कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 2 सोचिए और बताइए के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
एक स्थान से दूसरे स्थान पर गति करने वाले जंतुओं की अपेक्षा एक स्थान पर स्थिर रहने वाले पादपों में कोशिका भित्ति की आवश्यकता के संबंध में आप क्या तर्क देंगे?
उत्तर

तर्क इस पर टिका है कि अवलंब और बचाव का मार्ग कहाँ से आता है। स्थिर जीव को सामर्थ्य हर कोशिका में बनानी पड़ती है; गतिशील जीव को हर कोशिका को आकार बदलने योग्य रखना पड़ता है।

समस्यापादप का समाधानजंतु का समाधान
सीधे खड़े रहना, वायु और वर्षा सहनाहर कोशिका में दृढ़ सेल्युलोस भित्ति; स्फीत कोशिकाएँ एक-दूसरे पर दबाव डालती हैंआंतरिक कंकाल और पेशियाँ
परासरण से बहुत अधिक जल भीतर आनाभित्ति प्रतिदाब देती है और आगे जल आना रुक जाता है — कोशिका फट नहीं सकतीवृक्क और रक्त शरीर के तरल को समपरासारी रखते हैं, अतः यह समस्या उठती ही नहीं
सूखे, ताप या परभक्षी से बचनागति संभव नहीं; सहना ही पड़ता हैहटकर चला जाता है
गति, भ्रूण की वृद्धि, घाव भरनाआवश्यकता नहीं — वृद्धि निश्चित वर्धनशील बिंदुओं पर कोशिकाएँ जोड़कर होती हैभित्तिहीन कोशिकाएँ आकार बदलती हैं, एक-दूसरे पर सरकती हैं और स्थान बदलती हैं
ऐसा क्यों होता है: भित्ति मुफ्त का उपहार नहीं, एक सौदा है। वह दृढ़ता और फटने से सुरक्षा देती है, पर गतिशीलता और लचीलापन छीन लेती है। मृदा में जड़े पादप के लिए दृढ़ता गतिशीलता से कहीं अधिक मूल्यवान है, अतः यह सौदा लाभ का है। जिस जंतु को दौड़ना, निगलना, पेशी सिकोड़ना और घाव भरना है, उसके लिए हर कोशिका के चारों ओर दृढ़ बक्सा यह सब असंभव कर देता — इसलिए जंतु केवल झिल्ली रखते हैं और सामर्थ्य कहीं और, अस्थि और उपास्थि में, जुटाते हैं। ध्यान दीजिए कि कवक और जीवाणु, जो अगतिशील या मंद गति वाले हैं, उन्होंने भी पादपों जैसा ही चुनाव किया और उनमें भी भित्ति है।
प्र2.
यदि किसी पादप कोशिका की कोशिका भित्ति, कोशिका झिल्ली के समान लचीली हो जाए तो आप किन परिणामों का पूर्वानुमान लगाएँगे?
उत्तर

