प्र1.
क्या पादपों की भाँति जंतु कोशिका से एक पूर्ण जंतु प्राप्त करना संभव होगा? यदि हाँ, तो इस विकास के क्या लाभ और चुनौतियाँ होंगी?
उत्तर
आंशिक रूप से हाँ — किंतु किसी साधारण विभेदित काय कोशिका से उतनी सरलता से नहीं, जितनी सरलता से गाजर की फ्लोएम कोशिका से पूरा गाजर का पादप बन जाता है।
अभी क्या संभव है। जंतु की प्रत्येक कोशिका में समग्र आनुवंशिक सूचना उसी प्रकार सुरक्षित है जैसे पादप कोशिका में। दो मार्ग विद्यमान हैं —
- मूल (stem) कोशिकाएँ। अस्थि मज्जा जैसी कोशिकाएँ आज भी विभाजित होकर अनेक प्रकार की कोशिकाएँ बना सकती हैं। इसी कारण अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण ल्यूकेमिया और थैलेसीमिया में कार्य करता है — प्रत्यारोपित मूल कोशिकाएँ रोगी का रक्त पुनः बना देती हैं।
- केंद्रक का स्थानांतरण। यदि किसी काय कोशिका का केंद्रक ऐसी अंड कोशिका में रख दिया जाए जिसका अपना केंद्रक हटा दिया गया हो, तो अंड कोशिका का कोशिकाद्रव्य उस केंद्रक को पुनः इस प्रकार क्रमबद्ध कर देता है कि वह युग्मनज की भाँति व्यवहार करने लगे। उससे एक पूर्ण जंतु विकसित हो सकता है।
लाभ, यदि यह विश्वसनीय रूप से संभव हो जाए —
- क्षतिग्रस्त ऊतक और अंग उगाकर बदले जा सकेंगे — हृदयाघात के बाद हृद पेशी, घिसी संधि की उपास्थि, जलने के बाद त्वचा।
- रोगी की अपनी कोशिकाओं से उगाया अंग शरीर द्वारा अस्वीकृत नहीं किया जाएगा।
- संकटग्रस्त जातियों का संरक्षण और उच्च उत्पादकता वाले पशुधन का गुणन संभव होगा।
- नई औषधियों का परीक्षण जंतुओं के स्थान पर संवर्धित मानव ऊतक पर किया जा सकेगा।
चुनौतियाँ —
- जैविक। विभेदित जंतु कोशिकाएँ अपनी पूर्णशक्तता खो चुकी हैं; उन्हें पुनः क्रमबद्ध करना पड़ता है और यह प्रक्रिया अकुशल है तथा प्रायः विफल होती है। जंतु कोशिका में कोशिका भित्ति नहीं होती और वह पड़ोसी कोशिकाओं के सटीक संकेतों तथा रक्त आपूर्ति पर निर्भर रहती है, जिन्हें पात्र में दोहराया नहीं जा सकता। अनियंत्रित विभाजन कैंसर का रूप ले सकता है।
- व्यावहारिक। जंतु शरीर पादप की तुलना में कहीं अधिक जटिल है — अनेक अंग तंत्रों को सही क्रम में विकसित होकर सही ढंग से जुड़ना होता है।
- नैतिक और सामाजिक। सहमति, इस प्रकार उत्पन्न जंतुओं का कल्याण, व्यय, और ऐसे उपचार तक किसे पहुँच मिलेगी — इन सब पर गंभीर प्रश्न उठते हैं।
पादपों के लिए यह सरल और जंतुओं के लिए कठिन क्यों है: पादप एक स्थान पर स्थिर है और क्षति से भाग नहीं सकता, अतः वह आजीवन साधारण कोशिकाओं से भी अपना कोई भी भाग पुनः बनाने की क्षमता बनाए रखता है। जंतु संकट से हटकर दूर जा सकता है, अतः वह इसके बदले आरंभ में ही निर्धारित शरीर-योजना में निवेश करता है। पूर्णशक्तता वही मूल्य है जो जंतु अपने सुनिश्चित, अत्यंत संगठित शरीर के बदले चुकाते हैं — और उसे उलट पाना ही वह सीमांत है जिसकी ओर यह प्रश्न आपको ले जा रहा है।