला — वही किरण-पुंज, भिन्न क्षेत्रफल भूमध्य रेखा: गर्म उच्च अक्षांश: ठंडा भूमध्य रेखा–ध्रुव का बड़ा अंतर चपटी तश्तरी — सर्वत्र वही कोण प्रत्येक पट्टी को समान ऊर्जा अंतर नहीं → चालक बल नहीं
गोले पर उतनी ही चौड़ाई का किरण-पुंज उच्च अक्षांश पर अधिक सतह पर फैल जाता है। सूर्य के सामने रखी चपटी तश्तरी पर ऐसा फैलाव होता ही नहीं।
गोले पर: किसी स्थान पर तीव्रता, I = I0 cos θ
  भूमध्य रेखा पर θ = 0° → I = I0 = 1 kW m–2
  θ = 60° → I = 0.5 × 1 kW m–2 = 0.5 kW m–2
  ध्रुव पर θ = 90° → I ≈ 0

सूर्य के सामने चपटी तश्तरी पर: सर्वत्र θ = 0° → सर्वत्र I = I0समान ऊष्मण
समान ऊष्मण से क्या-क्या होता:
  • कोई वायुदाब पट्टी नहीं। भूमध्यरेखीय निम्न, 30° की उपोष्ण उच्च, 60° की उपध्रुवीय निम्न और ध्रुवीय उच्च — ये सब इसलिए बनती हैं कि ऊष्मण अक्षांश के साथ भिन्न होता है। समान ऊष्मण का अर्थ है समान दाब।
  • कोई ग्रहीय पवन नहीं। पवन उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती वायु है। दाब में अंतर ही न हो तो बड़े स्तर की पवन बनेगी ही नहीं।
  • ऊष्मा ढोने वाली महासागरीय धाराएँ नहीं। सतही धाराएँ ग्रहीय पवनों के घर्षण से खिंचती हैं और ताप तथा सघनता के अंतर से चलती हैं। दोनों चालक बल समाप्त हो जाते हैं।
  • भूमध्य रेखा से ध्रुव तक की जलवायु पट्टियाँ नहीं। न उष्णकटिबंध, न शीतोष्ण कटिबंध, न ध्रुवीय प्रदेश — प्रकाशित सतह पर सर्वत्र एक ही जलवायु।
  • दूसरा पृष्ठ बिलकुल निर्जीव। सूर्य से विमुख पृष्ठ को कुछ भी नहीं मिलता और वह सदा के लिए भीषण ठंडा रहता — वास्तविक पृथ्वी के किसी भी अंतर से कहीं तीखा विरोध।
प्रश्न का मर्म: पृथ्वी की आकृति — उसकी धुरी के झुकाव के साथ — ही ऊष्मण को असमान बनाती है, और पवनों, धाराओं तथा मानसून को चलाने वाली वही असमानता है, ऊष्मा की मात्रा नहीं। पूर्णतः और समान रूप से गर्म किया गया ग्रह एक निश्चल ग्रह होता।
प्र13.
कल्पना कीजिए कि पृथ्वी पर वायुमंडलीय ताप बढ़ जाता है। यह किस प्रकार हिममंडल, जलमंडल और जैवमंडल को प्रभावित करेगा?
उत्तर

यह वृद्धि तीनों मंडलों से क्रमशः होकर गुज़रती है: बर्फ पिघलती है, पिघला जल समुद्र का स्तर बढ़ाता है और जल चक्र तेज़ करता है, और बदला हुआ जल तथा ताप हर जीव-समुदाय को विक्षोभित कर देता है।

