कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 13 चिंतन कीजिए के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
अरब सागर के जल के गर्म होने से भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर

गर्म समुद्री जल से वाष्पीकरण तेज़ी से होता है, इसलिए मानसूनी पवनों में अधिक जलवाष्प भर जाती है — मानसून प्रबल तो होता है, परंतु कहीं अधिक अनिश्चित हो जाता है।

अरब सागर की सतह गर्म → अधिक वाष्पीकरण
अधिक वाष्पीकरण → दक्षिण-पश्चिम मानसून अधिक जलवाष्प ले जाता है
अधिक जलवाष्प + वायु का ऊपर उठना → कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक तीव्र वर्षा
वही कुल नमी, असमान रूप से बँटी → अन्य क्षेत्रों में सूखा
यह क्यों होता है: समुद्र की सतह से वाष्पीकरण की दर ताप बढ़ने पर तेज़ी से बढ़ती है, और गर्म वायु संघनित होने से पहले अधिक जलवाष्प धारण भी कर सकती है। इसलिए गर्म अरब सागर मानसूनी पवनों को अतिरिक्त नमी से भर देता है। जब यह आर्द्र वायु ऊपर उठने को विवश होती है — पश्चिमी घाट पर या किसी निम्न दाब तंत्र में — तो वह ठंडी होकर संघनित होती है और सारी नमी थोड़े समय में तीव्र झड़ी के रूप में गिरा देती है, न कि धीमी-स्थिर वर्षा के रूप में। अध्याय यही कहता है — दक्षिण-पश्चिम मानसून में उतार-चढ़ाव से वर्षा में असमानता होती है और भारत के कुछ क्षेत्रों में बाढ़ आ सकती है जबकि अन्य क्षेत्र सूखाग्रस्त रह सकते हैं
ध्यान दीजिए: यह अध्याय की मूल अवधारणा का अच्छा उदाहरण है। परिवर्तन जलमंडल (समुद्र का ताप) में आरंभ होता है, वायुमंडल (मानसूनी पवन) से होकर गुज़रता है और जैवमंडल (फसल और किसान) पर आकर रुकता है। कोई भी मंडल अकेले विक्षोभित नहीं होता।
प्र2.
यदि किसी बड़े वन क्षेत्र को हटा दिया जाए तो उस क्षेत्र की नदी के प्रवाह पर इसका क्या प्रभाव हो सकता है?
उत्तर

नदी का प्रवाह अस्थिर हो जाता है — वर्षा के समय भीषण बाढ़ और वर्षा के बीच में जल का घट जाना या सूख जाना — और नदी बहुत अधिक गाद ढोने लगती है।

यह क्यों होता है: ढलान पर बिछा वन एक स्पंज की तरह कार्य करता है। वन हटते ही तीन बातें बदल जाती हैं।
  • अंतःस्यंदन (रिसाव) घट जाता है। पत्तियों की परत और जड़ों के मार्ग वर्षा जल को मृदा में उतरने देते हैं। नंगी भूमि पर वही जल सतह से बहकर निकल जाता है। अध्याय इसे "सतही जल का अपवाह बढ़ जाना" और "जल का कम रिसाव" कहता है।
  • भूजल का पुनर्भरण घट जाता है। जो जल पहले धीरे-धीरे रिसकर पूरे शुष्क महीनों तक नदी को पोषित करता था, अब संचित ही नहीं होता। इसलिए नदी का न्यूनतम प्रवाह गिर जाता है।
  • मृदा अपरदन बढ़ जाता है। "मृदा को बाँधकर रखने वाली वृक्षों की जड़ों के अभाव में मृदा अपरदन बढ़ सकता है।" यही मृदा नदी की तली में गाद बनकर बैठती है, तली ऊँची हो जाती है और बाढ़ और भी विकराल हो जाती है।
वर्षा की मात्रा पर भी प्रभाव पड़ता है — "वनों की कटाई से प्रकाश संश्लेषण में कमी आती है और वाष्पोत्सर्जन घट जाता है जिससे स्थानीय वर्षा में कमी हो सकती है।"
संकेत: इस पैटर्न को "ऊँचा शिखर, नीचा आधार" कहकर याद रखिए। उतनी ही वार्षिक वर्षा नदी को स्थिर आपूर्ति के बजाय तीखी बाढ़ों के रूप में मिलती है।
प्र3.
यदि हिमानियाँ (glaciers) और ध्रुवीय बर्फ तेजी से पिघलती रही तो भारत के तटीय शहरों पर इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है?
उत्तर

