प्र1.
आपने अवश्य देखा होगा कि हमारे शरीर के कुछ भाग सरलता से कई दिशाओं में गति कर सकते हैं जबकि अन्य केवल एक दिशा में ही गति करते हैं। ऐसा क्यों होता है?
उत्तर
क्योंकि भिन्न स्थानों पर संधि का प्रकार भिन्न है, और संधि दो या अधिक अस्थियों के बीच का वह जोड़ है जो एक विशेष प्रकार से आकारित होता है।
| संधि | अस्थियाँ कैसे बैठती हैं | संभव गति | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| कंदुक-खल्लिका | एक अस्थि का गोलाकार शीर्ष दूसरी के उथले गड्ढे में बैठता है | अग्र, पश्च, पार्श्व और गोलाकार | कंधा, कूल्हा |
| कोर | अस्थियों के सिरे ऐसे आकारित कि वे केवल एक तल में झूलें, दरवाजे के कब्जे की तरह | एक ही दिशा में मुड़ना और सीधा होना | कोहनी, घुटना (जानुफलक से सुरक्षित) |
| धुराग्र | एक अस्थि दूसरी द्वारा बने छल्ले के भीतर घूमती है | घूर्णन — दाएँ-बाएँ, दरवाजे के हैंडल की तरह | मेरुदंड पर खोपड़ी (गर्दन) |
| अचल | चपटी अस्थियाँ किनारे से किनारे जुड़ी | कोई नहीं | खोपड़ी की अस्थियाँ |
शरीर हर जगह कंदुक-खल्लिका संधि क्यों नहीं रखता: गति की स्वतंत्रता स्थिरता की कीमत पर मिलती है। कंधा हर दिशा में घूम सकता है और वही संधि सबसे सरलता से विस्थापित भी होती है। घुटने को पूरे शरीर का भार उठाना है, अतः वह एक ही तल में गति करने और शेष हर दिशा को अस्वीकार करने के लिए बना है — स्नायु यही सुनिश्चित करते हैं। और जहाँ कोई गति होनी ही नहीं चाहिए, जैसे मस्तिष्क के चारों ओर, वहाँ संधियाँ अचल हैं, ताकि दौड़ते-कूदते समय भी खोपड़ी एक दृढ़ सुरक्षा-कवच बनी रहे।