कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 13 परियोजना कार्य के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
पृथ्वी के आकार के सामान दो काल्पनिक ग्रहों पर विचार कीजिए जिनका अपना वायुमंडल है। मान लीजिए कि एक ग्रह पूर्णरूपेण महासागरों से आच्छादित है और दूसरा पूर्णरूपेण स्थल से। यह जानते हुए कि सूर्य ध्रुवों की तुलना में भूमध्यरेखा को अधिक गर्म करता है, बताइए कि पृथ्वी पर उपस्थित स्थल और समुद्र के संयोजन की तुलना में इन ग्रहों पर पवनों के पैटर्न किस प्रकार भिन्न होंगे?
उत्तर

दोनों ग्रहों पर भूमध्य रेखा से ध्रुवों तक का महान परिसंचरण बना रहेगा, क्योंकि वह अक्षांश और ग्रह के घूर्णन से बनता है। जो समाप्त हो जाएगा वह है स्थल और समुद्र के साथ-साथ होने पर निर्भर हर परिघटना — समुद्री समीर, स्थल समीर और सबसे बढ़कर मानसून।

पूर्णतः महासागरीय ग्रहपूर्णतः स्थलीय ग्रहवास्तविक पृथ्वी
वायुदाब पट्टियाँ और ग्रहीय पवनउपस्थित — ग्रह के चारों ओर सुचारु, अखंडित पट्टियाँउपस्थित — परंतु कहीं अधिक प्रचंड, क्योंकि स्थल शीघ्र गर्म और ठंडा होता हैउपस्थित, परंतु महाद्वीपों से टूटी-फूटी
दैनिक और ऋतु-आधारित ताप-परिवर्तनबहुत कम — जल की ऊष्मा-धारिता विशाल है और वह ऊष्मा संचित रखता हैबहुत अधिक — स्थल की ऊष्मा-धारिता कम है, इसलिए वह शीघ्र गर्म और ठंडा होता हैबीच का — तट मंद, भीतरी भाग चरम
स्थल और समुद्री समीरनहीं — कोई तट है ही नहींनहीं — कोई समुद्र है ही नहींसभी तटों पर उपस्थित
मानसूननहींनहींउपस्थित — ग्रीष्म में स्थल के समुद्र से तेज़ गर्म होने से चलता है
जल चक्र और वर्षासर्वत्र प्रचुर वाष्पन और वर्षावाष्पन का स्रोत लगभग शून्य — एक शुष्क, धूल भरा मरुस्थली ग्रहअसमान; तट आर्द्र, भीतरी भाग शुष्क
महासागरीय धाराएँप्रबल और अखंडित — रोकने या मोड़ने वाला कोई महाद्वीप नहींबिलकुल नहींघूर्णन से मुड़कर भंवर बनतीं और महाद्वीपों से अवरुद्ध
तर्क:
  • दोनों ग्रहों पर क्या बचेगा। भूमध्य रेखा और ध्रुवों के बीच असमान ऊष्मण अब भी भूमध्यरेखीय निम्न और उपोष्ण उच्च दाब पट्टियाँ बनाएगा, और ग्रह का घूर्णन अब भी पवनों को विक्षेपित करेगा — उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर, दक्षिणी में बाईं ओर। इसलिए ग्रहीय पवन दोनों पर होंगी।
  • क्या लुप्त हो जाएगा। अध्याय कहता है कि स्थानीय पवन तथा स्थल–समुद्री समीर "भूमि और जल का असमान ऊष्मण" से उत्पन्न होते हैं। दोनों में से एक हटा दीजिए तो क्रियाविधि के पास काम करने को कुछ बचता ही नहीं। भारत का दक्षिण-पश्चिम मानसून एक विशाल ऋतुगत समुद्री समीर ही है — इसलिए पूर्णतः महासागरीय या पूर्णतः स्थलीय ग्रह पर मानसून होगा ही नहीं।
  • स्थलीय ग्रह अधिक तूफ़ानी क्यों। स्थल की ऊष्मा-धारिता जल से बहुत कम है। वह दिन में तीव्रता से गर्म और रात में तेज़ी से ठंडा होता है, इसलिए दाब-अंतर शीघ्र बनते हैं और पवन प्रबल तथा झोंकेदार होती हैं — वर्षा के तूफ़ान नहीं, धूल-भरी आँधियाँ, क्योंकि वाष्पित होने को जल ही नहीं है।
  • महासागरीय ग्रह शांत पर अधिक आर्द्र क्यों। जल ताप-परिवर्तन का प्रतिरोध करता है, इसलिए दाब-प्रवणता धीरे बनती है और पवन अधिक स्थिर रहती है। किंतु वाष्पन सर्वत्र होता है, इसलिए बादल और वर्षा प्रचुर होते हैं और धाराएँ पूरे ग्रह के चारों ओर अखंडित बहती हैं।
लिखने योग्य नमूना निष्कर्ष: "किसी भी घूर्णन करते और गर्म होते ग्रह पर अक्षांश और घूर्णन ग्रहीय पवन-पट्टियाँ बना देते हैं। स्थल और समुद्र का विरोध प्रादेशिक और स्थानीय पवनें बनाता है। पृथ्वी पर दोनों हैं, इसीलिए तीनों में से उसकी पवन-प्रणाली सबसे विविध है।"
प्र2.
कोई भी ऐसा एक भोजन चुनिए जो आपने कुछ समय पूर्व ही खाया हो (ये कुछ भी हो सकता है, उदाहरण के लिए, रोटी और दाल, चावल और सांभर, इडली और चटनी इत्यादि)। इस भोजन के प्रत्येक महत्त्वपूर्ण घटक हेतु निम्नलिखित को ज्ञात करके व्याख्या कीजिए — (i) उसमें उपस्थित कार्बन मूल रूप से प्रकाश संश्लेषण द्वारा वायु की कार्बन डाइऑक्साइड में कैसे आया, (ii) वायुमंडल से नाइट्रोजन मृदा में कैसे आई (उदाहरण के लिए, जीवाणु द्वारा अथवा हाबर–बॉश प्रक्रिया द्वारा और उर्वरकों द्वारा) और फिर पुन: पादपों में कैसे पहुँच गई। साथ ही, अन्य मानवीय गतिविधियों की सूची बनाइए जो भोजन के उत्पादन या पकाने में सम्मिलित होती हैं और जो वातावरण में अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड अथवा नाइट्रोजन को बढ़ाती हैं।
उत्तर