वह कोशिका ठीक जंतु कोशिका जैसा व्यवहार करने लगेगी — और पूरा पौधा गिर पड़ेगा।

  1. साधारण मृदा-जल (अल्पपरासारी) में कोशिका फट जाएगी। परासरण द्वारा जल निरंतर भीतर आता रहता है और उसे केवल दृढ़ भित्ति रोकती है। लचीली भित्ति के साथ विरोधी दाब बन ही नहीं पाएगा, अतः कोशिका फूलती जाएगी और झिल्ली फट जाएगी।
  2. पौधा अपना आकार खो देगा। तना, पत्ती या पंखुड़ी लाखों स्फीत भित्ति-युक्त कोशिकाओं के परस्पर दबाव से खड़े रहते हैं। दृढ़ता हटाइए तो पूरी तरह सिंचित पौधा भी मुरझाए हुए की भाँति लटक जाएगा।
  3. जीवद्रव्यकुंचन के स्थान पर पूरी कोशिका सिकुड़ेगी। सांद्र विलयन में अंतर्वस्तुएँ अपरिवर्तित भित्ति से हटने के बजाय पूरी कोशिका ही सिकुड़ जाएगी — और केवल जल डालकर उसे पुनर्जीवित नहीं किया जा सकेगा।
  4. जड़ों का अवशोषण कम प्रभावी होगा। भित्ति पारगम्य है और मृदा-जल तथा खनिजों के झिल्ली तक पहुँचने का चौड़ा, खुला मार्ग बनाती है। झिल्ली जैसा मुलायम आवरण इस मार्ग को धीमा कर देगा।
मृदा-जल जड़ के कोशिका-रस के लिए अल्पपरासारी है
→ परासरण द्वारा जल निरंतर भीतर आता है
→ भीतर दाब बढ़ता है
दृढ़ भित्ति उपस्थित: दाब संतुलित हो जाता है, कोशिका स्फीत होकर रुक जाती है
दृढ़ भित्ति अनुपस्थित: दाब बढ़ता ही जाता है → कोशिका फट जाती है
ऐसा क्यों होता है: भित्ति एक दाब-पात्र की तरह कार्य करती है। कोशिका भर जाने पर भित्ति का भीतर की ओर दबाव परासरणी खिंचाव के बराबर हो जाता है और सांद्रताएँ असमान होने पर भी जल की शुद्ध गति रुक जाती है। इसी संतुलन को स्फीति कहते हैं, और स्फीति ही पादप का कंकाल है।
प्र3.
दो आलू के टुकड़ों को लगभग समान आकार में काट कर उन्हें विभिन्न तरल पदार्थों में रखने से पूर्व उनके आरंभिक भार का मापन क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर

ताकि दोनों व्यवस्थाओं में केवल तरल का ही अंतर रहे, और भार में परिवर्तन का परिकलन वास्तव में किया जा सके।

  • समान आकार — निष्पक्ष परीक्षण। परासरण पृष्ठीय क्षेत्रफल और ऊतक की मात्रा पर निर्भर करता है। बड़े टुकड़े में अधिक झिल्ली क्षेत्रफल और अधिक कोशिकाएँ होंगी, अतः केवल आकार के कारण ही उसमें अधिक जल का विनिमय होगा। आकार समान रखने से आकार एक कारण नहीं रह जाता और केवल तरल ही चर बचता है।
  • प्रारंभिक भार — आधार-रेखा। कितना भार बढ़ा या घटा, यह केवल अंतिम भार से नहीं जाना जा सकता। इसके लिए अंतर चाहिए।
भार में परिवर्तन = अंतिम भार − प्रारंभिक भार

बीकर ‘क’: 25.0 g → 27.2 g, अर्थात 27.2 − 25.0 = +2.2 g (जल प्राप्त)
बीकर ‘ख’: 25.0 g → 22.6 g, अर्थात 22.6 − 25.0 = −2.4 g (जल की हानि)
ऐसा क्यों होता है: यह नियंत्रित प्रयोग का तर्क है। जो भी कारक परिणाम को प्रभावित कर सकता है — आकार, रूप, एक ही आलू, एक ही समय, एक ही तापमान — उसे जान-बूझकर समान रखा जाता है, ताकि परिणाम का कोई भी अंतर उसी एक कारक से आया हो जिसे बदला गया था। प्रारंभिक भार के बिना प्रयोग केवल ‘बड़ा’ और ‘छोटा’ जैसा धुँधला प्रभाव देता; उनके साथ वह ऐसे अंक देता है जिनकी तुलना की जा सके, जिन्हें दोहराया जा सके और कोई दूसरा जाँच सके।
सुझाव: हर बार तौलने से पहले दोनों टुकड़ों को समान सावधानी से पोंछिए। सतह पर लगा जल ऐसे तौला जाएगा मानो वह कोशिकाओं में प्रवेश कर गया हो।
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