कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 3 अभ्यास प्रश्न के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन2026-09-08
प्र1.
विभज्योतकी ऊतक बार-बार विभाजित होते हैं। इनकी कोशिकाओं की कौन-सी विशेषताएँ इनके लिए ऐसा करना संभव बनाती हैं? (i) इनमें सुरक्षा के लिए मोटी भित्तियाँ होती हैं। (ii) इनमें पोषक तत्वों को संग्रहित करने वाली बड़ी रसधानियाँ होती हैं। (iii) इनमें पतली भित्तियाँ, सघन कोशिकाद्रव्य और बड़ा और स्पष्ट केंद्रक होता है। (iv) वे कार्यात्मक रूप से विभेदित कोशिकाएँ हैं।
उत्तर
(iii) इनमें पतली भित्तियाँ, सघन कोशिकाद्रव्य और बड़ा और स्पष्ट केंद्रक होता है।
यही समुच्चय सही क्यों है: इसकी प्रत्येक विशेषता सीधे विभाजन के काम आती है —
पतली भित्ति — भित्ति खिंच सकती है और पुत्री कोशिकाओं के बीच नई भित्ति शीघ्र बन सकती है। मोटी लिग्निनयुक्त भित्ति में यह असंभव होता।
अनेक कोशिकांगों से युक्त सघन कोशिकाद्रव्य — प्रोटीन बनाने के लिए राइबोसोम, ऊर्जा के लिए माइटोकॉन्ड्रिया, नई झिल्ली और भित्ति-सामग्री के लिए ER और गॉल्जीकाय।
बड़ा और सुस्पष्ट केंद्रक — प्रत्येक विभाजन से पूर्व DNA की प्रतिकृति बनानी होती है, और छोटी कोशिका में बड़ा केंद्रक उसे कुशलता से नियंत्रित कर पाता है।
इनके साथ जोड़िए — रसधानियाँ अनुपस्थित और कोशिकाएँ कम या बिना अंतःकोशिकीय अवकाश के संहत।
शेष विकल्प क्यों गलत हैं: (i) मोटी भित्ति दृढ़ोतक की है, जो मृत है और विभाजित नहीं हो सकता। (ii) बड़ी रसधानी परिपक्व मृदूतक का लक्षण है; वह कोशिकाद्रव्य को किनारे धकेल देती। (iv) जो कोशिका विभेदित हो चुकी है, वह विभाजन की क्षमता खो चुकी है — विभेदन का अर्थ ही यही है।
प्र2.
यदि कोई पादप पत्तियों से जड़ों तक भोजन परिवहन करने में असमर्थ है तो ऐसा किस ऊतक की असामान्य प्रणाली के कारण होता है? (i) जाइलम (ii) फ्लोएम (iii) बाह्यत्वचा (iv) दृढ़ोतक
उत्तर
(ii) फ्लोएम।
भोजन पत्तियों में बनता है और उसे नीचे जड़ों तक जाना होता है, जो स्वयं प्रकाश-संश्लेषण नहीं कर सकतीं। यह कार्य फ्लोएम की चालनी नलिकाओं का है, जिनमें शर्करा का भारण और अभारण सहचर कोशिकाएँ कराती हैं।
शेष क्यों नहीं: जाइलम जल और खनिजों को जड़ से ऊपर ले जाता है, भोजन को नीचे नहीं। बाह्यत्वचा एक सुरक्षात्मक आवरण है। दृढ़ोतक मृत, मोटी भित्ति वाला सहायक ऊतक है और किसी वस्तु का संवहन नहीं करता।
संकेत: दिशा याद रखिए — जाइलम: जड़ → पत्ती, जल। फ्लोएम: पत्ती → सर्वत्र, भोजन। इसी समुच्चय का प्रश्न 8 (छाल उखड़ा वृक्ष) यही विचार बाहर से दिखाता है।
प्र3.
जंतुओं के आंतरिक अंगों को आस्तरित करने वाले उपकला ऊतक प्रायः केवल एक या कुछ कोशिकाओं की मोटाई के क्यों होते हैं? (i) भोजन को प्रभावी रूप से संग्रहीत करने के लिए (ii) अधिकतम दृढ़ता प्रदान करने के लिए (iii) उनसे होकर पदार्थों के त्वरित आदान-प्रदान के लिए (iv) घर्षण कम करने के लिए
उत्तर
(iii) उनसे होकर पदार्थों के त्वरित आदान-प्रदान के लिए।
पतला होना इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है: पदार्थ उपकला को विसरण द्वारा पार करते हैं, और दूरी बढ़ने पर विसरण की दर घटती है। पतली, चपटी कोशिकाओं की एकल परत सबसे छोटा मार्ग देती है, अतः फेफड़ों की वायु से ऑक्सीजन लगभग तत्काल रक्त तक पहुँच जाती है और पचा हुआ भोजन आँत के आस्तर को शीघ्र पार कर जाता है। तालिका 3.2 यही संबंध स्पष्ट करती है — रक्त वाहिकाओं और फेफड़ों की विनिमय उपकला पतली, चपटी कोशिकाओं की एकल परत है।
शेष क्यों गलत हैं: भोजन का संग्रह उपकला का कार्य नहीं है। जहाँ दृढ़ता चाहिए वहाँ उपकला पतली होती ही नहीं — त्वचा, मुँह और ग्रासनली में कोशिकाओं की अनेक परतें होती हैं (तालिका 3.2), और ठीक इसीलिए वहाँ विनिमय नहीं हो सकता। घर्षण कम करने का कार्य श्लेष्म जैसे स्रावों से होता है, पतले होने से नहीं।
प्र4.
आप चित्र में दिखाए गए अनुसार दो प्रकार से कूद सकते हैं (चित्र 3.21) — टाँग सीधी रखकर कूदना — घुटनों और टखनों को सीधा रखिए। सामान्य रूप से कूदना — घुटनों और टखनों को स्वाभाविक रूप से मोड़िए। दोनों बार कूदने में आपके टखने, घुटने और कूल्हे की स्थिति किस प्रकार भिन्न थीं?