विधि: अपना भोजन चुनिए, उसके मुख्य घटक सूचीबद्ध कीजिए, और प्रत्येक के लिए दो पथ खोजिए — कार्बन का पथ (वायु → पत्ती → आपकी थाली) और नाइट्रोजन का पथ (वायु → मृदा → जड़ → प्रोटीन → आपकी थाली)। फिर इस पूरी यात्रा में जला ईंधन और प्रयुक्त उर्वरक सूचीबद्ध कीजिए।

नमूना उत्तर — रोटी और दाल का भोजन

घटक(i) इसका कार्बन कहाँ से आया(ii) इसकी नाइट्रोजन कहाँ से आई
रोटी (गेहूँ)गेहूँ की पत्तियों ने रंध्रों से वायु की CO2 ली और सूर्य के प्रकाश तथा जल की सहायता से प्रकाश संश्लेषण द्वारा ग्लूकोस बनाया। यह ग्लूकोस दाने में मंड (स्टार्च) के रूप में संचित हुआ। पीसने पर आटा बना; प्रत्येक रोटी का कार्बन वायुमंडलीय कार्बन ही है।गेहूँ फलीदार नहीं है, इसलिए किसान यूरिया डालता है। वह यूरिया वायुमंडलीय N2 से हाबर–बॉश प्रक्रिया द्वारा बना था। मृदा में वह अमोनिया बनती है, नाइट्रीकरण जीवाणु उसे नाइट्रेट में बदलते हैं, और गेहूँ की जड़ उस नाइट्रेट का स्वांगीकरण कर दाने के ग्लूटेन प्रोटीन बनाती है।
दाल (अरहर / मूँग — दलहन)वही प्रकाश संश्लेषी मार्ग — वायु की CO2 बीज का कार्बोहाइड्रेट बन गई।दलहन फलीदार है। इसकी जड़ ग्रंथियों में रहने वाला राइजोबियम वायु की N2 को सीधे अमोनिया में स्थिर कर देता है, जिससे पादप वह प्रोटीन बनाता है जो दाल को प्रोटीनयुक्त भोजन बनाती है। उर्वरक की आवश्यकता कम या नहीं पड़ती।
तेल / घीसरसों या मूँगफली के पादप (या गाय द्वारा खाई घास) द्वारा स्थिर किया गया कार्बन, वसा के रूप में संचित।वसा में नाइट्रोजन लगभग नहीं होती; फसल की नाइट्रोजन ऊपर बताए अनुसार मृदा के नाइट्रेट से आई।
नमक और मसालेनमक खनिज है, जैविक नहीं — इसका कोई कार्बन पथ नहीं। मसाले पादप-मार्ग का अनुसरण करते हैं।

