हाँ, दिशा निरंतर बदलती रहती है — प्रत्येक क्षण। किसी बिंदु पर वेग उस बिंदु पर खींची गई स्पर्श रेखा के अनुदिश, गति की दिशा में होता है, और वृत्त पर आगे बढ़ने के साथ स्पर्श रेखा घूमती जाती है।
पुस्तक का आयताकार और षट्भुजाकार पथ वाला तर्क (चित्र 4.23) यही दिखाता है। आयत पर धावक एक चक्कर में 4 बार दिशा बदलता है, षट्भुज पर 6 बार। भुजाओं की संख्या बढ़ाते जाइए तो मोड़ अधिक बार और हर बार छोटे आते जाएँगे। अंतत: पथ वृत्त बन जाता है — प्रत्येक भुजा एक बिंदु में सिमट जाती है और मुड़ना कभी रुकता ही नहीं।
ऐसा क्यों होता है: वेग केवल संख्या नहीं, परिमाण और दिशा है। इनमें से किसी एक का बदलना भी वेग का बदलना है, और बदलता वेग अर्थात शून्येतर त्वरण। अत: एकसमान वृत्तीय गति त्वरित गति है, भले ही चालमापी का पाठ्यांक कभी हिले ही नहीं। दैनिक जीवन में हम वाहन को तभी "त्वरणशील" कहते हैं जब उसकी चाल बदले, और इसीलिए वृत्तीय मोड़ पर अचर चाल से मुड़ती कार का त्वरण हमें दिखाई ही नहीं देता।
स्वयं जाँचिए: क्रियाकलाप 4.5 स्पर्श रेखा को दृश्य बना देता है। कंचे के घूमते समय छल्ला उठा लीजिए — कंचा सरल रेखा में निकल जाता है, ठीक उसी स्पर्श रेखा के अनुदिश जो मुक्त होने के क्षण उसके वेग की दिशा थी।