प्र1.
अब सोचिए कौन-सा ऊतक आपको क्रिया करने में सहायता करता है? कौन-सा ऊतक आपको ऊष्णता और शीतलता का बोध करने में सक्षम बनाता है? कौन-से ऊतक द्वारा ऑक्सीजन रक्त में प्रविष्ट होती है? कौन-से ऊतक द्वारा शरीर एक साथ जुड़ा रहता है जिस कारण त्वचा उससे अलग नहीं हो पाती?
उत्तर
चार अलग प्रश्न, चार अलग जंतु ऊतक — और हर बार उत्तर उस ऊतक की संरचना में ही छिपा है।
| क्रिया | ऊतक | वह संरचना क्यों उपयुक्त है |
|---|---|---|
| मुट्ठी बंद कीजिए और खोलिए | पेशीय ऊतक | लंबे बेलनाकार पेशी तंतु समांतर पड़े हैं और संकुचित हो सकते हैं; कंकाल पेशी कंडरा द्वारा अस्थि से जुड़ी है, अतः उसका खिंचाव संधि पर गति बन जाता है |
| गर्म या ठंडी वस्तु को स्पर्श कीजिए | तंत्रिका ऊतक | त्वचा के ग्राही संकेत न्यूरॉन को देते हैं; द्रुमिकाएँ उसे ग्रहण करती हैं और लंबा तंत्रिकाक्ष कुछ मिलीसेकंड में मस्तिष्क तक पहुँचा देता है |
| गहरी श्वास लीजिए | उपकला ऊतक | फेफड़े और रक्त वाहिका का आस्तर पतली, चपटी कोशिकाओं की एकल परत है, अतः O₂ के विसरण का मार्ग न्यूनतम रह जाता है |
| त्वचा शरीर से जुड़ी रहती है | संयोजी ऊतक | आधात्री में धँसी कोशिकाएँ त्वचा को नीचे के ऊतकों से बाँधती हैं; इसी परिवार के ऊतक पेशी को अस्थि से (कंडरा) और अस्थि को अस्थि से (स्नायु) जोड़ते हैं |
आँखें झपकाने में तो चारों एक साथ काम करते हैं — तंत्रिका ऊतक संकेत देता है, पेशीय ऊतक पलक हिलाता है, उपकला उसे ढकती है और संयोजी ऊतक सब कुछ यथास्थान बाँधे रखता है।
जंतुओं को चार प्रकार क्यों चाहिए: जंतु शरीर को सतहें ढकनी हैं, भागों को जोड़ना है, गति करनी है और समन्वय करना है। कोई एक ऊतक-अभिकल्प ये चारों नहीं कर सकता, इसीलिए जंतु ऊतक ठीक इन्हीं चार वर्गों में आते हैं — उपकला, संयोजी, पेशीय और तंत्रिका।