इस भोजन से जुड़ी वे मानवीय गतिविधियाँ जो वातावरण में अतिरिक्त CO2 या नाइट्रोजन बढ़ाती हैं:

  • उर्वरक बनाना। हाबर–बॉश प्रक्रिया "अत्यधिक ऊर्जा-खपत" वाली है (वैश्विक ऊर्जा का लगभग 1 – 2 प्रतिशत) और वह ऊर्जा अधिकतर जीवाश्म ईंधन से आती है — इसलिए यूरिया खेत तक पहुँचने से पहले ही CO2 की लागत ढो लाता है।
  • जुताई, बुआई और कटाई। डीज़ल से चलने वाले ट्रैक्टर और थ्रेशर ईंधन जलाते हैं।
  • सिंचाई। विद्युत या डीज़ल पंप, और भारत की विद्युत का बड़ा भाग अब भी जीवाश्म ईंधनों से आता है।
  • उर्वरक का बहाव। अतिरिक्त नाइट्रेट नदियों और झीलों में पहुँचकर सुपोषण उत्पन्न करता है; मृदा की कुछ नाइट्रोजन नाइट्रोजन ऑक्साइडों के रूप में वायु में निकल जाती है।
  • परिवहन और पिसाई। मंडी तक ट्रक, फिर चक्की और दुकान; चक्की की मोटर भी विद्युत खपाती है।
  • पकाना। LPG या लकड़ी — दोनों CO2 छोड़ते हैं। प्रेशर कुकर ईंधन घटाता है और इस प्रकार उत्सर्जन भी घटाता है।
  • पैकिंग और अपशिष्ट। प्लास्टिक की थैलियाँ पेट्रोलियम से बनती हैं; कूड़े में सड़ता भोजन मीथेन छोड़ता है।
अंत में लिखने योग्य निष्कर्ष: "मेरी रोटी का कार्बन कुछ महीने पहले वायु में था; उसे पकाने के लिए छोड़ा गया कार्बन लाखों वर्षों से धरती में दबा था।" पहला द्रुत चक्र का स्वयं को संतुलित करना है; दूसरा एक एकतरफ़ा वृद्धि है। यही अंतर पूरी जलवायु समस्या को एक वाक्य में समेट देता है।
प्र3.
भारतीय मौसम विभाग (IMD, https://mausam.imd. gov.in/) या समाचार पत्रों के आँकड़ों का उपयोग करके अपने शहर या जिले के लिए दो दशकों जैसे 1980 के दशक और 2020 के दशक में 5 वर्षों के दौरान हुई मानसूनी वर्षा (जून–सितंबर अथवा स्थानीय ऋतु) का औसत ज्ञात कीजिए। अवलोकन कीजिए कि भारी वर्षा (>50 mm) वाले दिनों की संख्या समय के साथ बढ़ रही है, घट रही है या स्थिर है। इसे अरब सागर के बढ़ते तापमान तथा भूमि के उपयोग में हुए परिवर्तनों (वनों का खेतों और शहरों में बदलना) से कैसे जोड़ा जा सकता है, जैसा कि अध्याय में चर्चा की गई है?
उत्तर
संस्करणों में अंतर: यह परियोजना अंग्रेज़ी संस्करण Exploration (पृष्ठ 268) में अधूरी छपी है — उसकी आरंभिक तीन पंक्तियाँ कट गई हैं और वाक्य शब्द के बीच से आरंभ होता है। पूरा प्रश्न केवल इसी हिंदी संस्करण में उपलब्ध है, जिसमें IMD का पता भी दिया गया है।

