कक्षा ९ गणित अध्याय 1 अंतिम प्रश्नावली के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
दोनों अक्षों के प्रतिच्छेद बिंदु के x-निर्देशांक और y-निर्देशांक क्या होंगे?
उत्तर

दोनों अक्ष मूलबिंदु पर मिलते हैं।

x-निर्देशांक = 0, y-निर्देशांक = 0
यह बिंदु O (0, 0) है
ऐसा क्यों होता है: प्रतिच्छेद बिंदु y-अक्ष पर स्थित है, अत: y-अक्ष से उसकी लंबवत दूरी 0 है, जिससे x = 0। वह x-अक्ष पर भी स्थित है, अत: y = 0। ये दोनों शर्तें मिलकर एक ही बिंदु निश्चित कर देती हैं — केवल (0, 0) ही दोनों को संतुष्ट करता है। इसीलिए दो प्रतिच्छेदी रेखाओं में ठीक एक ही उभयनिष्ठ बिंदु होता है।
प्र2.
बिंदु W का x-निर्देशांक −5 है। क्या आप उस बिंदु H के निर्देशांकों को ज्ञात कर सकते हैं जो W से होकर जाती हुई y-अक्ष के सामानांतर रेखा पर स्थित हो? बिंदु H किन चतुर्थांशों में स्थित हो सकता है?
उत्तर
H = (−5, k), जहाँ k कोई भी वास्तविक संख्या हो सकती है
x-निर्देशांक क्यों निश्चित है: y-अक्ष के समानांतर रेखा एक ऊर्ध्व रेखा होती है। उस पर स्थित प्रत्येक बिंदु y-अक्ष से समान लंबवत दूरी पर और एक ही ओर होता है, अत: उस पर के प्रत्येक बिंदु का x-निर्देशांक एक ही होगा। W का x = −5 है, अत: वह पूरी रेखा x = −5 है और H का x भी वही होगा। किंतु उसका y-निर्देशांक पूर्णत: स्वतंत्र है — रेखा पर ऊपर या नीचे जाने से y-अक्ष से दूरी में कोई परिवर्तन नहीं होता।

चतुर्थांश: चूँकि x = −5 ऋणात्मक है, H, y-अक्ष के बाईं ओर ही होगा। अत:—

k का मानबिंदुस्थिति
k > 0(−5, k)द्वितीय चतुर्थांश
k = 0(−5, 0)x-अक्ष पर, किसी चतुर्थांश में नहीं
k < 0(−5, k)तृतीय चतुर्थांश

अत: H केवल द्वितीय अथवा तृतीय चतुर्थांश में हो सकता है — प्रथम या चतुर्थ में कभी नहीं, क्योंकि उनके लिए x-निर्देशांक धनात्मक चाहिए।

संकेत: x = −5 उसी ऊर्ध्व रेखा का समीकरण है। कक्षा 10 में आप ऐसे समीकरणों से बार-बार मिलेंगे; उसका आरंभ यहीं होता है, जहाँ एक निर्देशांक स्थिर रखा जाता है और दूसरा स्वतंत्र रहता है।
प्र3.
बिंदु R (3, 0), A (0, −2), M (−5, −2) तथा P (−5, 2) पर विचार कीजिए। यदि वे इसी क्रम में मिलाए गए हैं तो अनुमान लगाइए— (i) RAMP की दो भुजाएँ जो परस्पर लंबवत हैं। (ii) RAMP की वह भुजा जो किसी एक अक्ष के समानांतर है। (iii) दो बिंदु जो एक अक्ष में एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब हैं। यह अक्ष कौन-सा होगा? अब बिंदुओं को अंकित कीजिए और अपने अनुमान को सत्यापित कीजिए।
उत्तर

पहले केवल निर्देशांक पढ़कर अनुमान लगाइए।

(i) AM और MP परस्पर लंबवत हैं।

A (0, −2) और M (−5, −2) का y = −2 समान → AM क्षैतिज है
M (−5, −2) और P (−5, 2) का x = −5 समान → MP ऊर्ध्व है
क्षैतिज ⊥ ऊर्ध्व → AM ⊥ MP, समकोण M पर है