समुद्र का जल स्तर बढ़ेगा और मुंबई तथा चेन्नई जैसे निचले तटीय शहरों पर बाढ़, भूजल में खारे जल का प्रवेश और भूमि के डूबने का संकट आएगा।

वायुमंडलीय ताप में वृद्धि → हिमानियों और ध्रुवीय हिम का तेज़ी से पिघलना (हिममंडल)
पिघला जल महासागर में जाता है → महासागरीय जल का आयतन बढ़ता है
आयतन बढ़ने से → समुद्र का जल स्तर बढ़ता है
ऊँचा जल स्तर + तूफ़ानी लहरें → निचले तटीय क्षेत्रों में बाढ़
यह क्यों होता है: स्थल पर जमी बर्फ वही जल है जो महासागर से निकालकर रोक लिया गया था। पिघलने पर वह जल लौट आता है, महासागर का आयतन बढ़ जाता है और समुद्र तट के विरुद्ध ऊँचा उठ जाता है। भारत इस दृष्टि से विशेष रूप से संवेदनशील है क्योंकि इसकी बड़ी जनसंख्या, बंदरगाह और उद्योग समुद्र तल से कुछ ही मीटर ऊँचाई पर बसे हैं। अध्याय कहता है कि इससे "समुद्र का जल स्तर बढ़ने से तटीय शहरों को खतरा उत्पन्न हो सकता है", और आगे जोड़ता है कि "यह जैवमंडल में पारितंत्रों को पर्यावास हानि के कारण विक्षोभित कर सकता है" — तट के लिए इसका अर्थ है मैंग्रोव और मत्स्य संसाधनों की हानि।
क्या आप जानते हैं? महासागर में पहले से तैर रही समुद्री बर्फ के पिघलने से जल स्तर अधिक नहीं बढ़ता, क्योंकि तैरती बर्फ पहले ही अपने भार के बराबर जल हटा चुकी होती है। जल स्तर बढ़ाने वाली बर्फ वह है जो स्थल पर जमी है — हिमालयी हिमानियाँ तथा ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की हिम चादरें।
प्र4.
वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने से महासागरीय प्लवक (plankton) पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर

अतिरिक्त CO2 समुद्री जल में घुलकर उसे अधिक अम्लीय बना देती है, जिससे प्लवक को हानि होती है — विशेषकर उन सूक्ष्म जीवों को जो कैल्सियम कार्बोनेट के खोल बनाते हैं।

वायु में अधिक CO2 → महासागर में अधिक CO2 घुलती है
घुली CO2 + जल → कार्बोनिक अम्ल → अधिक H+ आयन
अधिक H+ → समुद्री जल अधिक अम्लीय
अम्लीय जल कार्बोनेट खोलों पर आक्रमण करता है → खोल बनाने वाले प्लवक कमज़ोर
यह इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है: अध्याय कहता है — "वायुमंडलीय CO2 की अधिकता से महासागरों में उनका अवशोषण बढ़ने से समुद्री जल अधिक अम्लीय हो जाता है। इस कारण सूक्ष्म प्लवक और प्रवाल भित्तियों को खतरा हो सकता है, जो समुद्री पारितंत्र को बाधित कर सकता है।" प्लवक महासागर का कोई छोटा-मोटा अंग नहीं है — पादप प्लवक विश्व के प्रकाश संश्लेषण का एक बहुत बड़ा भाग करते हैं, वे प्रत्येक समुद्री आहार शृंखला का आधार हैं, और मरने पर उनके खोल कार्बन को समुद्र तल तक ले जाते हैं। प्लवक को हानि पहुँचने का अर्थ है — मत्स्य संसाधन, ऑक्सीजन की आपूर्ति और महासागर की कार्बन संचय क्षमता, तीनों पर एक साथ चोट।
दोहरी मार: अध्याय यह भी कहता है कि "गर्म महासागरीय जल, महासागर की CO2 के अवशोषण की क्षमता को घटा" देता है। अर्थात् समुद्र जितना गर्म होगा, उतनी ही कम CO2 लेगा — और उतनी ही अधिक CO2 वायु में बची रहकर उसे और गर्म करेगी। यह धनात्मक पुनर्भरण है: परिवर्तन स्वयं को बढ़ाता है।
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