परिकल्पना: अभिक्रिया Zn + 2 HCl → ZnCl₂ + H₂ में अभिक्रिया के पश्चात कुल द्रव्यमान वही रहेगा जो पूर्व था, बशर्ते कोई भी हाइड्रोजन बाहर न निकलने पाए।
अभिकल्पना की मुख्य समस्या। हाइड्रोजन सभी गैसों में सबसे हल्की है और बहुत तेज़ी से निकलती है। अतः पूरा प्रयोग एक ही बात पर टिका है — निकाय बंद होना चाहिए, और वह जिंक के अम्ल को छूने से पहले बंद होना चाहिए।
उपकरण: 250 mL शंक्वाकार फ्लास्क, उसमें समा जाने वाली एक छोटी परखनली, गुब्बारा एवं धागा, दानेदार जिंक, तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा 0.01 g तक पढ़ने वाली अंकीय तुला।
विधि
- शंक्वाकार फ्लास्क में लगभग 25 mL तनु HCl लीजिए।
- छोटी परखनली में लगभग 1.3 g दानेदार जिंक लीजिए और परखनली को सीधा फ्लास्क के भीतर उतार दीजिए, जिससे जिंक अभी अम्ल में न गिरे।
- फ्लास्क के मुँह पर गुब्बारा चढ़ाकर धागे से कसकर बाँध दीजिए।
- इस पूरे बंद निकाय को तुला पर रखिए और आरंभिक पाठ्यांक m₁ अभिलेखित कीजिए।
- फ्लास्क को पलड़े से उठाए बिना तिरछा कीजिए जिससे परखनली लुढ़क जाए और जिंक अम्ल में गिर जाए। तुरंत बुलबुले उठने लगते हैं और गुब्बारा फूलने लगता है।
- बुदबुदाहट पूर्णतः रुक जाने तक प्रतीक्षा कीजिए, फिर अंतिम पाठ्यांक m₂ अभिलेखित कीजिए।
- पूरे प्रयोग को तीन बार दोहराइए।
1.3 g जिंक ही क्यों? क्योंकि उत्पन्न हाइड्रोजन इतनी अवश्य होनी चाहिए कि तुला उसे पकड़ सके।
Zn + 2 HCl → ZnCl₂ + H₂
65 u Zn से 2 u H₂ प्राप्त होती है
1.3 g Zn से प्राप्त H₂ का द्रव्यमान = 1.3 g × 2 ÷ 65 = 0.04 g
यह तुला की 0.01 g की सूक्ष्मग्राहिता का चार गुना है, अतः खुले फ्लास्क वाले नियंत्रण प्रयोग में स्पष्ट कमी पढ़ी जा सकेगी। समीकरण का द्रव्यमान संतुलन भी जाँच लीजिए —
उत्पाद : 136 u (ZnCl₂) + 2 u (H₂) = 138 u ✓
अपेक्षित परिणाम
| प्रयास | आरंभिक पाठ्यांक m₁ | अंतिम पाठ्यांक m₂ | m₂ − m₁ |
|---|---|---|---|
| 1 (बंद) | 176.42 g | 176.42 g | 0.00 g |
| 2 (बंद) | 178.05 g | 178.04 g | −0.01 g |
| 3 (खुला — नियंत्रण) | 175.90 g | 175.86 g | −0.04 g |
निष्कर्ष: बंद निकाय वाले प्रयासों में m₂ = m₁ रहा, वह भी ±0.01 g के भीतर — अर्थात अंतिम अंक की अनिश्चितता के भीतर। अतः द्रव्यमान संरक्षित रहता है। खुले नियंत्रण प्रयास में 0.04 g की कमी आई, जो हाइड्रोजन के परिकलित द्रव्यमान के ठीक बराबर है — इससे सिद्ध होता है कि खुले पात्र में होने वाली ‘हानि’ पलड़े से गैस के चले जाने की हानि है, ब्रह्मांड से द्रव्य के लोप की नहीं।