प्र1.
तालिका 3.4 में दी गई क्रियाएँ कीजिए। अपने अनुभव लिखिए और उनकी तुलना तालिका 3.4 में दिए गए अनुभवों से कीजिए। संयोजी ऊतकों के कार्यों का अध्ययन कीजिए एवं उनकी पहचान कीजिए (चित्र 3.12)।
उत्तर
पूरी की गई तालिका 3.4। प्रत्येक क्रिया आपको अपनी ही त्वचा के नीचे एक संयोजी ऊतक का अनुभव कराती है।
| क्रिया | अनुभव | प्रकार्य | पहचाना गया संयोजी ऊतक |
|---|---|---|---|
| धीरे से अपनी कोहनी का स्पर्श कीजिए | एक कठोर और दृढ़ संरचना | सुदृढ़ता, अवलंब और सुरक्षा देती है | अस्थि |
| अपना कान दबाइए और मोड़िए अथवा अपनी नाक को धीरे से दबाइए और रुकिए | एक नरम और लचीली संरचना जो पुनः आकार प्राप्त कर लेती है | लचीलापन देती है और अस्थियों के सिरों को आघात-अवशोषण के लिए गद्दीदार बनाती है | उपास्थि |
| अपनी अग्रबाहु का स्पर्श कीजिए और अँगुलियाँ हिलाइए | अँगुलियों के दूर होने पर भी अग्रबाहु में गति का अनुभव होता है | माँसपेशी को अस्थि से जोड़ती है और इस प्रकार गति को संभव करती है | कंडरा |
| कुर्सी पर बैठिए और अपना पैर उतना ऊपर उठाइए जितना आपके घुटने के लिए संभव हो | संधि एक सीमा से आगे जाने की अनुमति नहीं देती | अस्थि को अस्थि से जोड़ता है, स्थिरता देता है, गति सीमित करता है और विस्थापन रोकता है | स्नायु |
परिणाम का अर्थ। कोहनी और कान के बीच जो अंतर आप अनुभव करते हैं, वह वस्तुतः आधात्री का अंतर है —
अस्थि की आधात्री — दृढ़, कैल्सियम और फॉस्फोरस यौगिकों से युक्त → कठोर, सुदृढ़, सुरक्षात्मक
उपास्थि की आधात्री — मृदु, जेली जैसी → लचीली, पुनः आकार लेने वाली, आघात-अवशोषक
उपास्थि की आधात्री — मृदु, जेली जैसी → लचीली, पुनः आकार लेने वाली, आघात-अवशोषक
अँगुली हिलाने पर अग्रबाहु में गति क्यों अनुभव होती है: अँगुलियों को चलाने वाली पेशियाँ हाथ में हैं ही नहीं — वे अग्रबाहु में स्थित हैं और लंबी कंडराओं के माध्यम से, जो कलाई के ऊपर से गुजरती हैं, अँगुलियों की अस्थियों पर कार्य करती हैं। कंडरा सुदृढ़, रस्सी जैसा संयोजी ऊतक है — अग्रबाहु की पेशी संकुचित होते ही वह बल अँगुली तक पहुँचा देती है। भारी पेशी को अग्रबाहु में रखने से हाथ पतला और सूक्ष्म कार्यों के योग्य बना रहता है।
घुटना एक सीमा पर क्यों रुक जाता है: स्नायु संधि के आर-पार अस्थि को अस्थि से जोड़ते हैं। वे सुदृढ़ हैं और बहुत कम खिंचते हैं, अतः संधि को उसका सामान्य परिसर देकर वहीं थाम लेते हैं — जिससे अस्थियाँ अपने स्थान से हट नहीं पातीं (विस्थापन नहीं होता)।
संकेत: इसे ऐसे याद रखिए — कंडरा = पेशी से अस्थि, स्नायु = अस्थि से अस्थि।