उत्तर
सामान्य कूद में तीनों संधियाँ उछलने से पहले गहराई तक मुड़ती हैं और उतरते समय फिर मुड़ती हैं; टाँग सीधी रखकर कूदने में वे लगभग जकड़ी रहती हैं, आप बहुत कम ऊँचा कूदते हैं और उतरते समय झटका लगता है।
संधि
टाँग सीधी रखकर कूदना
सामान्य रूप से कूदना
टखना
जकड़ा हुआ; लगभग कोई मोड़ नहीं, केवल अँगुलियों का हल्का धक्का
मुड़ता है और फिर बलपूर्वक सीधा होकर पैर को भूमि पर दबाता है
घुटना
सीधा जकड़ा हुआ; कोर संधि का उपयोग होता ही नहीं
गहराई तक मुड़कर बैठक की स्थिति बनाता है, फिर तेजी से सीधा होकर शरीर को ऊपर उछालता है
कूल्हा
सीधा रहता है, धड़ लगभग ऊर्ध्वाधर
शरीर नीचे जाते समय आगे झुकता है और ऊपर उठते समय फैल जाता है
परिणाम
कम ऊँचाई, कठोर लैंडिंग, टाँगों और मेरुदंड में झटका
अधिक ऊँचाई, कोमल और नियंत्रित लैंडिंग
मोड़ने से इतना अंतर क्यों पड़ता है: पेशी बल केवल छोटी होते समय उत्पन्न करती है। पहले बैठक बनाने से जंघा और पिंडली की पेशियाँ खिंच जाती हैं, अतः प्रत्येक को खींचने के लिए अधिक दूरी मिलती है और वह शरीर पर अधिक कार्य कर पाती है। कूल्हा, फिर घुटना, फिर टखना — तीनों संधियाँ क्रम से कार्य करके अपने धक्के जोड़ देती हैं। उतरते समय यही संधियाँ मुड़कर आघात को अधिक समय में फैला देती हैं, और अस्थियों के सिरों की उपास्थि आघात सोख लेती है। संधियाँ जकड़ी हों तो पूरा आघात क्षण भर में अस्थियों से होता हुआ सीधे मेरुदंड तक पहुँच जाता है — इसीलिए लैंडिंग कष्टप्रद लगती है।
स्वयं जाँचिए: इसीलिए खिलाड़ी को घुटने मोड़कर कोमलता से उतरना सिखाया जाता है, और यही बैठक कबड्डी, खो-खो तथा शास्त्रीय नृत्य की अरैमंडी मुद्रा में भी दिखाई देती है।
प्र5.
जब आप अपने घुटने और टखने मोड़ते हैं तो किस प्रकार की संधि का उपयोग होता है? (i) कंदुक खल्लिका (ii) कोर (iii) धुराग्र
उत्तर
(ii) कोर।
घुटना और टखना दोनों केवल एक ही दिशा में मुड़ते और सीधे होते हैं, ठीक वैसे जैसे दरवाजा अपने कब्जे पर। घुटने पर जानुफलक नामक एक छोटी अस्थि संधि के आगे रहकर उसकी रक्षा करती है।
कोर संधि ही क्यों, कंदुक-खल्लिका क्यों नहीं: घुटने और टखने को पूरे शरीर का भार उठाना पड़ता है और प्रत्येक लैंडिंग पर बड़ा बल उनसे होकर ऊपर जाता है। कोर संधि केवल एक तल में गति देती है और शेष सभी दिशाओं को अस्वीकार कर देती है — भार के नीचे टाँग को स्थिर रखने के लिए यही आवश्यक है। कंदुक-खल्लिका संधि, जैसे कंधा, गति की स्वतंत्रता स्थिरता की कीमत पर देती है — भुजा के लिए उपयोगी, टाँग के लिए संकटपूर्ण।
(iii) धुराग्र गलत है — धुराग्र संधि घूर्णन देती है, जैसे ‘नहीं’ कहते समय सिर हिलाना।
प्र6.
निम्नलिखित में से प्रत्येक स्थिति (I, II, III और IV) के लिए नीचे दिए गए सही विकल्प का चयन कीजिए — (i) अभिकथन और कारण दोनों सत्य हैं और कारण, अभिकथन की सही व्याख्या करता है। (ii) अभिकथन और कारण दोनों सत्य हैं किंतु कारण, अभिकथन की सही व्याख्या नहीं करता है। (iii) अभिकथन सत्य है, किंतु कारण असत्य है। (iv) अभिकथन असत्य है, किंतु कारण सत्य है। I अभिकथन — उपकला फेफड़ों में गैस विनिमय के लिए अधिक उपयुक्त है। कारण — इसमें लंबी कोशिकाओं की अनेक परतें होती हैं जो विसरण की गति को धीमा कर देती हैं। II अभिकथन — हृद पेशी बिना थके निरंतर संकुचन कर सकती है। कारण — हृद पेशी कोशिकाओं में अधिक संख्या में माइटोकॉन्ड्रिया और प्रचुर मात्रा में रक्त की आपूर्ति होती है। III अभिकथन — कंडराएँ एक अस्थि को दूसरी अस्थि से जोड़ती हैं और संधि की गति को संभव बनाती हैं। कारण — कंडराएँ सुदृढ़ संयोजी ऊतक से बनी होती हैं जो पेशी से अस्थि तक बल का संचरण करती हैं। IV अभिकथन — कोर संधि में गति मुख्यतः एक तल में होती है। कारण — अस्थियों के सिरे सभी दिशाओं में सर्पी गति करने हेतु आकारित होते हैं।
उत्तर
स्थिति
अभिकथन
कारण
उत्तर
I
सत्य
असत्य
(iii)
II
सत्य
सत्य और सही व्याख्या
(i)
III
असत्य
सत्य
(iv)
IV
सत्य
असत्य
(iii)
I — (iii)। अभिकथन सही है: फेफड़ों का आस्तर गैस विनिमय के लिए अत्यंत उपयुक्त है। किंतु कारण सत्य के ठीक विपरीत है। तालिका 3.2 के अनुसार विनिमय करने वाली उपकला पतली, चपटी कोशिकाओं की एकल परत है, जिससे विसरण का मार्ग न्यूनतम रहता है। लंबी कोशिकाओं की अनेक परतें तो विसरण को धीमा करेंगी, अतः वह व्यवस्था वहाँ मिलती है जहाँ सुरक्षा चाहिए — त्वचा, मुँह, ग्रासनली।
II — (i)। हृद पेशी वास्तव में जीवनपर्यंत बिना थके लयबद्ध रूप से कार्य करती है, और दिया गया कारण ठीक वही है। थकान तब आती है जब पेशी ATP को बनने से अधिक तेजी से खर्च करे। माइटोकॉन्ड्रिया की अधिक संख्या का अर्थ है ऑक्सी-श्वसन से ATP का उच्च उत्पादन; प्रचुर रक्त आपूर्ति उन्हें ऑक्सीजन और ग्लूकोस निरंतर पहुँचाती रहती है और अपशिष्ट हटाती रहती है। इस प्रकार आपूर्ति माँग के बराबर बनी रहती है और ऑक्सीजन-ऋण बनता ही नहीं।
III — (iv)। अभिकथन असत्य है: अस्थि को अस्थि से स्नायु जोड़ते हैं। कंडराएँ पेशी को अस्थि से जोड़ती हैं। कारण अपने आप में सही कथन है — कंडराएँ सुदृढ़ संयोजी ऊतक हैं और संकुचित होती पेशी का बल अस्थि तक पहुँचाती हैं।
IV — (iii)। अभिकथन सत्य है: कोर संधि एक ही तल में गति करती है, जैसे कोहनी और घुटना। कारण असत्य है; सभी दिशाओं में सर्पी गति के लिए आकारित सिरे कंदुक-खल्लिका संधि का वर्णन करते हैं, कोर संधि का नहीं। वस्तुतः यह कारण अभिकथन का खंडन करता है।
अभिकथन-कारण प्रश्नों के लिए संकेत: पहले अभिकथन और कारण को अलग-अलग परखिए, तत्पश्चात पूछिए कि कारण अभिकथन की व्याख्या करता है या नहीं। स्थिति III में कारण सत्य है और अभिकथन असत्य — दोनों को साथ पढ़ने पर यह संयोजन सरलता से छूट जाता है।
प्र7.
