नहीं। परमाणु को और भी सूक्ष्म कणों में विभाजित किया जा सकता है, अतः यह अविभाज्य नहीं है।
अविभाज्यता का विचार दर्शन से आया था, प्रयोग से नहीं — आचार्य कणाद का परमाणु तथा ग्रीक एटोमॉस (जिसका अर्थ ही है 'अविभाज्य')। डाल्टन ने वर्ष 1808 में भी यही मान्यता रखी। प्रयोगों ने इसे तोड़ा —
- रेडियोधर्मिता — कुछ तत्व स्वयं ही अदृश्य ऊर्जा एवं कण उत्सर्जित करते पाए गए। अर्थात परमाणु में से कुछ बाहर आ रहा था।
- कैथोड किरणें (टॉमसन, 1897) — कैथोड से ऋणावेशित कणों की धारा निकलती है जिनका द्रव्यमान परमाणु से बहुत कम है, और यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि कैथोड किस धातु का है अथवा नली में कौन-सी गैस भरी है। ये कण इलेक्ट्रॉन थे, जो प्रत्येक परमाणु में उपस्थित हैं।
आज हम जानते हैं कि परमाणु में तीन अवपरमाणुक कण होते हैं — इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन — तथा प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन की भी अपनी आंतरिक संरचना होती है।