कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 3 परियोजना कार्य के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
किसी चिकित्सक के पास जाइए और पता कीजिए कि स्नायु विदारण (ligament rupture), उपास्थि विदारण (cartilage rupture) और अस्थि भंग (fracture of bone) में क्या होता है। हम अपनी जीवनशैली में परिवर्तन करके और पोषण संतुलन बनाकर इस जोखिम को कैसे कम कर सकते हैं?
उत्तर

कैसे कीजिए: लिखित प्रश्नों की सूची साथ ले जाइए, चिकित्सक के उत्तर अपने शब्दों में नोट कीजिए, और किशोरों में सामान्यतः दिखने वाली एक-एक चोट का उदाहरण पूछिए। सम्मिलित ऊतक, लक्षण, सामान्य उपचार और स्वस्थ होने में लगने वाला समय अभिलेखित कीजिए।

नमूना उत्तर:

चोटसम्मिलित ऊतकक्या होता हैउपचार धीमा या तेज क्यों
स्नायु विदारणस्नायु — अस्थि से अस्थिसुदृढ़ पट्टी फट जाती है, संधि अपनी स्थिरता खो देती है और सुरक्षित सीमा से आगे चली जाती है; पीड़ा, सूजन और संधि के लड़खड़ाने का अनुभवस्नायु में रक्त की आपूर्ति अल्प होती है, अतः उपचार धीमा; अधिक फटने पर शल्यक्रिया आवश्यक हो सकती है
उपास्थि विदारणउपास्थि — अस्थियों के सिरों और कशेरुकाओं के बीच की गद्दीमृदु जेली जैसी आधात्री वाली गद्दी फट जाती है; अस्थियों के सिरे परस्पर रगड़ते हैं, गति में पीड़ा और जकड़न होती हैउपास्थि में अपनी रक्त आपूर्ति लगभग नहीं होती, अतः उपचार बहुत धीमा और क्षति प्रायः स्थायी
अस्थि भंगअस्थि — कैल्सियम और फॉस्फोरस यौगिकों से युक्त दृढ़ आधात्रीअस्थि चटक या टूट जाती है; तीव्र पीड़ा, सूजन और भार सहने में असमर्थताअस्थि में रक्त की प्रचुर आपूर्ति होती है, अतः जोड़ने के बाद वह अपेक्षाकृत अच्छी तरह जुड़ जाती है — प्रायः 6 से 8 सप्ताह में

जोखिम कम करने के उपाय —

  • पोषण — अस्थि की आधात्री के लिए कैल्सियम और फॉस्फोरस (दूध, दही, रागी, तिल, हरी पत्तेदार सब्जियाँ), उस कैल्सियम के अवशोषण के लिए धूप से विटामिन D, तथा पेशी एवं कंडरा-स्नायु के संयोजी ऊतक के लिए प्रोटीन।
  • नियमित व्यायाम — भार पड़ने पर अस्थि अधिक आधात्री बनाती है, और संधि के चारों ओर की सुदृढ़ पेशियाँ स्नायुओं का भार घटा देती हैं।
  • खेल से पहले वार्म-अप और खिंचाव; अधिकांश स्नायु विदारण ठंडी अवस्था में अचानक मुड़ने से होते हैं।
  • बैठने, पढ़ने और भार उठाने में सही मुद्रा; भार सदैव घुटने मोड़कर उठाइए, कमर झुकाकर नहीं।
  • योग — शोध दर्शाते हैं कि योग लचीलेपन, मुद्रा और श्वसन में सुधार करता है, तनाव कम करता है और जीवनशैली संबंधी रोगों को रोकने में सहायक है। प्रत्येक वर्ष 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है।
  • उपयुक्त जूते, सुरक्षित खेल-मैदान और कठिन अभ्यास के बीच पर्याप्त विश्राम।
प्र2.
निम्नलिखित क्रियाकलाप को कीजिए — (i) अपने पैरों को फर्श पर सपाट रखकर बैठिए। (ii) अपनी हाथ की अँगुलियों को टखने के पीछे एड़ी के ठीक ऊपर रखिए (चित्र 3.24)। (iii) अपने पैरों की अँगुलियों को ऊपर-नीचे करने पर आप कंडरा में गति का अनुभव करेंगे। कंडराएँ बहुत अधिक खिंचाव सहन करने के लिए बनी होती हैं। अपने शरीर में विभिन्न संधियों के आस-पास स्थित अन्य कंडराओं का पता लगाइए।
उत्तर