मंडलक्या होता हैक्यों
हिममंडलहिमानियाँ, हिमावरण और ध्रुवीय हिम तेज़ी से पिघलते हैं; हिम चादरें सिकुड़ती हैं0 °C पर पहले से खड़ी बर्फ को अधिक ऊष्मा मिलती है, इसलिए अधिक भाग द्रव में बदलता है। चमकीली बर्फ हटने से एल्बिडो घटता है, और अधिक विकिरण अवशोषित होता है — पिघलन स्वयं को तेज़ कर लेती है
जलमंडलपहले नदियाँ पिघले जल से भरती हैं; दीर्घकाल में समुद्र का स्तर बढ़ता है; वाष्पन बढ़ता है; समुद्र गर्म होकर अधिक CO2 घोलता हैस्थल पर बर्फ के रूप में संचित जल महासागर में लौटकर उसका आयतन बढ़ा देता है। गर्म सतह से वाष्पन तेज़ होता है, इसलिए जल चक्र और उग्र चलता है — "कुछ क्षेत्रों में अधिक वर्षा और कुछ अन्य क्षेत्रों में सूखा"
जैवमंडलपर्यावास नष्ट होते हैं (मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियाँ, ध्रुवीय जातियाँ), फसल की उपज और वर्षा पैटर्न बदलते हैं, महासागरीय अम्लीकरण प्लवक और प्रवाल के लिए संकट बनता है, जातियाँ स्थान बदलती हैं या लुप्त होती हैंप्रत्येक जीव ताप, जल-आपूर्ति और ऋतु की एक विशेष परास के अनुकूल ढला है। इन्हें उसकी अनुकूलन-क्षमता से तेज़ बदल दीजिए तो वह समाप्त हो जाता है — "पर्यावास हानि"
वायुमंडलीय ताप में वृद्धि
हिममंडल: हिमानियों और ध्रुवीय हिम का त्वरित पिघलना
जलमंडल: अभी निचले क्षेत्रों में बाढ़, आगे समुद्र स्तर में वृद्धि, तेज़ जल चक्र
जैवमंडल: पर्यावास हानि, विक्षोभित पारितंत्र, कृषि और मत्स्य संसाधनों पर खतरा
विशेष रूप से भारत के लिए: हिमालयी हिमानियाँ गंगा–ब्रह्मपुत्र तंत्र को जल देती हैं, इसलिए उनके पीछे हटने से नदियों का प्रवाह पहले बढ़ेगा और बाद में घटेगा। मुंबई और चेन्नई जैसे तटीय शहरों पर बढ़ते समुद्र का संकट है। और गर्म अरब सागर मानसून को अधिक प्रचंड तथा कम विश्वसनीय बना देता है — जो कृषि पर सीधा खतरा है।
प्र14.
व्याख्या कीजिए कि किस प्रकार पृथ्वी का वायुमंडल, इसका ताप उपयुक्त बनाए रखने के लिए सहायता करता है जो कि पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक है।
उत्तर

वायुमंडल दोहरे छननी की भाँति कार्य करता है। आते समय वह उस विकिरण को हटा देता है जो जीवन को हानि पहुँचाती, और जाते समय वह उस ऊष्मा का कुछ भाग रोक लेता है जो अन्यथा निकल जाती। पृथ्वी का ताप जीवन के योग्य संकरी परास में बना रहे, इसके लिए दोनों आवश्यक हैं।

भूमिकावायुमंडल क्या करता हैताप पर प्रभाव
1. आते विकिरण का कुछ भाग अवशोषित करनासमतापमंडल की ओजोन परत हानिकारक लघु-तरंगदैर्घ्य UV अवशोषित कर लेती है; बादल, धूल और गैसें कुछ सूर्य-प्रकाश परावर्तित तथा अवशोषित कर लेती हैंअत्यधिक तापन रुकता है और जीवित ऊतक UV से सुरक्षित रहता है
2. बाहर जाती ऊष्मा को रोकनासतह सूर्य का प्रकाश अवशोषित कर उसे अवरक्त रूप में पुनः विकिरित करती है; हरितगृह गैसें (CO2, CH4, जलवाष्प) उसे अवशोषित कर कुछ भाग नीचे लौटा देती हैंसतह पर्याप्त गर्म बनी रहती है — "यदि वायुमंडल नहीं होता तो पृथ्वी इतनी ठंडी होती कि यहाँ पर जीवन संभव नहीं हो पाता"
3. ऊष्मा का वितरणपवन और संवहन गर्म क्षेत्रों से ठंडे क्षेत्रों तक ऊष्मा ले जाते हैं; जलवाष्प गुप्त ऊष्मा ढोकर कहीं और छोड़ती हैदिन-रात तथा भूमध्य रेखा–ध्रुव की चरम सीमाएँ नरम पड़ जाती हैं
4. रात में कंबल की भाँति कार्य करनासूर्यास्त के बाद अवरक्त विकिरण के निकलने की गति धीमी कर देता हैसतह हर रात जमने से बच जाती है
सारा महत्त्व संतुलन का है। हरितगृह प्रभाव बहुत कम हो तो पृथ्वी जम जाए; बहुत अधिक हो तो तप जाए। अध्याय दोनों छोर देता है:
  • बहुत कम: "यदि वायुमंडल नहीं होता तो पृथ्वी इतनी ठंडी होती कि यहाँ पर जीवन संभव नहीं हो पाता।"
  • बहुत अधिक: "मानवीय गतिविधियों से निकलने वाली अतिरिक्त CO2 हरितगृह प्रभाव को बढ़ाती है जिससे वैश्विक ताप में वृद्धि होती है। यदि इसे अनियंत्रित छोड़ दिया जाए तो पृथ्वी पर जीवन दुष्कर हो सकता है।"
अध्याय का प्राकृतिक उदाहरण शुक्र ग्रह है — बुध सूर्य के अधिक निकट है फिर भी शुक्र उससे अधिक गर्म है, क्योंकि शुक्र पर घना वायुमंडल है जिसमें "अनियंत्रित हरित गृह प्रभाव" चल रहा है। दो ग्रह, एक ही सूर्य; अंतर वायुमंडल ने डाला।
संघटन याद रखिए: नाइट्रोजन 78%, ऑक्सीजन 21%, तथा आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प अल्प मात्रा में। हरितगृह का काम यही अल्प मात्रा वाली CO2 और जलवाष्प करती हैं — प्रचुर N2 और O2 नहीं।
प्र15.
पृथ्वी के विभिन्न मंडलों के मध्य अंतःसंबंधों का वर्णन कीजिए। उदाहरण सहित समझाइए कि ये मंडल किस प्रकार एक सूक्ष्म संतुलन में कार्य करते हैं।
उत्तर