तालिका 3.7 में दिए गए आँकड़ों का उपयोग करके X-अक्ष पर वृक्ष की आयु (वर्षों में) और Y-अक्ष पर समय के साथ वृक्ष का व्यास (cm में) तथा निर्मित वार्षिक वलयों की संख्या के मध्य एक ग्राफ बनाइए। (i) समय के साथ तने के व्यास के संदर्भ में ग्राफ का विश्लेषण कीजिए और अपने निष्कर्ष साझा कीजिए। (ii) सागवान के वृक्ष के व्यास और निर्मित वार्षिक वलयों के बीच क्या संबंध है? (iii) तने की परिधि में वृद्धि के लिए कौन-सा विशेषीकृत ऊतक उत्तरदायी है और यह कहाँ स्थित होता है?
उत्तर
X-अक्ष पर आयु लीजिए और आवक्ष व्यास (DBH, cm) तथा वार्षिक वलयों की संख्या — दोनों एक ही Y-अक्ष पर, क्योंकि दोनों 4 से 40 तक जाते हैं।
दोनों वक्र आयु के साथ बढ़ते हैं। वलयों की रेखा पूर्णतः सीधी है (प्रतिवर्ष एक वलय), जबकि व्यास की रेखा में 10 से 20 वर्ष के बीच एक तीव्र खंड है।
(i) समय के साथ व्यास। व्यास पूरे समय बढ़ता रहता है — वृक्ष कभी मोटा होना बंद नहीं करता। किंतु दर प्रत्येक वर्ष समान नहीं है —
व्यास वृद्धि की दर = (DBH में परिवर्तन) ÷ (आयु में परिवर्तन)
5 → 10 वर्ष: (8 − 4) cm ÷ (10 − 5) वर्ष = 4 cm ÷ 5 वर्ष = 0.8 cm वर्ष⁻¹
10 → 20 वर्ष: (24 − 8) cm ÷ 10 वर्ष = 16 cm ÷ 10 वर्ष = 1.6 cm वर्ष⁻¹
20 → 25 वर्ष: (28 − 24) cm ÷ 5 वर्ष = 0.8 cm वर्ष⁻¹
25 → 30 वर्ष: (32 − 28) cm ÷ 5 वर्ष = 0.8 cm वर्ष⁻¹
30 → 40 वर्ष: (40 − 32) cm ÷ 10 वर्ष = 8 cm ÷ 10 वर्ष = 0.8 cm वर्ष⁻¹
पूरे अभिलेख का औसत = (40 − 4) cm ÷ (40 − 5) वर्ष = 36 ÷ 35 ≈ 1.03 cm वर्ष⁻¹
निष्कर्ष: युवा वृक्ष (10 – 20 वर्ष) ने परिधि में किसी भी अन्य अवस्था से दुगुनी तेजी से वृद्धि की — 0.8 cm वर्ष⁻¹ की तुलना में 1.6 cm वर्ष⁻¹। वह दशक स्पष्टतः अनुकूल परिस्थितियों का रहा और पार्श्व विभज्योतक तब सर्वाधिक सक्रिय था। 20 वर्ष के पश्चात दर पुनः स्थिर 0.8 cm वर्ष⁻¹ पर आ जाती है।
(ii) व्यास और वार्षिक वलयों का संबंध। वलय और आयु में ठीक एक-से-एक संबंध है — 5 वर्ष/5 वलय, 20 वर्ष/20 वलय, 40 वर्ष/40 वलय — क्योंकि प्रत्येक वर्ष एक वलय बनता है। अतः व्यास वलयों की संख्या के साथ बढ़ता है, किंतु ठीक समानुपात में नहीं —
प्रति वलय जुड़ा व्यास = DBH ÷ वलयों की संख्या
5 वलय पर: 4 ÷ 5 = 0.80 cm प्रति वलय 20 वलय पर: 24 ÷ 20 = 1.20 cm प्रति वलय
25 वलय पर: 28 ÷ 25 = 1.12 cm प्रति वलय 40 वलय पर: 40 ÷ 40 = 1.00 cm प्रति वलय
40 वर्ष पर एक वलय की औसत त्रिज्यीय चौड़ाई = (40 ÷ 2) cm ÷ 40 वलय = 20 ÷ 40 = 0.5 cm = 5 mm
अतः संबंध यह है: वलय अधिक → व्यास अधिक, और वलयों की संख्या ही आयु बताती है। चौड़े वलय अनुकूल वर्ष दर्शाते हैं और संकरे वलय प्रतिकूल वर्ष — इसीलिए प्रति वलय व्यास का मान स्थिर नहीं रहता।
(iii) ऊतक।पार्श्व विभज्योतक। यह तने के भीतर, उसकी परिधि के अनुदिश एक वलय के रूप में व्यवस्थित सक्रिय रूप से विभाजित होने वाली कोशिकाओं के रूप में स्थित होता है। इसकी कोशिकाएँ विभाजित होकर संकेंद्री रूप से भीतर और बाहर दोनों ओर नई कोशिकाएँ जोड़ती हैं, जिससे तने का व्यास बढ़ता है और प्रतिवर्ष एक वार्षिक वलय बनता है।
क्या आप जानते हैं? प्रत्येक वलय एक वर्ष की परिस्थितियों का अभिलेख है, अतः वैज्ञानिक पुरानी लकड़ी को डायरी की तरह पढ़ते हैं — वलयों की चौड़ाई उन्हें उन सूखों और अच्छी वर्षा वाले वर्षों की जानकारी देती है जिनका कोई मौसम-अभिलेख उपलब्ध नहीं है।
प्र8.
