प्र1.
अरब सागर के जल के गर्म होने से भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
गर्म समुद्री जल से वाष्पीकरण तेज़ी से होता है, इसलिए मानसूनी पवनों में अधिक जलवाष्प भर जाती है — मानसून प्रबल तो होता है, परंतु कहीं अधिक अनिश्चित हो जाता है।
अरब सागर की सतह गर्म → अधिक वाष्पीकरण
अधिक वाष्पीकरण → दक्षिण-पश्चिम मानसून अधिक जलवाष्प ले जाता है
अधिक जलवाष्प + वायु का ऊपर उठना → कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक तीव्र वर्षा
वही कुल नमी, असमान रूप से बँटी → अन्य क्षेत्रों में सूखा
अधिक वाष्पीकरण → दक्षिण-पश्चिम मानसून अधिक जलवाष्प ले जाता है
अधिक जलवाष्प + वायु का ऊपर उठना → कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक तीव्र वर्षा
वही कुल नमी, असमान रूप से बँटी → अन्य क्षेत्रों में सूखा
यह क्यों होता है: समुद्र की सतह से वाष्पीकरण की दर ताप बढ़ने पर तेज़ी से बढ़ती है, और गर्म वायु संघनित होने से पहले अधिक जलवाष्प धारण भी कर सकती है। इसलिए गर्म अरब सागर मानसूनी पवनों को अतिरिक्त नमी से भर देता है। जब यह आर्द्र वायु ऊपर उठने को विवश होती है — पश्चिमी घाट पर या किसी निम्न दाब तंत्र में — तो वह ठंडी होकर संघनित होती है और सारी नमी थोड़े समय में तीव्र झड़ी के रूप में गिरा देती है, न कि धीमी-स्थिर वर्षा के रूप में। अध्याय यही कहता है — दक्षिण-पश्चिम मानसून में उतार-चढ़ाव से वर्षा में असमानता होती है और भारत के कुछ क्षेत्रों में बाढ़ आ सकती है जबकि अन्य क्षेत्र सूखाग्रस्त रह सकते हैं।
ध्यान दीजिए: यह अध्याय की मूल अवधारणा का अच्छा उदाहरण है। परिवर्तन जलमंडल (समुद्र का ताप) में आरंभ होता है, वायुमंडल (मानसूनी पवन) से होकर गुज़रता है और जैवमंडल (फसल और किसान) पर आकर रुकता है। कोई भी मंडल अकेले विक्षोभित नहीं होता।