विधि — इस परियोजना को सही ढंग से कैसे करें:

  1. अपना केंद्र निश्चित कीजिए। अपने शहर या जिले का निकटतम IMD केंद्र चुनिए, ताकि तुलना एक ही स्थान की हो।
  2. अपनी ऋतु निश्चित कीजिए। भारत के अधिकांश भाग के लिए जून – सितंबर लीजिए। तमिलनाडु के लिए उत्तर-पूर्वी मानसून, अर्थात् अक्टूबर – दिसंबर लीजिए।
  3. पाँच-पाँच वर्षों के दो खंड एकत्र कीजिए, जैसे 1981 – 1985 और 2019 – 2023 — https://mausam.imd.gov.in/ से अथवा पुस्तकालय में पुराने समाचार पत्रों से।
  4. दो अलग-अलग बातें लिखिए। (क) ऋतु की कुल वर्षा mm में। (ख) उन दिनों की संख्या जिनमें वर्षा 50 mm से अधिक हुई। ये दोनों विपरीत दिशाओं में जा सकते हैं, और यही इस परियोजना का मर्म है।
  5. प्रत्येक खंड का औसत निकालिए और दोनों को आमने-सामने रखिए।
राशि1981 – 1985 का औसत2019 – 2023 का औसतपरिवर्तन
कुल मानसूनी वर्षा (mm)(भरिए)(भरिए)(+ / – …%)
> 50 mm वर्षा वाले दिनों की संख्या(भरिए)(भरिए)(+ / – … दिन)
ऋतु में शुष्क दिनों की संख्या(भरिए)(भरिए)(+ / – … दिन)
अपने परिणाम को अध्याय से कैसे जोड़ें:
  • यदि भारी वर्षा वाले दिन बढ़े हैं जबकि ऋतु की कुल वर्षा में विशेष अंतर नहीं आया, तो यही वह पैटर्न है जिसकी अध्याय भविष्यवाणी करता है: गर्म अरब सागर से "समुद्र से अधिक वाष्पीकरण होता है", गर्म वायु अधिक नमी धारण करती है, और वही जल कम परंतु अधिक प्रचंड झड़ियों में आता है — वर्षा के दिन कम, प्रत्येक दिन अधिक भारी।
  • यदि आपके शहर में बाढ़ वर्षा की तुलना में अधिक तेज़ी से बढ़ी है, तो भूमि-उपयोग देखिए। वन और खेत वर्षा को रिसने देते हैं; कंक्रीट और डामर नहीं। "आकस्मिक तीव्र वर्षा से सतही जल का अपवाह बढ़ जाता है … और जल का कम रिसाव भूजल के पुनर्भरण को कम कर देता है।"
  • यदि आपका शहर पहले से गर्म भी हुआ है, तो उसमें शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव जोड़िए — कंक्रीट और डामर से गर्म हुए शहर वायु के ऊपर उठने को बल दे सकते हैं, जिससे स्थानीय मूसलाधार वर्षा भड़कती है।
  • अपनी सीमाओं के विषय में ईमानदार रहिए। पाँच वर्ष एक छोटा प्रतिदर्श है और मौसम स्वभाव से परिवर्तनशील है। स्पष्ट लिखिए कि आपका परिणाम एक प्रवृत्ति का संकेत है, प्रमाण नहीं। वैज्ञानिक अनिश्चितता बताता है; वह भी उत्तर का ही भाग है।
प्रस्तुति का सुझाव: दोनों खंडों को दंड आलेख के रूप में बनाइए — x-अक्ष पर वर्ष, y-अक्ष पर mm में वर्षा — और >50 mm वाले दिनों को दूसरे रंग से दर्शाइए। जो प्रवृत्ति सारणी में कठिनाई से दिखती है, वह आलेख में उभर आती है।
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