प्र1.
क्या आप दैनिक जीवन में प्रयुक्त स्कंदन प्रक्रियाओं के अन्य उदाहरणों पर विचार कर सकते हैं?
उत्तर
हाँ — स्कंदन रसोई में, जलकल में और स्वयं आपके शरीर में भी कार्य करता है।
| दैनिक प्रक्रिया | प्रयुक्त स्कंदक | क्या गुच्छे बनाता है |
|---|---|---|
| दुग्ध से पनीर अथवा छेना बनाना | नींबू का रस अथवा सिरका (अम्ल) | दुग्ध के प्रोटीन गुच्छे बनाकर मट्ठे से पृथक हो जाते हैं |
| दुग्ध से दही जमाना | जामन के जीवाणुओं द्वारा बना लैक्टिक अम्ल | दुग्ध के प्रोटीन मृदु ठोस जाल बना लेते हैं |
| जलकल में पेयजल का शुद्धिकरण | फिटकरी | महीन मृत्तिका और गाद के कण बैठने योग्य गुच्छे बनाते हैं |
| वाहित मल उपचार | फिटकरी अथवा अन्य स्कंदक | निलंबित ठोस निस्यंदन से पहले ही बैठ जाते हैं |
| कटने पर रक्त का जमना | शरीर के अपने स्कंदन-प्रोटीन | रक्त कणिकाएँ रेशों के जाल में फँसकर घाव बंद कर देती हैं |
| पकाते समय अंडे का जमना | ऊष्मा | अंडे के प्रोटीन गुच्छे बनकर ठोस सफेदी बना देते हैं |
स्कंदक की आवश्यकता क्यों: पंकिल जल के सूक्ष्म कण सब एक ही प्रकार का विद्युत आवेश धारण करते हैं, अतः वे परस्पर प्रतिकर्षित होकर अलग-अलग और निलंबित बने रहते हैं। स्कंदक इस आवेश को उदासीन कर देता है। प्रतिकर्षण समाप्त होते ही टकराने वाले कण उछलकर अलग होने के बजाय चिपक जाते हैं और इतने बड़े गुच्छे बना लेते हैं कि गुरुत्व उन्हें नीचे खींच सके। दुग्ध में यही काम अम्ल करता है: नींबू का रस प्रोटीन कणों का पृष्ठ बदल देता है जिससे वे प्रतिकर्षण छोड़कर पनीर के रूप में जम जाते हैं।