एक वन में देखा गया कि एक हाथी ने अपनी भोजन की आवश्यकता पूरी करने के लिए एक वृक्ष की छाल को बुरी तरह उखाड़ दिया क्योंकि छाल पोषक तत्वों का एक समृद्ध स्रोत होती है (चित्र 3.22)। अपने अधिगम के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए — (i) छाल उखड़ने से वृक्ष का/के कौन-सा/से कार्य बाधित होता/होते है/हैं? (ii) छाल उखड़ने के बाद भी वृक्ष के तने को और क्षति होने पर पादप का कौन-सा ऊतक प्रभावित होगा? (iii) यदि छाल के नीचे के ऊतक गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो जाएँ तो वृक्ष का कौन-सा कार्य बाधित होगा? (iv) उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर देने के लिए आप क्या पूर्वानुमान लगाते हैं? यदि आपके पूर्वानुमानों में परिवर्तन हो तो उत्तर में क्या अंतर आएगा?
उत्तर
बाहर से भीतर की ओर चलिए। छाल सबसे बाहरी सुरक्षात्मक परत है; उसके ठीक नीचे फ्लोएम और पार्श्व विभज्योतक हैं; सबसे भीतर जाइलम।
(i) छाल उखड़ने से बाधित होने वाले कार्य।
सुरक्षा समाप्त हो जाती है। छाल मृत, संहत रूप से व्यवस्थित काग कोशिकाओं की बनी है जिनमें ऐसा पदार्थ होता है जो उन्हें जल और गैसों के लिए अपारगम्य बनाता है। छाल हटते ही तना जल-हानि, कवक, जीवाणु, कीट और यांत्रिक क्षति के लिए खुल जाता है।
भोजन का परिवहन बाधित होता है।फ्लोएम छाल के ठीक नीचे होता है, अतः प्रायः वह छाल के साथ ही उखड़ जाता है। तब पत्तियों में बनी शर्करा जड़ों तक नहीं पहुँच पाती।
उस स्थान पर परिधि की वृद्धि रुक जाती है, क्योंकि पार्श्व विभज्योतक भी फ्लोएम के ठीक भीतर होने के कारण क्षतिग्रस्त हो जाता है।
(ii) तने को और क्षति होने पर प्रभावित ऊतक। और भीतर जाने पर पहले पार्श्व विभज्योतक (काग एधा तथा संवहन बंडल का एधा) और फिर जाइलम नष्ट होगा। जाइलम की क्षति सबसे गंभीर है, क्योंकि जाइलम तने को यांत्रिक दृढ़ता भी देता है।
(iii) छाल के नीचे के ऊतक गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त होने पर। जड़ों से पत्तियों तक जल और खनिजों का ऊर्ध्व परिवहन बाधित होगा, क्योंकि यही जाइलम का कार्य है — और उसके साथ वृक्ष की यांत्रिक दृढ़ता भी, अतः तना आँधी में टूट सकता है। यदि फ्लोएम पूरे घेरे में कट जाए तो जड़ों को भोजन मिलना बंद हो जाता है, वे भूखी रहकर जल और खनिज अवशोषित करना बंद कर देती हैं, और पत्तियाँ अछूती होने पर भी अंततः पूरा वृक्ष मर जाता है।
(iv) पूर्वानुमान और उनके बदलने पर उत्तर में अंतर।
लगाया गया पूर्वानुमान
यदि पूर्वानुमान बदल जाए तो…
छाल पूरे तने के चारों ओर उखाड़ी गई है
यदि केवल एक ओर का टुकड़ा उखड़ा हो तो दूसरी ओर का फ्लोएम भोजन नीचे पहुँचाता रहेगा और वृक्ष प्रायः जीवित रहकर घाव भर लेगा
क्षति फ्लोएम और एधा तक पहुँची है, केवल बाहरी मृत काग तक नहीं
यदि केवल बाहरी मृत काग खुरचा गया हो तो वृक्ष सुरक्षा तो खोएगा किंतु भोजन का परिवहन चलता रहेगा और काग एधा से नया काग बन जाएगा
वृक्ष द्विबीजपत्री है जिसमें द्वितीयक वृद्धि और सतत छाल होती है
ताड़ या बाँस जैसे एकबीजपत्री में काग एधा और छाल के नीचे फ्लोएम का वलय होता ही नहीं, अतः वही चोट बिल्कुल भिन्न प्रभाव डालेगी
जाइलम अभी सुरक्षित है
यदि जाइलम भी कट जाए तो पत्तियों को जल मिलना बंद हो जाएगा और वे कुछ ही दिनों में मुरझा जाएँगी — जड़ों की भुखमरी से मृत्यु की तुलना में कहीं शीघ्र
घाव में पुनः संक्रमण नहीं होगा और ऋतु अनुकूल है
यदि खुली लकड़ी में कवक प्रवेश कर जाएँ तो सड़न फैलेगी और आंशिक रूप से छाल उखड़ा वृक्ष भी मर सकता है
परिवहन की दिशा ही सब कुछ तय करती है: फ्लोएम भोजन को पत्तियों से जड़ों की ओर नीचे ले जाता है, अतः पूरे घेरे की क्षति जड़ों को भूखा करती है, पत्तियों को नहीं। जाइलम जल को ऊपर ले जाता है, अतः उसकी क्षति पहले पत्तियों को मारती है। कौन-सा ऊतक कटा है, यही बताता है कि वृक्ष का कौन-सा सिरा पहले मरेगा।
प्र9.
