कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 4 पाठ्य प्रश्न के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
इस बच्चे द्वारा चलित दूरी कितनी है? मूल स्थिति से उसका विस्थापन कितना है?
उत्तर

चक्रीय झूले पर बैठा बच्चा परिधि के अनुदिश A से B होते हुए C तक जाता है (चित्र 4.22)।

  • चलित दूरी = वृत्त के अनुदिश वास्तव में तय किए गए वक्र ABC की लंबाई।
  • विस्थापन = आरंभिक और अंतिम स्थितियों को मिलाने वाली सरल रेखा AC, जिसकी दिशा A से C की ओर है।

ये दोनों बराबर नहीं हैं — वक्र बाहर की ओर उभरा हुआ है जबकि जीवा सीधी काटती है, अत: वक्र ABC > जीवा AC।

ऐसा क्यों होता है: वृत्ताकार पथ पर वस्तु प्रत्येक क्षण मुड़ रही होती है, इसलिए वह कभी भी सीधे अपने गंतव्य की ओर नहीं चल रही होती। वक्र का हर टुकड़ा उससे मिलने वाली सीधी प्रगति से लंबा होता है। पथ की लंबाई और स्थिति में सकल परिवर्तन के बीच का यही अंतर बताता है कि हमें दूरी और विस्थापन — दो अलग राशियाँ — क्यों चाहिए।
प्र2.
एक परिक्रमा (वृत्त का एक चक्कर) पूर्ण करने में बच्चे द्वारा चलित दूरी कितनी है?
उत्तर

एक पूरी परिक्रमा का अर्थ है परिधि पर एक बार पूरा चक्कर, अत: चलित दूरी वृत्ताकार पथ की परिधि होगी।

एक परिक्रमा में चलित दूरी = 2πR
जहाँ R वृत्ताकार पथ की त्रिज्या है

दूसरी ओर विस्थापन शून्य है, क्योंकि परिक्रमा के अंत में बच्चा ठीक उसी स्थिति पर लौट आता है जहाँ से चला था।

इसी कारण एक परिक्रमा में दोनों माध्य राशियाँ इतनी भिन्न हो जाती हैं। यदि परिक्रमा में T समय लगे तो —

माध्य चाल, vav = 2πR / T   [समीकरण 4.5]
माध्य वेग = विस्थापन / T = 0 / T = 0
स्वयं जाँचिए: R = 2 m के चक्रीय झूले को एक चक्कर में T = 8 s लगें तो vav = 2 × 3.14 × 2 m / 8 s = 12.6 m / 8 s = 1.6 m s⁻¹, जबकि उसी परिक्रमा में माध्य वेग 0 m s⁻¹ है।
प्र3.
एकसमान वृत्तीय गति में चाल तो अचर रहती है किंतु किसी क्षण पर वेग की दिशा के विषय में आपका क्या विचार है? क्या यह परिवर्तित हो रही है?
उत्तर

हाँ, दिशा निरंतर बदलती रहती है — प्रत्येक क्षण। किसी बिंदु पर वेग उस बिंदु पर खींची गई स्पर्श रेखा के अनुदिश, गति की दिशा में होता है, और वृत्त पर आगे बढ़ने के साथ स्पर्श रेखा घूमती जाती है।

पुस्तक का आयताकार और षट्भुजाकार पथ वाला तर्क (चित्र 4.23) यही दिखाता है। आयत पर धावक एक चक्कर में 4 बार दिशा बदलता है, षट्भुज पर 6 बार। भुजाओं की संख्या बढ़ाते जाइए तो मोड़ अधिक बार और हर बार छोटे आते जाएँगे। अंतत: पथ वृत्त बन जाता है — प्रत्येक भुजा एक बिंदु में सिमट जाती है और मुड़ना कभी रुकता ही नहीं।

ऐसा क्यों होता है: वेग केवल संख्या नहीं, परिमाण और दिशा है। इनमें से किसी एक का बदलना भी वेग का बदलना है, और बदलता वेग अर्थात शून्येतर त्वरण। अत: एकसमान वृत्तीय गति त्वरित गति है, भले ही चालमापी का पाठ्यांक कभी हिले ही नहीं। दैनिक जीवन में हम वाहन को तभी "त्वरणशील" कहते हैं जब उसकी चाल बदले, और इसीलिए वृत्तीय मोड़ पर अचर चाल से मुड़ती कार का त्वरण हमें दिखाई ही नहीं देता।
स्वयं जाँचिए: क्रियाकलाप 4.5 स्पर्श रेखा को दृश्य बना देता है। कंचे के घूमते समय छल्ला उठा लीजिए — कंचा सरल रेखा में निकल जाता है, ठीक उसी स्पर्श रेखा के अनुदिश जो मुक्त होने के क्षण उसके वेग की दिशा थी।
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