पाँचों मंडल इसलिए जुड़े हैं कि वे एक ही ऊर्जा और एक ही द्रव्य साझा करते हैं। ऊर्जा सूर्य से आकर इन सबसे होकर बहती है; द्रव्य इनके बीच बार-बार चक्रित होता है। इनमें से किसी एक से होकर गुज़रे बिना न ऊर्जा चल सकती है, न द्रव्य — और गुज़रते समय वह शेष को बदल देता है।

मंडलक्या हैअध्याय से उदाहरण
भूमंडलठोस चट्टानें, मृदा, भू-आकृतियाँ और पृथ्वी का आंतरिक भागदक्कन का पठार, थार मरुस्थल
जलमंडलद्रव जल — महासागर, नदियाँ, झीलें, भूजलगंगा एवं ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र
हिममंडलजल का ठोस रूप — हिम और बर्फहिमालयी हिमानियाँ, लद्दाख में जमी बर्फ, ध्रुवीय हिम छत्रक
वायुमंडलगुरुत्वाकर्षण से पृथ्वी के चारों ओर बँधी वायुपहाड़ों और वनों में अधिक स्वच्छ वायु
जैवमंडलसभी सजीव और उनके पर्यावासमैंग्रोव, वन, खेत, महासागरीय प्लवक, प्रवाल भित्तियाँ

ये किस प्रकार जुड़े हैं:

  • सौर ऊष्मण स्थल, समुद्र और हिम को असमान रूप से गर्म करता है — यही अकेला तथ्य भूमंडल, जलमंडल, हिममंडल और वायुमंडल को जोड़ देता है।
  • जल चक्र जल को महासागर से वायु, वायु से वर्षा, वर्षा से मृदा, मृदा से नदी और फिर वापस ले जाता है — क्रम से हर मंडल से होकर।
  • जैव-भू रासायनिक चक्र कार्बन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन को चट्टान, जल, वायु और सजीवों के बीच घुमाते हैं।
  • पवन और महासागरीय धाराएँ ऊष्मा और नमी को एक क्षेत्र से दूसरे तक पहुँचाती हैं।

सूक्ष्म संतुलन के तीन उदाहरण:

1. क्रियाकलाप 13.1 की पर्वतीय घाटी
कम हिमपात (हिममंडल) → कम पिघला जल → झील का स्तर गिरना (जलमंडल)
→ घास की खराब वृद्धि (जैवमंडल) → भेड़ों के लिए कम चारा

2. अरब सागर और मानसून
गर्म समुद्र (जलमंडल) → अधिक वाष्पीकरण → अनिश्चित मानसून (वायुमंडल)
→ एक क्षेत्र में बाढ़, दूसरे में सूखा → फसल हानि (जैवमंडल)

3. ईंधन जलाने से अतिरिक्त CO2
अधिक CO2 (वायुमंडल) → प्रबल हरितगृह प्रभाव → हिमानियों का पिघलना (हिममंडल)
→ समुद्र स्तर बढ़ना (जलमंडल) → तटीय पर्यावास की हानि (जैवमंडल)
→ जहाँ वन कटे वहाँ मृदा अपरदन (भूमंडल)
"सूक्ष्म" क्यों: यह संतुलन किसी कठोर ढाँचे से नहीं टिका है। यह प्रवाहों का एक समुच्चय है — ऊर्जा और द्रव्य के प्रवाह — जो संयोगवश भीतर और बाहर लगभग बराबर हैं। इनमें से किसी एक प्रवाह पर ज़ोर से धक्का दीजिए, जैसा मानवीय गतिविधियाँ आज कार्बन के प्रवाह पर दे रही हैं, और पूरा समुच्चय एक नई अवस्था में जा बैठेगा — जो जीवन के लिए कहीं कम सुखद हो सकती है। यही अध्याय की अंतिम सीख है और मिशन LiFE का आधार भी — "असतत उपभोग इस प्राकृतिक संतुलन में व्यवधान उत्पन्न करता है।"
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