आप क्या अनुभव करेंगे: एड़ी के ठीक ऊपर त्वचा के नीचे एक मोटी, कड़ी रस्सी-जैसी संरचना, जो पैर की अँगुलियाँ नीचे करने पर तन जाती है और सरक जाती है तथा अँगुलियाँ ऊपर उठाने पर ढीली पड़ जाती है। यही वह कंडरा है जो आपकी पिंडली की पेशी को एड़ी की अस्थि से जोड़ती है।

अपने शरीर में ढूँढ़ी जा सकने वाली अन्य कंडराएँ —

कहाँ दबाइएक्या कीजिएकंडरा किसे जोड़ती है
टखने के पीछे, एड़ी के ऊपरपैर की अँगुलियाँ नीचे-ऊपर कीजिएपिंडली की पेशी → एड़ी की अस्थि
कलाई के पिछले भाग परअँगुलियाँ सीधी कीजिए और मोड़िएअग्रबाहु की पेशियाँ → अँगुलियों की अस्थियाँ
कोहनी के सामनेप्रतिरोध के विरुद्ध कोहनी मोड़िएद्विशिर पेशी → अग्रबाहु की अस्थि
जानुफलक के ठीक नीचेबैठे-बैठे घुटना सीधा कीजिएजंघा की पेशी → पिंडली की अस्थि
घुटने के पीछे, दोनों ओरघुटना मोड़िएजंघा की पिछली पेशियाँ → टाँग की अस्थियाँ
कंडराएँ इतना बड़ा बल क्यों सह लेती हैं: कंडरा सघन संयोजी ऊतक है जिसके सारे तंतु एक ही दिशा में — ठीक खिंचाव की दिशा में — व्यवस्थित होते हैं। बल की दिशा में पंक्तिबद्ध तंतु भार को समान रूप से बाँट लेते हैं, और रस्सी को मजबूत बनाने की विधि भी यही है। एड़ी की कंडरा को तो दौड़ते या कूदते समय हर बार आपके शरीर के भार से कई गुना बल सहना पड़ता है, इसीलिए वह शरीर की सबसे मोटी कंडरा है।
स्वयं जाँचिए: ध्यान दीजिए कि अँगुलियों को चलाने वाली पेशी हाथ में नहीं, अग्रबाहु में है। भारी पेशी को दूर रखकर उसका खिंचाव लंबी कंडराओं से पहुँचाना ही हाथ को इतना पतला बनाता है कि वह सूक्ष्म कार्य कर सके — लिखना, वाद्य बजाना, नृत्य की हस्त-मुद्रा बनाना।
प्र3.
किसी भी शारीरिक अभ्यास, जैसे — योग, कबड्डी आदि जिससे आप परिचित हों, पर विचार कीजिए। यह अस्थि और माँसपेशी के स्वास्थ्य में किस प्रकार सहायक है?
उत्तर

कैसे उत्तर दीजिए: कोई एक अभ्यास चुनिए जिसे आप वास्तव में करते हैं, उसमें शरीर क्या करता है यह बताइए, और फिर प्रत्येक गति को इस अध्याय के किसी ऊतक — अस्थि, पेशी, कंडरा, स्नायु, उपास्थि — से जोड़िए।

नमूना उत्तर — कबड्डी। कबड्डी की एक रेड में तेज दौड़, अचानक रुकना, नीची बैठक, मुड़कर बचना और पकड़-छुड़ाना — सब सम्मिलित है।

  • अस्थि। दौड़ने और कूदने से टाँगों की अस्थियों पर बार-बार भार पड़ता है। भार पड़ने पर अस्थि अपनी कैल्सियम-फॉस्फोरस युक्त आधात्री और अधिक निक्षेपित करती है, अतः अस्थियाँ सघन और सुदृढ़ हो जाती हैं।
  • पेशी। बार-बार होने वाला प्रबल संकुचन कंकाल पेशी के तंतुओं को मोटा करता है, अतः खिलाड़ी अधिक बल उत्पन्न करता है और देर से थकता है।
  • संधियाँ और स्नायु। निरंतर दिशा-परिवर्तन घुटने और टखने के स्नायुओं तथा आस-पास की पेशियों को संधि थामे रखने का अभ्यास कराता है, और यही मोच से सबसे अच्छी सुरक्षा है।
  • उपास्थि। गति से संधि के चारों ओर का द्रव संचरित होता रहता है और उपास्थि को पोषण मिलता रहता है — उसकी अपनी रक्त आपूर्ति तो होती ही नहीं।
  • हृदय और फेफड़े। हृदय पेशी अधिक कार्य करती है और श्वास की दर बढ़ती है, जिससे प्रत्येक ऊतक तक ऑक्सीजन की आपूर्ति सुधरती है।