आम्रपाली ने देखा कि आम के एक नवोद्भिद पौधे का तना मानसून की हवाओं में लचीला होकर मुड़ जाता है किंतु टूटता नहीं। इस लचीलेपन के लिए कौन-सा ऊतक उत्तरदायी है? यदि विद्यमान ऊतक को दृढ़ोतक से प्रतिस्थापित कर दिया जाए तो क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका पूर्वानुमान लगाइए और व्याख्या कीजिए।
उत्तर
इस लचीलेपन के लिए श्लेषोतक उत्तरदायी है।
श्लेषोतक सजीव कोशिकाओं से बना है जिनकी भित्ति कोनों पर पेक्टिन के निक्षेपण से असमान रूप से स्थूलित होती है — पुस्तक पेक्टिन की तुलना रबर से करती है। कोनों की अतिरिक्त सामग्री दृढ़ता देती है, जबकि बीच के पतले भाग भित्ति को विरूपित होने देते हैं। इसीलिए तना हवा में झुक जाता है और झोंका बीतते ही पुनः सीधा हो जाता है।
यदि इसे दृढ़ोतक से प्रतिस्थापित कर दिया जाए —
श्लेषोतक (वास्तविक)
दृढ़ोतक (काल्पनिक)
भित्ति
पतली, कोनों पर पेक्टिन से स्थूलित
समान रूप से मोटी, लिग्निन से कठोर
कोशिकाएँ
सजीव, तने के साथ बढ़ सकती हैं
अधिकतर मृत, दीर्घीकृत नहीं हो सकतीं
हवा में
झुकता है और पूर्वस्थिति में लौट आता है
दृढ़ रहता है और सीमा पार होते ही टूट जाता है
वृद्धि पर प्रभाव
युवा तने के साथ-साथ बढ़ता है
मृत, लिग्निनयुक्त आवरण युवा तने के दीर्घीकरण को रोक देगा
पूर्वानुमान: शांत वायु में पौधा बहुत कड़ा खड़ा रहेगा, किंतु मानसून के पहले प्रबल झोंके में तना चटक जाएगा या पूरी तरह टूट जाएगा — ठीक वैसे जैसे सूखी टहनी टूटती है और नई टहनी मुड़ जाती है। उसकी ऊँचाई की वृद्धि भी रुक जाएगी, क्योंकि लिग्निनयुक्त भित्ति तने के दीर्घीकरण के साथ खिंच नहीं सकती।
युवा तने में श्लेषोतक और पुराने तने में दृढ़ोतक क्यों: युवा तना अभी बढ़ रहा है और पतला है, अतः उसे ऐसा अवलंब चाहिए जो लचीला हो और उसके साथ बढ़े। पुराना तना दीर्घीकरण पूरा कर चुका है और उसे बड़ा भार उठाना है, अतः वह दृढ़, मृत, लिग्निनयुक्त ऊतक वहन कर सकता है। आवश्यकता बदलने पर पादप अपना सहायक ऊतक भी बदल लेता है — संरचना यहाँ भी प्रकार्य के अनुसार ही है।
प्र10.
सोहन ने गन्ने के पुनरुद्भवन के लिए एक प्रयोग अभिकल्पित किया जिसमें उसने गन्ना उगाने के लिए कलम (cutting) का उपयोग किया। उसने दो प्रकार की कलम, प्रकार ‘क’ और प्रकार ‘ख’ (चित्र 3.23) का उपयोग किया। कुछ सप्ताह बाद, प्रकार ‘ख’ की कलम में अंकुर दिखाई दिए और वे गन्ने के पादप में विकसित हो गए जबकि प्रकार ‘क’ की कलम में अंकुरण नहीं हुआ। (i) प्रकार ‘ख’ की कलम ने गन्ने के रूप में क्यों वृद्धि की किंतु प्रकार ‘क’ ने क्यों नहीं की? (ii) प्रकार ‘ख’ में प्रकार ‘क’ की तुलना में क्या अंतर था? (iii) इस परिवर्तन के प्रभाव का निर्धारण करने के लिए कौन-सा प्रेक्षण अथवा मापन किया गया? (iv) उचित तुलना सुनिश्चित करने के लिए दोनों प्रकार की कलम में कौन-से मानदंड समान रखने चाहिए?
उत्तर
चित्र 3.23 को ध्यान से देखिए। कलम (क) दो पर्वसंधियों के बीच से लिया गया चिकना पर्व है। कलम (ख) में पर्वसंधि है — उस पर उभरा हुआ वलय, एक कलिका और जड़ों के आरंभिक चिह्न स्पष्ट दिखाई देते हैं।
(i) ‘ख’ में वृद्धि हुई और ‘क’ में नहीं — क्यों। अंकुरण के लिए ऐसी कोशिकाएँ चाहिए जो अब भी विभाजित हो सकें। पर्वसंधि पर कलिका (सुप्त प्ररोह शीर्षस्थ विभज्योतक) और उसके ठीक ऊपर पर्व के आधार पर अंतर्वेशी विभज्योतक होता है। कलम ‘ख’ में ये उपस्थित हैं, अतः वह नया प्ररोह और जड़ें बना सकी। कलम ‘क’ पूर्णतः स्थायी ऊतक — मृदूतक, दृढ़ोतक, जाइलम और फ्लोएम — से बना है, जिनकी हर कोशिका विभाजन की क्षमता खो चुकी है। वह कुछ समय जीवित रह सकती है, किंतु उसमें कोई वृद्धि-बिंदु न होने से अंकुरण कभी नहीं होगा।
(ii) अंतर। ‘ख’ में कलिका सहित पर्वसंधि (और उसका विभज्योतकी ऊतक) उपस्थित थी; ‘क’ बिना पर्वसंधि और बिना कलिका का पर्व मात्र था।
(iii) क्या प्रेक्षण या मापन किया गया। अंकुर निकला या नहीं, और निकला तो कितना। व्यवहार में आप ये अभिलेखित करेंगे —
कुल रोपी गई कलमों में से कितनी में अंकुरण हुआ (अंकुरण प्रतिशत);
पहला अंकुर दिखाई देने में कितने दिन लगे;
नए प्ररोह की लंबाई cm में, निश्चित अंतराल पर मापी गई;
बनी जड़ों की संख्या और उनकी लंबाई cm में।
अंकुरण प्रतिशत = (अंकुरित कलमों की संख्या ÷ कुल रोपी गई कलमों की संख्या) × 100
उदाहरण: यदि 20 में से 18 ‘ख’ प्रकार की कलमों में अंकुरण हुआ, तो = (18 ÷ 20) × 100 = 90%
यदि 20 में से 0 ‘क’ प्रकार की कलमों में अंकुरण हुआ, तो = 0%
(iv) समान रखे जाने वाले मानदंड, ताकि अंतर केवल पर्वसंधि की उपस्थिति का रह जाए —
गन्ने की एक ही किस्म, एक ही जनक पादप से ली गई कलमें;
प्रत्येक कलम की समान लंबाई, समान मोटाई और समान आयु;
समान मृदा, समान आमाप के गमले, समान गहराई और दिशा में रोपण;
समान मात्रा और समान आवृत्ति की सिंचाई;
समान ताप, सूर्य-प्रकाश और आर्द्रता — दोनों को साथ-साथ रोपिए;
दोनों प्रकार की कलमों की समान संख्या, ताकि प्रतिशत तुलनीय रहें, तथा प्रेक्षण की समान तिथियाँ।
निष्पक्ष परीक्षण के लिए यह सब क्यों आवश्यक है: प्रयोग का दावा है कि अंकुरण का कारण पर्वसंधि है। यह दावा तभी टिकेगा जब दोनों समूहों में केवल पर्वसंधि ही भिन्न हो। यदि ‘ख’ की कलमें मोटी भी होतीं या उन्हें अधिक जल भी मिलता, तो यह कहना असंभव होता कि परिणाम किस कारक से आया। शेष सब कुछ स्थिर रखना ही एक चर को स्वतंत्र रूप से परखने योग्य बनाता है।
क्या आप जानते हैं? गन्ना, आलू और शकरकंद — तीनों का व्यावसायिक प्रवर्धन ठीक इसी विधि से, कलिकायुक्त तने के टुकड़ों से किया जाता है, क्योंकि यह बीज से तेज है और जनक के समरूप पादप देता है।
प्र11.
