कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 13 सोचिए और बताइए के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
शीतल पर्वतीय समीर कृषि कार्यों, विशेषतः फसलों और मृदा के लिए किस प्रकार लाभदायक होती है?
उत्तर

रात्रि की पर्वतीय समीर घाटी का ताप घटाती है, वायु को नम और गतिशील बनाए रखती है, और मृदा तथा पत्तियों से जल की हानि धीमी कर देती है — इन सबसे फसलों और मृदा दोनों को लाभ होता है।

घाटी का तल (खेत) दिन घाटी समीर (ऊपर) रात पर्वतीय समीर (नीचे)
दिन में धूप वाली ढलान गर्म होती है, वायु ऊपर उठती है और ठंडी वायु ऊपर चढ़ती है — घाटी समीर। सूर्यास्त के बाद ढलान शीघ्र ठंडी होती है और सघन शीतल वायु घाटी में उतरती है — पर्वतीय समीर।
लाभ, एक-एक करके:
  • ऊष्मा-तनाव घटता है। अधिक गर्मी में पादप अपने रंध्र बंद कर लेते हैं और प्रकाश संश्लेषण की दक्षता गिर जाती है। रात में उतरती शीतल पवन खेत का ताप घटा देती है, जिससे पादप रातभर में स्वस्थ हो जाता है।
  • जल की हानि कम होती है। ठंडी वायु संतृप्त होने से पहले कम जलवाष्प धारण कर पाती है, इसलिए मृदा से वाष्पन और पत्तियों से वाष्पोत्सर्जन दोनों धीमे पड़ जाते हैं। मृदा अगले दिन के लिए अपनी नमी बचा लेती है। अध्याय कहता है कि ये पवन "ताप, आर्द्रता की परिस्थितियों को नियंत्रित करने में सहायता करती हैं और मृदा एवं फसलों की गुणवत्ता बनाए रखती हैं"।
  • दिन-रात के ताप में बड़ा अंतर बनता है। गर्म दिन और ठंडी रातें ठीक वही परिस्थिति हैं जो सेब, आलूबुखारा, चाय और अनेक मसालों को अच्छा स्वाद, रंग और मिठास देती हैं। इसी कारण शिमला और देहरादून के आस-पास ऐसी फसलें होती हैं जो मैदानों में नहीं हो सकतीं।
  • वायु गतिशील रहती है और शीतल वायु बह जाती है। फसल के ऊपर ठहरी हुई नम वायु कवक रोगों को न्योता देती है; हल्की पवन पत्ती की सतह सुखा देती है। नीचे की ओर बहती वायु ढलानों से शीतल वायु हटा भी देती है, जिससे ढलान पर पाला पड़ने की हानि घटती है।
  • मृदा की रक्षा होती है। पर्वतीय समीर मंद होती है, झोंकों के रूप में नंगी भूमि पर नहीं चलती, और मृदा नम बनी रहती है — इसलिए वायु द्वारा अपरदन तथा ऊपरी मृदा का सूखना दोनों घट जाते हैं।
संकेत: पर्वतीय समीर इसलिए बनती है कि सूर्यास्त के बाद ढलान घाटी के तल की तुलना में तेज़ी से ऊष्मा खोती है। ढलान की वायु ठंडी होकर सघन हो जाती है और गुरुत्व उसे नीचे खींच लेता है। सघन शीतल वायु स्वयं उतरती है — उसे कोई धकेलता नहीं।
प्र2.
भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर जल की गर्म सतह का क्या होता है? इस संचलन का उस क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर

गर्म सतही जल ध्रुवों की ओर बढ़ते हुए अपनी ऊष्मा वायु को देता जाता है, धीरे-धीरे ठंडा और सघन होकर उच्च अक्षांशों पर नीचे बैठ जाता है, और गहरे महासागर से होता हुआ भूमध्य रेखा की ओर लौट आता है। रास्ते में वह जो ऊष्मा पहुँचाता है, उससे उन तटों की जलवायु उनके अक्षांश की अपेक्षा कहीं अधिक गर्म बनी रहती है।

गर्म, कम सघन भूमध्यरेखीय जल सतह पर ध्रुवों की ओर बहता है
मार्ग में ऊपर की ठंडी वायु को ऊष्मा देता है → जल ठंडा होता है
ठंडा होना (और वाष्पन, जिससे लवणता बढ़ती है) → सघनता बढ़ती है
सघन जल उच्च अक्षांशों पर नीचे बैठ जाता है
ठंडा, सघन जल गहरे स्तरों से भूमध्य रेखा की ओर लौटता है
→ भूमध्य रेखा से ध्रुवों तक ऊष्मा का एक निरंतर वाहक बनता है
जिन क्षेत्रों तक यह पहुँचता है, उन पर प्रभाव:
  • पृथ्वी पर ताप का अंतर घटता है। अध्याय कहता है कि महासागरीय धाराएँ "भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर ऊष्मा का स्थानांतरण कर भूमंडल के ताप के अंतर को कम करती हैं"। इनके बिना भूमध्य रेखा और गर्म तथा ध्रुव और ठंडे होते।
  • उच्च अक्षांशों के बंदरगाह प्रयोग योग्य बने रहते हैं। पुस्तक का उदाहरण उत्तरी अटलांटिक प्रवाह है, जो गल्फ स्ट्रीम का विस्तार है और "यूरोप के उत्तर-पश्चिमी तट की ओर बहती है और शीतकाल में कई बंदरगाहों को बर्फ से मुक्त रखती है चाहे वह उच्च अक्षांशों पर स्थित हों।"
  • व्यापार और बसावट को सहारा मिलता है। पूरे वर्ष बर्फ-मुक्त बंदरगाह का अर्थ है निर्बाध जहाज़रानी, व्यापार और वाणिज्य — अध्याय इसका नाम लेकर उल्लेख करता है।
  • समुद्री जीवन पोषित होता है। यही संचलन पोषक तत्वों का परिवहन भी करता है, इसलिए महासागरीय धाराएँ "एक विशाल पारितंत्र को भी सहायता प्रदान करती हैं"। जहाँ ठंडा, पोषक-समृद्ध गहरा जल ऊपर उठता है, वहाँ मत्स्य संसाधन प्रचुर होते हैं।
ध्यान दीजिए: गहराई में लौटता प्रवाह सघनता से चलता है, और सघनता ताप तथा लवणता दोनों पर निर्भर करती है। "सघनता कम होने के कारण कम लवणता वाला जल सतह के निकट बना रहता है जबकि अधिक लवणता वाला जल, अधिक सघन होने के कारण महासागरीय जल के गहरे स्तरों में चला जाता है।" ठंडा होना और वाष्पन — दोनों मिलकर जल को नीचे बैठाते हैं।
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