कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 2 खोज जारी है... के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
निर्जीव रसायनों के उपयोग द्वारा संश्लेषित कोशिकाओं के विकास का भविष्य क्या है?
उत्तर

सच्चा उत्तर यह है कि पूर्णतः संश्लेषित कोशिका अभी बनी नहीं है, और अध्याय स्वयं यह सावधानी से कहता है। अब तक जो हुआ है और आगे जो हो सकता है, वह इस प्रकार है।

चरणइसका अर्थहम कहाँ हैं
संश्लिष्ट डीएनएप्रयोगशाला में संपूर्ण जीनोम की रासायनिक रचनाहो चुका — वेंटर के दल ने 2010 में माइकोप्लाज्मा माइकोइड्स का डीएनए संश्लेषित किया
विद्यमान कोशिका में संश्लिष्ट डीएनएजीवाणु का अपना डीएनए निकालकर संश्लिष्ट प्रति डालनाहो चुका — कोशिका नए अनुदेशों पर बढ़ी और विभाजित हुई, जिससे सिद्ध हुआ कि डीएनए कोशिका की संरचना और गतिविधियों को नियंत्रित करता है
न्यूनतम कोशिकाजीनोम को घटाकर उतने ही जीन रखना जितने जीवन के लिए अनिवार्य हैंप्रगति पर — इससे यह पहचानने में सहायता मिलती है कि कौन-से कार्य वास्तव में अनिवार्य हैं
पूर्णतः संश्लेषित कोशिकाझिल्ली, कोशिकाद्रव्य, राइबोसोम और डीएनए — सब निर्जीव रसायनों सेअभी नहीं — 2010 में केवल डीएनए संश्लिष्ट था; झिल्ली और कोशिकाद्रव्य पहले से विद्यमान जीवित कोशिका से लिए गए थे

यदि यह संभव हुआ तो उपयोग बड़े होंगे — औषधियाँ और टीके सस्ते में बनाने वाले जीवाणु, तेल के रिसाव या प्लास्टिक अपशिष्ट को पचाने वाले जीवाणु, फसलों के लिए नाइट्रोजन स्थिरीकरण, या ईंधन बनाना। इससे जीवविज्ञानी यह भी परख सकेंगे कि जीवन के लिए वास्तव में क्या-क्या आवश्यक है — केवल तोड़कर नहीं, बनाकर।

ऐसा क्यों होता है: कठिन भाग डीएनए नहीं — रसायनज्ञ पहले ही जीनोम लिख सकते हैं। कठिन भाग बाकी सब कुछ है। कोशिका में एक कार्यशील झिल्ली, सही आंतरिक सांद्रताएँ, अनुदेश पढ़ने को तैयार राइबोसोम और पहली अभिक्रियाएँ आरंभ करने वाले एंजाइम चाहिए। ये सब स्वयं किसी जीवित कोशिका के उत्पाद हैं, अतः इस परियोजना के सामने एक चक्रीय समस्या है — डीएनए को पढ़ने वाली मशीनरी डीएनए के पढ़े जाने से पहले मौजूद होनी चाहिए। ठीक इसीलिए 2010 के प्रयोग को पात्र के लिए एक जीवित कोशिका उधार लेनी पड़ी, और इसीलिए कोशिका सिद्धांत का यह कथन अब भी टिका है कि सभी कोशिकाएँ पूर्वविद्यमान कोशिकाओं से बनती हैं।
प्र2.
यदि एक संश्लेषित कोशिका तैयार की जाती है तो संबंधित नैतिक विषय क्या हो सकते हैं?
उत्तर

प्रश्न विज्ञान जितने ही गंभीर हैं, और वे कुछ स्पष्ट वर्गों में आते हैं।

  • सुरक्षा और निर्मुक्ति। प्रयोगशाला में अभिकल्पित जीव का प्रकृति में कोई इतिहास नहीं है। यदि वह बाहर निकल जाए तो प्राकृतिक जातियों से स्पर्धा कर सकता है, अपने जीन जंगली जीवाणुओं को दे सकता है, या ऐसा व्यवहार कर सकता है जिसका किसी ने अनुमान न लगाया हो। परीक्षण कौन करेगा, और फैलने पर उत्तरदायी कौन होगा?
  • दुरुपयोग। जिन तकनीकों से उपयोगी सूक्ष्मजीव बनेगा, उन्हीं से हानिकारक भी बन सकता है। जान-बूझकर दुरुपयोग रोकने के लिए कठोर विनियमन और अंतरराष्ट्रीय सहमति आवश्यक होगी।
  • स्वामित्व। क्या किसी संश्लेषित जीव या जिस जीनोम अनुक्रम से वह बना है, उस पर पेटेंट होना चाहिए? यदि जीवन के मूल औजार कुछ ही कंपनियों के अधिकार में हों तो निर्धन देश और छोटे किसान इसके लाभ से वंचित रह सकते हैं।
  • न्यायसंगत पहुँच। इस विधि से बनी औषधियाँ और टीके सुलभ मूल्य पर मिलने चाहिए, अन्यथा यह तकनीक अमीर और गरीब की खाई पाटने के बजाय चौड़ी कर देगी।
  • जीवन के प्रति सम्मान। अनेक लोगों को लगता है कि रसायनों से जीवित जीव बनाना एक सीमा लाँघना है, और भिन्न समुदाय तथा आस्थाएँ इसे भिन्न दृष्टि से देखेंगी। निर्णय में केवल वैज्ञानिकों का नहीं, उनके मत का भी स्थान होना चाहिए।
  • सहमति और पारदर्शिता। समाज को बताया जाना चाहिए कि क्या प्रयास किया जा रहा है, और उस पर बहस का अवसर काम होने के बाद नहीं, पहले मिलना चाहिए।
  • पर्यावरणीय उत्तरदायित्व। कृषि या अपशिष्ट-उपचार में किसी भी उपयोग से पहले मृदा, जल और अन्य जीवों पर दीर्घकालिक प्रभाव की जाँच होनी चाहिए।
ऐसा क्यों होता है: नैतिकता यहाँ इसलिए आती है क्योंकि यह तकनीक शक्तिशाली है और उसे पलटना कठिन। संश्लेषित जीव जनन कर सकता है, जो कोई साधारण रसायन नहीं कर सकता, अतः भूल वहीं नहीं रुकती जहाँ हुई थी। इसीलिए वैज्ञानिक स्वयं परिबद्ध प्रयोगों, अंतर्निर्मित सुरक्षा-स्विचों — जैसे किसी ऐसे पोषक पर निर्भरता जो केवल प्रयोगशाला में मिले — और सार्वजनिक विमर्श की वकालत करते हैं। विज्ञान बताता है कि हम क्या कर सकते हैं; हमें क्या करना चाहिए, यह प्रश्न पूरे समाज को मिलकर तय करना है।
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