कक्षा में चर्चा के समय रोहन कहता है— “ऊतक समान कोशिकाओं का एक समूह है जो समान कार्य करता है” किंतु राजीव इसका प्रतिवाद करते हुए कहता है— “यह सरल ऊतकों की स्थिति में सत्य है किंतु जटिल ऊतकों की स्थिति में थोड़ा भिन्न है।” कक्षा में हुई चर्चा के संदर्भ में अपना स्पष्टीकरण दीजिए।
उत्तर
राजीव सही है, और रोहन के कथन में केवल एक शब्द बदलने की आवश्यकता है। ऊतक कोशिकाओं का वह समूह है जो एक सामान्य प्रकार्य के लिए मिलकर कार्य करता है — यह आवश्यक नहीं कि वे सभी एक ही प्रकार की कोशिकाएँ हों।
सरल स्थायी ऊतक
जटिल स्थायी ऊतक
कोशिका के प्रकार
केवल एक प्रकार
एक से अधिक प्रकार
उदाहरण
मृदूतक, श्लेषोतक, दृढ़ोतक
जाइलम, फ्लोएम
कार्य का बँटवारा
प्रत्येक कोशिका वही कार्य करती है — सभी मृदूतक कोशिकाएँ भोजन संचित करती हैं
एक ही कार्य के अलग-अलग भाग अलग-अलग कोशिकाएँ करती हैं
जाइलम को लीजिए। इसमें चार प्रकार की कोशिकाएँ हैं और उद्देश्य केवल एक — जल को ऊपर ले जाना —
वाहिनिकाएँ और वाहिकाएँ — नलिकाकार, मोटी भित्ति वाली और मृत; यही नलियाँ हैं।
जाइलम तंतु — दृढ़ोतकीय; यांत्रिक दृढ़ता देते हैं।
जाइलम मृदूतक — एकमात्र सजीव घटक; भोजन संचित करता है।
फ्लोएम को लीजिए। फिर चार प्रकार की कोशिकाएँ, उद्देश्य एक — भोजन का परिवहन —
चालनी नलिकाएँ — लंबी, नलिकाकार, छिद्रित भित्तियों से जुड़ी; मार्ग स्वयं।
सहचर कोशिकाएँ — विशेषीकृत मृदूतक कोशिकाएँ, जो चालनी नलिका का नियमन करती हैं और शर्करा के भारण-अभारण का अनुवीक्षण करती हैं।
फ्लोएम मृदूतक — भोजन, राल, टैनिन और रबड़क्षीर संग्रहीत करता है।
फ्लोएम तंतु — दृढ़ोतकीय; कोमल चालनी नलिकाओं को सहारा देते हैं।
एक बेहतर परिभाषा, जो दोनों स्थितियों को समेट ले: ऊतक कोशिकाओं का वह समूह है जो एक साथ संगठित होकर एक विशिष्ट प्रकार्य के लिए एक इकाई की भाँति कार्य करता है — सरल ऊतक में संरचना में समान, जटिल ऊतक में अनेक प्रकार की।
जटिल ऊतक क्यों बने: संवहन एक नहीं, अनेक कार्यों का जोड़ है — एक खुला मार्ग, उसे पिचकने से बचाने वाली दृढ़ता, भंडारण, और प्रवेश-निर्गम का नियमन। कोई एक कोशिका एक साथ खोखली-मृत भी हो और सजीव-नियामक भी — यह असंभव है। इसीलिए पादप अनेक प्रकार की कोशिकाओं को एक ही ऊतक में संगठित कर देता है। यही विचार जंतुओं में भी है — रक्त एक संयोजी ऊतक है जो RBC, WBC, बिंबाणु और प्लाज्मा से बना है और सभी मिलकर परिवहन तथा रक्षा करते हैं।
प्र12.