नमूना उत्तर — योग। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में वर्णित योग के अंतर्गत शारीरिक आसन, श्वास और ध्यान सम्मिलित हैं। किसी आसन को रोके रखने में पेशी बिना गति के संकुचित रहती है, जिससे सहनशक्ति बढ़ती है; खिंचाव धीरे-धीरे संधि का परिसर बढ़ाते हैं; भार-वहन करने वाले आसन भुजाओं और मेरुदंड की अस्थियों पर भार डालते हैं; और श्वास-अभ्यास पसली पिंजर के प्रसार को सुधारते हैं, जो पसलियों को उरोस्थि से जोड़ने वाली लचीली उपास्थि के कारण ही संभव है। शोध दर्शाते हैं कि योग लचीलेपन, मुद्रा और श्वसन में सुधार करता है, तनाव कम करता है और जीवनशैली संबंधी रोगों को रोकने में सहायक है।

संकेत: आप जो भी अभ्यास चुनें, उत्तर इस रूप में लिखिए — “यह गति → यह ऊतक → यह परिवर्तन”। यही किसी वर्णन को वैज्ञानिक व्याख्या बना देता है।
प्र4.
किसी बागवानी की विधि, जैसे — छँटाई, रोपण, सिंचाई या फसल चक्रण पर विचार कीजिए। प्रत्येक विधि विभज्योतकों, संवहन ऊतकों या सहायक ऊतकों जैसे पादप ऊतकों के सुचारू रूप से कार्य करने में किस प्रकार सहायक है?
उत्तर

प्रत्येक बागवानी विधि किसी न किसी विशेष ऊतक पर कार्य करती है। विधि को ऊतक से जोड़ते ही कारण स्पष्ट हो जाता है।

विधिजिस ऊतक पर कार्य करती हैकैसे सहायक है
छँटाई / बाड़ की कटाईशीर्षस्थ और अंतर्वेशी विभज्योतकप्ररोह का अग्रभाग हटने से शीर्षस्थ विभज्योतक निकल जाता है, अतः पर्वसंधियों की कलिकाएँ मुक्त होकर अनेक पार्श्व शाखाएँ बनाती हैं — पौधा घना होता है और अधिक फूल देता है
तने की कलम लेनापर्वसंधि का विभज्योतककेवल वही कलम पुनरुद्भवन करती है जिसमें कलिकायुक्त पर्वसंधि हो — ठीक वही परिणाम जो प्रश्न 10 में गन्ने के साथ मिला
रोपण और कलिकायन (ग्राफ्टिंग)स्कंध और कलम-भाग का पार्श्व विभज्योतक (एधा)दोनों कटी सतहें इस प्रकार मिलाई जाती हैं कि उनकी एधा परतें स्पर्श करें; विभाजनशील कोशिकाएँ जुड़ जाती हैं और जाइलम तथा फ्लोएम सतत हो जाते हैं, अतः जल और भोजन जोड़ के आर-पार बहने लगते हैं
सिंचाईजाइलम, मूलरोम और मृदूतकमृदा नम रहती है, अतः मूलरोम जल अवशोषित कर पाते हैं; जाइलम में जल का अखंड स्तंभ और मृदूतक की स्फीति बनी रहती है, जो कोमल तने को सीधा रखती है। अधिक सिंचाई इसके विपरीत मृदा से वायु निकालकर जड़ों का दम घोंट देती है
पलवार (मल्चिंग)मूलरोम और बाह्यत्वचामृदा से वाष्पन धीमा करती है, अतः अवशोषण निर्बाध चलता रहता है और पादप को रंध्र बंद करने पर विवश नहीं होना पड़ता
फसल चक्रण और खाद देनासभी ऊतक — खनिज आपूर्ति के माध्यम सेनाइट्रोजन और अन्य खनिज पुनः लौटाते हैं, जिन्हें जाइलम को ऊपर पहुँचाना होता है। नाइट्रोजन के बिना पादप नई विभज्योतकी कोशिकाओं के लिए प्रोटीन नहीं बना सकता; कैल्सियम के बिना कोशिका भित्ति नहीं बना सकता
युवा पौधे को सहारा देनाश्लेषोतक और दृढ़ोतकजब तक पौधे के अपने सहायक ऊतक विकसित हो रहे हैं, तब तक सहारा उसे तेज हवा में टूटने से बचाता है
सामान्य सूत्र: बागवानी वस्तुतः व्यावहारिक पादप शरीर-रचना है। इनमें से प्रत्येक विधि या तो किसी विभज्योतक की रक्षा करती है, या किसी संवहन ऊतक को अखंड और आपूर्तियुक्त रखती है, या किसी सहायक ऊतक का भार घटाती है।
प्र5.
प्रकृति भ्रमण को एक शोध परियोजना के रूप में रूपांतरित कीजिए। (i) विभिन्न प्रकार की पत्तियों का अवलोकन कीजिए और मरुस्थल, अत्यंत नम या जलीय पर्यावासों जैसे विभिन्न वातावरणों के लिए उनके अनुकूलनों का अध्ययन कीजिए। (ii) विभिन्न प्रकार के पादपों की पत्तियों के संबंध में उनके ज्ञान के लिए समुदाय के किसी वरिष्ठ संसाधक से परामर्श कीजिए — जैसे जो पत्तियाँ लंबे समय तक ताजा रहती हैं, जल का प्रतिकर्षण करती हैं या कीटों को दूर भगाती हैं, उनके पारंपरिक उपयोगों, जैसे — पत्तल बनाना, ठंडी पट्टी (शीतलक) बनाना या कीट प्रतिकर्षी के रूप में उपयोग इत्यादि के विषय में पता लगाइए।
उत्तर

