प्र1.
क्या सौर विकिरण पृथ्वी की सतह को समान रूप से गर्म करती है?
उत्तर
नहीं। सौर विकिरण पृथ्वी पर अत्यंत असमान रूप से वितरित होता है, और यही असमानता पवनों, महासागरीय धाराओं तथा जल चक्र को संचालित करती है।
तीन अलग-अलग कारण, तीनों जानने योग्य:
- पृथ्वी गोलाकार है, इसलिए अक्षांश महत्त्वपूर्ण है। भूमध्य रेखा के पास सूर्य की किरणें लगभग लंबवत पड़ती हैं और किरण-पुंज छोटे क्षेत्र पर केंद्रित रहता है। ध्रुवों के पास वही पुंज तिरछा पड़कर कहीं बड़े क्षेत्र में फैल जाता है, इसलिए प्रति वर्ग मीटर ऊर्जा बहुत कम मिलती है।
- भिन्न सतहें भिन्न व्यवहार करती हैं — एल्बिडो। हिम अपने ऊपर पड़ने वाले विकिरण का 0.80 – 0.90 भाग परावर्तित कर देती है और ठंडी रहती है; काली मृदा और महासागरीय जल बहुत कम परावर्तित करते हैं, अधिकांश अवशोषित कर लेते हैं और अपेक्षाकृत गर्म रहते हैं। भूमि जल की तुलना में शीघ्र गर्म भी होती है।
- पृथ्वी की धुरी झुकी है और वह परिक्रमा करती है। इससे यह बदलता रहता है कि कौन-सा गोलार्ध सूर्य की ओर झुका है — इसी से ऋतुएँ बनती हैं और दिन की अवधि बदलती है। इसलिए एक ही स्थान को भी वर्ष भर समान सूर्यातप नहीं मिलता।
किसी क्षैतिज सतह पर प्राप्त तीव्रता, I = I0 cos θ
(θ = उस स्थान पर सूर्य की किरणों और ऊर्ध्वाधर के बीच का कोण)
भूमध्य रेखा पर सूर्य सिर के ऊपर, θ = 0°: I = 1 kW m–2 × 1 = 1 kW m–2
60° अक्षांश पर, θ = 60°: I = 1 kW m–2 × 0.50 = 0.5 kW m–2
ध्रुव के निकट, θ → 90°: I → लगभग शून्य
(θ = उस स्थान पर सूर्य की किरणों और ऊर्ध्वाधर के बीच का कोण)
भूमध्य रेखा पर सूर्य सिर के ऊपर, θ = 0°: I = 1 kW m–2 × 1 = 1 kW m–2
60° अक्षांश पर, θ = 60°: I = 1 kW m–2 × 0.50 = 0.5 kW m–2
ध्रुव के निकट, θ → 90°: I → लगभग शून्य
यह क्यों महत्त्वपूर्ण है: असमान ऊष्मण का अर्थ है असमान वायुदाब, और वायु सदैव उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती है। इसलिए यही एक तथ्य अनुभाग 13.2 की हर बात का आरंभ-बिंदु है — स्थानीय पवन, ग्रहीय पवन और महासागरीय धाराएँ।