नारियल के कठोर और रेशेदार तंतुओं का उपयोग चटाई बनाने के लिए किया जाता है। कौन-से ऊतक में यह दृढ़ता प्रदान करने के लिए उपयुक्त संरचनात्मक विशेषताएँ होती हैं? स्पष्ट कीजिए कि सजीव मृदूतक से इस उद्देश्य की पूर्ति क्यों नहीं हो सकती है।
उत्तर
दृढ़ोतक। नारियल के रेशे का तंतु दृढ़ोतक है, और उसकी प्रत्येक विशेषता दृढ़ता की ही विशेषता है।
दृढ़ोतक की विशेषता
चटाई को क्या देती है
समान रूप से मोटी, लिग्निन से भारी निक्षेपित भित्ति
दृढ़ता, तथा खींचे या कुचले जाने का प्रतिरोध
लंबी, पतली, नुकीली कोशिकाएँ सिरे से सिरे तक सटी हुई
ऐसे तंतु जिन्हें बटकर मजबूत सूत बनाया और बुना जा सके
परिपक्वता पर अधिकांश कोशिकाएँ मृत
खोने के लिए जल है ही नहीं, अतः सूखने पर भी तंतु आकार और दृढ़ता बनाए रखता है
लिग्निन जल-प्रतिरोधी है
चटाई धुलाई, गीले फर्श और वर्षा में शीघ्र सड़ती नहीं
सजीव मृदूतक से यह कार्य क्यों नहीं हो सकता:
मृदूतक कोशिकाओं की भित्ति पतली होती है — खिंचाव सहने के लिए सामग्री ही नहीं है। वे सरलता से फट जाती हैं।
वे विरल रूप से व्यवस्थित होती हैं और उनमें अंतःकोशिकीय अवकाश होते हैं, अतः ऊतक रेशेदार नहीं, स्पंजी और कोमल होता है।
वे सजीव और जल से भरी होती हैं। उनकी कठोरता स्फीति से आती है, भित्ति से नहीं। सूखते ही वे पिचककर सिकुड़ जाती हैं — मृदूतक से बनी चटाई उसी दिन ढीली पड़ जाती।
सजीव होने के कारण उन्हें भोजन और जल की आपूर्ति भी चाहिए, और पादप से अलग होते ही वे सड़ने लगतीं और सूक्ष्मजीवों का आक्रमण झेलतीं।
मुख्य अंतर: मृदूतक तभी तक दृढ़ है जब तक वह सजीव और जल से भरा है; दृढ़ोतक इसलिए दृढ़ है क्योंकि उसकी भित्ति मोटी और लिग्निनयुक्त है, और कोशिका के मरने के बाद भी वह दृढ़ बना रहता है। पादप से बाहर टिकने वाली किसी भी वस्तु के लिए — कॉयर की रस्सी, जूट, अखरोट का छिलका, बीजावरण — मृत, लिग्निनयुक्त ऊतक ही चाहिए।
प्र13.
विभा अपनी सहेली नेहा से कहती है— “विभज्योतकी कोशिकाएँ केवल जड़ और प्ररोह के अग्रभाग (शीर्ष) पर स्थित होती हैं।” आप इस कथन के विषय में क्या सोचते हैं? यदि कथन असत्य है तो नेहा विभा से कौन-सा प्रश्न पूछ सकती है जिससे वह इसे भली-भाँति समझ सके?
उत्तर
कथन असत्य है। शीर्षस्थ विभज्योतक तीन प्रकारों में से केवल एक है। विभज्योतकी कोशिकाएँ तने की परिधि के अनुदिश (पार्श्व विभज्योतक) तथा पर्वसंधियों और पर्व के आधार पर (अंतर्वेशी विभज्योतक) भी उपस्थित होती हैं।
तीन प्रकार के विभज्योतक, तीन भिन्न कार्य — लंबाई, परिधि और पुनःवृद्धि।
नेहा जो प्रश्न पूछ सकती है — प्रत्येक ऐसा तथ्य सामने रखता है जिसकी व्याख्या विभा का कथन नहीं कर सकता —
“यदि विभज्योतक केवल शीर्षों पर है, तो वृक्ष का तना प्रतिवर्ष मोटा क्यों होता जाता है, और जिन वार्षिक वलयों को गिनकर हम उसकी आयु निकालते हैं, वे किससे बनते हैं?”
“लॉन काटने पर घास की हर पत्ती का अग्रभाग हट जाता है। तो घास पुनः क्यों उग आती है?”
“बाड़ की छँटाई के बाद अधिक शाखाएँ निकल आती हैं और वह घनी हो जाती है। जब अग्रभाग हट चुका है तो उन नई शाखाओं की कोशिकाएँ कहाँ से आ रही हैं?”
“हमारे क्रियाकलाप 3.1 में मूलाग्र काटने पर जड़ लंबी होना रुक गई, फिर भी प्याज का कंद जीवित और सक्रिय रहा। तब कहीं और कौन-सी विभाजनशील कोशिकाएँ उपस्थित थीं?”
इनमें से कोई भी एक प्रश्न सही निष्कर्ष तक पहुँचा देगा: शीर्षस्थ विभज्योतक अग्रभागों पर लंबाई बढ़ाता है, पार्श्व विभज्योतक तने के अनुदिश परिधि बढ़ाता है, और पर्वसंधियों पर स्थित अंतर्वेशी विभज्योतक घास तथा बाड़ों को कटने के बाद पुनरुद्भवन में सहायता करता है।
संकेत: अच्छा प्रति-प्रश्न केवल “तुम गलत हो” नहीं कहता। वह एक ऐसा दैनिक अवलोकन सामने रखता है जिसकी व्याख्या गलत विचार नहीं कर सकता, और सामने वाले को स्वयं निष्कर्ष निकालने देता है।
प्र14.
एक पादप कोशिका और एक जंतु कोशिका का आमाप समान है। (i) किस कोशिका में रसधानी अपेक्षाकृत बड़ी होगी? कारण बताइए। (ii) उपरोक्त प्रश्न का उत्तर देने के लिए आप क्या पूर्वानुमान लगाते हैं?