परियोजना के रूप में कैसे कीजिए: अपने आस-पास भिन्न-भिन्न स्थितियों में उगे 8 – 10 पादप चुनिए। प्रत्येक के लिए पर्यावास लिखिए और पत्ती की मोटाई, स्पर्श, चमक (मोमीपन), रोमिलता तथा यह कि वह पतली और तैरती है या मोटी और गूदेदार — सब अभिलेखित कीजिए। प्रत्येक की एक पत्ती दबाकर सुरक्षित रखिए। तत्पश्चात किसी वरिष्ठ व्यक्ति से बातचीत कीजिए और अभिलेख कीजिए कि वह पत्ती पारंपरिक रूप से किस काम आती है और क्यों।

नमूना उत्तर — भाग (i):

पर्यावासउदाहरणक्या दिखाई देता हैऊतक-स्तरीय कारण
मरुस्थल / शुष्कआक, नागफनी, खेजड़ी, घृतकुमारीमोटी, गूदेदार अथवा काँटों में परिवर्तित पत्तियाँ; चमकीली मोमी सतह; प्रायः रोमयुक्त; रंध्र कम और गड्ढों में धँसेबाह्यत्वचा पर बहुत मोटी उपत्वचा वाष्पन घटाती है; गूदेदार पत्ती में जल संचित करने वाला मृदूतक भरा रहता है; रोम स्थिर वायु रोककर जल-हानि धीमी करते हैं
अत्यंत नम / छायादारअरबी (कचालू), केला, फर्नबड़ी, चौड़ी, पतली और कोमल पत्तियाँपतली उपत्वचा और अनेक रंध्र तीव्र वाष्पोत्सर्जन देते हैं; बड़ी सतह छत्र के नीचे उपलब्ध अल्प प्रकाश को ग्रहण करती है
जलीय — तैरतीकमल, जलकुंभीपत्ती जल पर तैरती है, ऊपरी सतह मोमी और जल-प्रतिकर्षी, वृंत स्पंजी और हल्कारंध्र केवल ऊपरी सतह पर; बड़ी वायु गुहिकाओं वाला विशेषीकृत मृदूतक उत्प्लावन देता है — पुस्तक तैरने की व्याख्या इसी प्रकार करती है
जलीय — जलमग्नहाइड्रिला, वैलिसनेरियापतली, फीते जैसी या बारीक विभाजित पत्तियाँ; कोई मोमी चमक नहींउपत्वचा लगभग नहीं और प्रायः रंध्र भी नहीं, क्योंकि गैसें और खनिज पूरी सतह से सीधे अवशोषित होते हैं (देखिए सोचिए और बताइए प्र.2)
लवणीय / तटीयमैंग्रोवमोटी, चर्मिल, प्रायः चमकदार पत्तियाँचारों ओर जल होने पर भी मोटी उपत्वचा जल-हानि रोकती है, क्योंकि वह जल लवणीय है और उसका अवशोषण कठिन है

नमूना उत्तर — भाग (ii), पारंपरिक उपयोग: केले और पलाश की पत्तियों से पत्तल बनाए जाते हैं, क्योंकि वे बड़ी, जल-प्रतिरोधी हैं और गर्म भोजन परोसने पर फटती नहीं; केले की पत्तियाँ कई दिन ताजा भी रहती हैं। ज्वर में शीतलक पट्टी के लिए केले और पान की पत्तियाँ प्रयुक्त होती हैं। संग्रहीत अनाज और वस्त्रों में कीट भगाने के लिए नीम और तुलसी की पत्तियाँ रखी जाती हैं। त्वचा-संक्रमण पर हल्दी और नीम की पत्तियाँ लगाई जाती हैं। अपने वरिष्ठ से पूछिए कि वही पत्ती क्यों — उत्तर प्रायः मोमी उपत्वचा, पत्ती के आमाप और दृढ़ता, अथवा उसके मृदूतक में संचित किसी रसायन में मिलेगा।

