प्र1.
अपने शरीर के विभिन्न भागों को हिलाइए और अवलोकन कीजिए कि वे कौन-कौन-सी गति कर सकते हैं।
उत्तर
पूरी की गई तालिका 3.5। पुस्तक कोहनी की पंक्ति (नहीं, नहीं, हाँ) आदर्श के रूप में देती है; शेष पंक्तियाँ वहाँ उपस्थित संधि के प्रकार से निकलती हैं।
| शरीर का भाग | पूरा घुमाव | आंशिक घुमाव | झुकाव/मुड़ना | अन्य गति | संधि |
|---|---|---|---|---|---|
| कोहनी | नहीं | नहीं | हाँ | केवल एक तल में मुड़ना और सीधा होना | कोर |
| कंधा | हाँ | हाँ | हाँ | अग्र, पश्च, पार्श्व और गोलाकार गति | कंदुक-खल्लिका |
| घुटना | नहीं | नहीं | हाँ | केवल मुड़ना और सीधा होना; जानुफलक संधि की रक्षा करता है | कोर |
| गर्दन | नहीं | हाँ | हाँ | दाएँ-बाएँ घूमना (‘नहीं’ की मुद्रा), ऊपर-नीचे हिलाना | धुराग्र |
| अँगुलियाँ | नहीं | नहीं | हाँ | प्रत्येक पोर पर मुड़ना; अँगूठे का आधार घूम भी सकता है | कोर |
| पैर की अँगुलियाँ | नहीं | नहीं | हाँ | ऊपर-नीचे मुड़ना (यही गति एड़ी के ऊपर कंडरा में अनुभव होती है) | कोर |
| कलाई | नहीं | हाँ | हाँ | ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ और थोड़ी गोलाकार गति | अनेक छोटी अस्थियों के बीच सर्पी संधि |
सब भागों के उत्तर समान क्यों नहीं हैं: कोई भाग कौन-सी गति कर सकता है, यह संधि पर अस्थियों के सिरों के आकार से तय होता है। उथले गड्ढे में बैठा गोलाकार शीर्ष (कंधा) हर दिशा में घूम सकता है। वक्र खाँचे में टिका बेलन (कोहनी, घुटना) केवल एक तल में — दरवाजे के कब्जे की तरह। छल्ले में घूमती खूँटी (गर्दन) केवल घूम सकती है। किनारे से किनारे जुड़ी अस्थियाँ (खोपड़ी) हिल ही नहीं सकतीं। यहाँ भी संरचना ही प्रकार्य तय करती है, ठीक वैसे ही जैसे किसी ऊतक में।
संकेत: संधि स्वयं कुछ हिला नहीं सकती। पेशियाँ कंडराओं द्वारा अस्थियों को खींचती हैं; संधि केवल यह तय करती है कि वह खिंचाव अस्थि को किस दिशा में ले जाने दिया जाएगा।