उत्तर
(i) पादप कोशिका में। परिपक्व पादप कोशिका में एक बड़ी केंद्रीय रसधानी होती है जो कोशिका के अधिकांश आयतन को घेर सकती है और कोशिकाद्रव्य तथा केंद्रक को भित्ति से सटी पतली परत में दबा देती है। जंतु कोशिका में या तो रसधानी होती ही नहीं, या केवल कुछ बहुत छोटी रसधानियाँ होती हैं।
कारण —
स्फीति और अवलंब। पादप कोशिका में दृढ़ कोशिका भित्ति होती है। रसधानी में जल भरने पर कोशिकाद्रव्य उस भित्ति से दब जाता है और कोशिका कठोर हो जाती है — यही स्फीति कोमल शाकीय पौधे को सीधा खड़ा रखती है। जंतु कोशिका में भित्ति नहीं, अतः बड़ी जलपूर्ण रसधानी उसे फोड़ देगी या उसका आकार बिगाड़ देगी।
भंडारण। पादप अपना भोजन स्वयं बनाता है और जल, भोजन, वर्णक तथा अपशिष्ट रसधानी में संचित करता है। जंतु आवश्यकतानुसार भोजन ग्रहण करता है और अपशिष्ट रक्त तथा उत्सर्जी अंगों से बाहर करता है, अतः उसे बड़े भंडार-कोष की आवश्यकता नहीं।
सस्ती वृद्धि। पादप कोशिका मुख्यतः रसधानी में जल भरकर बढ़ती है, नया कोशिकाद्रव्य बनाकर नहीं — यह वृद्धि का अत्यंत मितव्ययी तरीका है।
लचीलापन। जंतु कोशिका को गति, विभाजन और पड़ोसी कोशिकाओं के बीच से निकलने के लिए आकार बदलना पड़ता है; बड़ी रसधानी उसे कड़ा बना देती।
(ii) लगाए गए पूर्वानुमान —
दोनों कोशिकाएँ परिपक्व और विभेदित हैं, विभाजनशील नहीं — विभज्योतकी पादप कोशिका में तो रसधानी होती ही नहीं, अतः वैसी स्थिति में उत्तर बदल सकता है।
पादप कोशिका एक सामान्य सजीव मृदूतक जैसी कोशिका है, जाइलम वाहिका या दृढ़ोतक तंतु जैसी मृत कोशिका नहीं।
जंतु कोशिका एक साधारण काय कोशिका है — वसा कोशिका या बड़ी रसधानी वाली स्रावी कोशिका जैसी विशेषीकृत नहीं।
पादप कोशिका स्फीत है (जल से भरी); मुरझाई कोशिका में रसधानी सिकुड़ी होती है।
“समान आमाप” का अर्थ समान कुल कोशिका आयतन है, अतः हम वास्तव में उस आयतन में रसधानी के अंश की ही तुलना कर रहे हैं।
पूर्वानुमान बताना क्यों आवश्यक है: “पादप कोशिका” उत्तर केवल सामान्य, परिपक्व स्थिति में सत्य है। पूर्वानुमानों को नाम देना यह स्पष्ट कर देता है कि उत्तर कब सत्य नहीं रहेगा — और यही एक वैज्ञानिक उत्तर को रटे हुए उत्तर से अलग करता है।
प्र15.
एक पाठ्यपुस्तक में यह कहा गया है, “प्रत्येक पादप ऊतक केवल एक विशिष्ट कार्य करता है।” इस कथन की सत्यता की विवेचनात्मक जाँच करने के लिए आप कौन-से प्रश्न पूछेंगे? इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए आप किन ऊतकों के उदाहरण लेंगे?
उत्तर
यह कथन एक अति-सरलीकरण है। विशेषीकरण के कारण एक कार्य प्रमुख अवश्य हो जाता है, किंतु अधिकांश पादप ऊतक एक से अधिक कार्य करते हैं।
पूछने योग्य प्रश्न —
क्या इस अध्याय में किसी ऊतक के लिए एक से अधिक प्रकार्य गिनाए गए हैं?
क्या वही ऊतक भिन्न अंगों में या भिन्न पादपों में भिन्न व्यवहार करता है?
क्या पादप की आयु या दशा के साथ ऊतक का कार्य बदलता है?
क्या एक ही कार्य एक से अधिक ऊतक कर सकते हैं — अर्थात ऊतक और प्रकार्य का संबंध वास्तव में एक-से-एक है भी?
यदि कोई ऊतक सचमुच केवल एक ही कार्य करता, तो उसकी क्षति पर क्या दिखना चाहिए? क्या पादप केवल वही एक क्षमता खोता है?
उत्तर देने वाले उदाहरण —
ऊतक
वास्तव में जो कार्य करता है
यह क्या दर्शाता है
मृदूतक
भोजन का भंडारण; हरित भागों में प्रकाश-संश्लेषण; वायु गुहिकाएँ बनाकर जलीय पादपों को तैराना; भराव ऊतक
एक ऊतक, कम-से-कम चार कार्य — और कौन-सा करेगा, यह उसके स्थान पर निर्भर है
बाह्यत्वचा
सुरक्षा; उपत्वचा द्वारा जल-हानि नियंत्रण; मूलरोम के रूप में जल और खनिजों का अवशोषण; रंध्रों द्वारा गैसीय विनिमय और वाष्पोत्सर्जन
वही ऊतक एक अंग में अवरोध है और दूसरे अंग में अवशोषी सतह
जाइलम
जल और खनिजों का परिवहन; साथ ही पादप को दृढ़ता देना; जाइलम मृदूतक भोजन संचित करता है
पुस्तक स्वयं एक ही वाक्य में जाइलम के दो प्रकार्य बताती है
फ्लोएम
भोजन का परिवहन; फ्लोएम मृदूतक भोजन, राल, टैनिन और रबड़क्षीर संग्रहीत करता है; फ्लोएम तंतु दृढ़ता देते हैं
जटिल ऊतक अनेक कार्यों को अपनी विभिन्न कोशिकाओं में बाँट देता है
पार्श्व विभज्योतक
परिधि बढ़ाता है; काग एधा को भी जन्म देता है, जिससे सुरक्षात्मक छाल बनती है
एक विभाजनशील ऊतक सुरक्षात्मक ऊतक भी उत्पन्न करता है
श्लेषोतक और दृढ़ोतक
दोनों यांत्रिक अवलंब देते हैं — एक लचीलेपन के साथ, दूसरा दृढ़ता के साथ
दो भिन्न ऊतक एक ही प्रकार्य में भागीदार हैं, अतः संबंध दोनों ओर से एक-से-एक नहीं
निष्कर्ष। अधिक उचित कथन होगा: प्रत्येक पादप ऊतक एक मुख्य कार्य के लिए विशेषीकृत होता है, किंतु अनेक ऊतक अतिरिक्त कार्य भी करते हैं, और एक ही कार्य में एक से अधिक ऊतक भागीदार हो सकते हैं। और सबसे गहरा प्रति-उदाहरण स्वयं पूर्णशक्तता है — गाजर की परिपक्व फ्लोएम कोशिका, जिसका “एकमात्र कार्य” भोजन का परिवहन है, पूरा पादप पुनरुद्भूत कर सकती है।
संकेत: विज्ञान के किसी भी व्यापक कथन को परखने के लिए उससे बहस मत कीजिए — एक स्पष्ट प्रति-उदाहरण खोजिए। यहाँ अकेला मृदूतक ही इस कथन को असत्य सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है।
क्या यह उपयोगी रहा?प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद!त्रुटि बताएँ