संकेत: स्थानीय नाम, यदि मिल सके तो वानस्पतिक नाम, पर्यावास और उपयोग — सब अभिलेखित कीजिए और दबाई हुई पत्ती संलग्न कीजिए। इससे एक भ्रमण एक प्रलेखित क्षेत्र-अध्ययन बन जाता है।
प्र6.
देशभर में विभिन्न आदिवासी जनजातीय समुदायों के विभिन्न नृत्य रूपों का अध्ययन कीजिए। प्रत्येक विद्यार्थी कम-से-कम पाँच मुद्राएँ सीखें और उनका अनुभव लीजिए। इन मुद्राओं को प्रस्तुत करने में सम्मिलित संधि की गतियों का अवलोकन कीजिए और तत्पश्चात संधि की गतियों की अवधारणा पर एक नृत्य या नाटक तैयार कीजिए। इसे विद्यालय के वार्षिकोत्सव में प्रस्तुत कीजिए ताकि विभिन्न कक्षाओं के छात्र इससे सीख सकें।
उत्तर

कैसे तैयार कीजिए: कक्षा को समूहों में बाँटिए, प्रत्येक समूह एक नृत्य रूप ले। पाँच मुद्राएँ सीखिए, फिर प्रत्येक मुद्रा के लिए लिखिए कि उसमें कौन-सी संधियाँ गति करती हैं और प्रत्येक किस प्रकार की संधि है। उसी तालिका को प्रस्तुति की पटकथा बना लीजिए।

नमूना उत्तर — आरंभ करने योग्य गति-विश्लेषण:

नृत्यविशिष्ट मुद्रासक्रिय संधियाँसंधि का प्रकार
बिहू (असम)कमर से तेज झुकाव के साथ कूल्हे का शीघ्र संचालनकूल्हा, कशेरुक दंडकंदुक-खल्लिका; कशेरुकाओं के बीच की उपास्थि चक्रिकाएँ झुकाव और मरोड़ देती हैं
घूमर (राजस्थान)सिर के ऊपर भुजाएँ घुमाते हुए निरंतर चक्करकंधा, टखना, गर्दनकंदुक-खल्लिका; कोर; धुराग्र
संथाल / झूमर (झारखंड)भुजाएँ जोड़कर पंक्ति में बगल की ओर कदम और शरीर का झूलनाकूल्हा, घुटना, कंधाकंदुक-खल्लिका और कोर
भांगड़ा (पंजाब)भुजाएँ ऊपर उछालते हुए ऊँची छलाँगकूल्हा, घुटना, टखना, कंधाकंदुक-खल्लिका; कोर — प्रश्न 4 वाली बैठक और धक्का
चेरॉ / बाँस नृत्य (मिजोरम)ताल पर टकराते बाँसों के बीच से कदम अंदर-बाहर रखनाटखना, घुटना, पैर की अँगुलियों की संधियाँकोर — तीव्र, सटीक, एक तल में

प्रस्तुति की एक व्यावहारिक पटकथा —

  1. एक स्थिर दृश्य से आरंभ; सूत्रधार चारों प्रकार की संधियाँ बताता है।
  2. चार छोटे एकल — कंधे का झूला (कंदुक-खल्लिका), कोहनी-घुटने का क्रम (कोर), सिर घुमाने का क्रम (धुराग्र), और एक विद्यार्थी सिर पर हाथ रखकर बिल्कुल स्थिर (खोपड़ी की अचल संधियाँ)।
  3. सामूहिक भाग, जिसमें प्रत्येक लोक नृत्य प्रस्तुत हो और साथ में तख्ती पर उसमें प्रयुक्त संधियाँ लिखी हों।
  4. अंत में एक लघु दृश्य — पेशियाँ खींचती हैं, कंडराएँ बल पहुँचाती हैं, स्नायु अस्थियों को थामते हैं और मस्तिष्क संकेत भेजता है — जिसमें विद्यार्थी प्रत्येक ऊतक की भूमिका निभाएँ।
संकेत: प्रत्येक तख्ती पर एक ही पंक्ति रखिए, हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में, ताकि दर्शकों में बैठे हर कक्षा के विद्यार्थी नृत्य देखते हुए विज्ञान भी समझ सकें।
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