कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 4 क्रियाकलाप 4.5 के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
एक छल्ला, जैसे कि आसंजक टेप का खाली रोल, तथा एक कंचा लीजिए।
उत्तर

दृढ़ और कुछ चौड़ा छल्ला लीजिए — आसंजक टेप के रोल का खाली गत्ते वाला भाग सबसे उपयुक्त है — और एक चिकना काँच का कंचा जो उसके भीतर सरलता से लुढ़क सके।

सुझाव: चौड़ा छल्ला लंबा वृत्ताकार पथ देता है, अत: कंचा प्रति सेकंड कम चक्कर लगाता है और आप उसकी गति की दिशा आँखों से देख पाते हैं। छल्ले की भीतरी दीवार चिकनी होना भी आवश्यक है — खुरदरी दीवार कंचे को बार-बार धक्का देती रहेगी और "वृत्तीय" गति डगमगा जाएगी।
प्र2.
छल्ले को एक चिकनी सतह पर लिटाकर रखिए और कंचे को छल्ले के भीतर इस प्रकार प्रक्षेपित कीजिए कि यह इसकी आंतरिक परिसीमा के अनुदिश घूमने लगे (चित्र 4.24)।
उत्तर

छल्ले को चिकनी मेज़ या फ़र्श पर सपाट रखिए और कंचे को भीतरी दीवार के अनुदिश उछालिए, केंद्र की ओर नहीं — जिससे वह परिसीमा से सटकर चक्कर लगाने लगे।

ऐसा क्यों होता है: अपने आप छोड़ दिया जाए तो कंचा सरल रेखा में लुढ़केगा। वह चक्कर केवल इसलिए लगाता है कि छल्ले की भीतरी दीवार उसे लगातार भीतर की ओर धकेलती रहती है और उसका पथ निरंतर मोड़ती रहती है। दीवार का यही भीतरी धक्का सरल रेखीय गति को वृत्तीय गति में बदलता है — और छल्ला उठाते ही यही धक्का समाप्त हो जाएगा।
सुझाव: सतह का चिकना होना महत्त्वपूर्ण है। खुरदरे फ़र्श पर घर्षण कंचे को शीघ्र धीमा कर देता है, चाल अचर नहीं रहती और गति एकसमान वृत्तीय गति नहीं रह जाती।
प्र3.
पूर्वानुमान कीजिए कि जब कंचा गति की अवस्था में हो और हम छल्ले को ऊपर उठा लें, तो क्या होगा?
उत्तर

पूर्वानुमान: कंचा मुड़ना बंद कर देगा और सरल रेखा में निकल जाएगा — उसी बिंदु पर खींची गई स्पर्श रेखा के अनुदिश जहाँ वह छल्ला उठने के क्षण था।

वह न तो चक्कर लगाता रहेगा, और न ही केंद्र से बाहर की ओर त्रिज्या के अनुदिश उड़ेगा। परीक्षण से पहले अपना पूर्वानुमान लिख लीजिए।

ऐसा क्यों होता है: प्रत्येक क्षण कंचे का वेग पहले से ही स्पर्श रेखा के अनुदिश है — वह वास्तव में उसी दिशा में चल रहा है। दीवार केवल उस वेग की दिशा को मोड़े जा रही थी। दीवार हटते ही दिशा बदलने वाला कुछ बचता ही नहीं, अत: कंचा उसी दिशा में चलता रहता है जिसमें वह उस क्षण चल रहा था।
प्र4.
अब कंचे द्वारा एक या दो चक्कर पूरे कर लेने के पश्चात बिना इसकी गति को बाधित किए, छल्ले को ऊपर उठा लीजिए। आप क्या अवलोकन करते हैं? क्या कंचा अपनी वृत्ताकार गति बनाए रखता है? या यह किसी अन्य ढंग से गति करने लगता है?
उत्तर

अवलोकन: कंचा तुरंत वृत्त छोड़ देता है और सरल रेखा में लुढ़कता चला जाता है। वह वृत्तीय गति नहीं बनाए रखता।

वह जिस सरल रेखा पर जाता है, वह ठीक उसी बिंदु पर वृत्त की स्पर्श रेखा है जहाँ कंचा छल्ला उठाते समय था — अत: क्रियाकलाप दोहरा कर किसी दूसरे बिंदु पर छल्ला उठाइए तो कंचा किसी दूसरी दिशा में निकलेगा।

ऐसा क्यों होता है: मुक्त होते ही कंचा उसी दिशा में चलता रहता है जिसमें वह उस क्षण चल रहा था, और अब कोई दीवार उसे बग़ल से धकेल नहीं रही, इसलिए दिशा बदलने का कोई कारण नहीं बचता। इससे दो बातें एक साथ पुष्ट होती हैं — (क) वृत्तीय गति में वेग स्पर्श रेखा के अनुदिश होता है, और (ख) वृत्तीय गति बनाए रखने के लिए पथ को निरंतर मोड़ने वाली किसी वस्तु का होना आवश्यक है। (ख) का कारण आप आगे के अध्याय में जानेंगे।
प्र5.
परिणाम की पुष्टि के लिए इस क्रियाकलाप को अनेक बार दोहराइए।
उत्तर

कम से कम चार-पाँच बार कीजिए, हर बार वृत्त के स्पष्टत: भिन्न बिंदु पर छल्ला उठाइए, और कंचे के निकलने की दिशा अंकित कर लीजिए या नोट कर लीजिए।

हर बार वही निष्कर्ष मिलना चाहिए — सरल रेखा में निकलना, और सदैव मुक्ति-बिंदु पर खींची गई स्पर्श रेखा के अनुदिश।

ऐसा क्यों होता है: एक ही प्रयास संयोग हो सकता है — कंचे को धक्का लग गया हो या सतह ढलवाँ हो। मुक्ति-बिंदु जान-बूझकर बदल कर दोहराने से हम नियम की जाँच करते हैं, किसी एक उदाहरण की नहीं। यदि कंचा त्रिज्या के अनुदिश निकलता या मुड़ता रहता, तो स्पर्श रेखा वाला स्पष्टीकरण ग़लत सिद्ध हो जाता। ऐसा कभी नहीं होता — इसीलिए निष्कर्ष विश्वसनीय है।
स्वयं जाँचिए: यदि चक्करों के दौरान कंचा स्पष्ट रूप से धीमा पड़ता दिखे तो आपकी सतह पर्याप्त चिकनी नहीं है — काँच की मेज़ या भली प्रकार पॉलिश किए फ़र्श पर कीजिए, ताकि वृत्तीय गति एकसमान के निकट रहे।
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