(ii) AM, x-अक्ष के समानांतर है (दोनों सिरों का y = −2)। MP, y-अक्ष के समानांतर है, अत: कोई भी एक उत्तर स्वीकार्य है; शेष दो भुजाएँ RA और PR किसी भी अक्ष के समानांतर नहीं हैं।

(iii) M (−5, −2) और P (−5, 2), x-अक्ष में एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब हैं।

x-निर्देशांक समान, y-निर्देशांक विपरीत: −2 और +2
x-अक्ष में परावर्तन (x, y) को (x, −y) पर भेजता है → M ↔ P ✓
xy-6-4-224-4-224R (3, 0)A (0, −2)M (−5, −2)P (−5, 2)
चतुर्भुज RAMP। AM क्षैतिज है और MP ऊर्ध्व, अत: M पर कोण समकोण है; M और P, x-अक्ष में दर्पण प्रतिबिंब हैं।

गणना द्वारा सत्यापन—

RA = √((0 − 3)² + (−2 − 0)²) = √(9 + 4) = √13
AM = |−5 − 0| = 5
MP = |2 − (−2)| = 4
PR = √((3 − (−5))² + (0 − 2)²) = √(64 + 4) = √68 = 2√17

M पर समकोण: M→A का विस्थापन (5, 0) और M→P का विस्थापन (0, 4) है। एक पूर्णत: क्षैतिज है और दूसरा पूर्णत: ऊर्ध्व, अत: वे 90° पर मिलते हैं।
अनुमान बिना आरेख के कैसे लग गए: y-निर्देशांक का समान होना ही किसी रेखाखंड के क्षैतिज होने की शर्त है; x-निर्देशांक का समान होना ऊर्ध्व होने की शर्त है। समान x और विपरीत y होना ठीक x-अक्ष में परावर्तन है। प्रत्येक ज्यामितीय गुण का एक सटीक संख्यात्मक चिह्न है — निर्देशांक ज्यामिति का यही लाभ है।
क्या आप जानते हैं? RAMP आयत नहीं है, यद्यपि उसमें एक समकोण है — RA = √13 और PR = 2√17 असमान हैं और दोनों किसी अक्ष के समानांतर भी नहीं हैं। केवल एक समकोण पर्याप्त नहीं होता।
प्र4.
कार्तीय तल पर बिंदु Z (5, −6) का अंकन कीजिए। एक समकोण त्रिभुज IZN की रचना कीजिए और तीनों भुजाओं की लंबाइयाँ ज्ञात कीजिए। (टिप्पणी— आपके उत्तरों में अंतर हो सकता है।)
उत्तर

Z (5, −6) चतुर्थ चतुर्थांश में है — O से 5 दाईं ओर, फिर 6 नीचे। Z पर समकोण सुनिश्चित करने का सरलतम उपाय यह है कि एक शीर्ष ठीक उसके ऊपर और दूसरा ठीक उसके बगल में लिया जाए।

I = (5, −2) लीजिए — x, Z के समान है, अत: ZI ऊर्ध्व है
N = (8, −6) लीजिए — y, Z के समान है, अत: ZN क्षैतिज है
→ ∡IZN = 90°
xy246810-8-6-4-2I (5, −2)Z (5, −6)N (8, −6)435
Z पर समकोण वाला समकोण त्रिभुज IZN। भुजाएँ अक्षों के समानांतर चुनी गई हैं, अत: उनकी लंबाइयाँ सरल अंतर हैं।
ZI = |−2 − (−6)| = 4 इकाई
ZN = |8 − 5| = 3 इकाई
IN = √((8 − 5)² + (−6 − (−2))²) = √(9 + 16) = √25 = 5 इकाई

जाँच: ZN² + ZI² = 9 + 16 = 25 = IN² ✓
यह रचना सदैव क्यों सफल होती है: एक भुजा ऊर्ध्व और दूसरी क्षैतिज लेने से समकोण निश्चित हो जाता है, क्योंकि दोनों अक्ष-दिशाएँ परिभाषा से परस्पर लंबवत हैं। साथ ही दोनों भुजाओं की लंबाइयाँ सरल घटाव बन जाती हैं और केवल कर्ण के लिए प्रमेय की आवश्यकता पड़ती है। 3 और 4 की भुजाएँ जान-बूझकर चुनने से कर्ण पूर्ण संख्या 5 निकल आता है।
यह कीजिए: आपके I और N संभवत: इनसे भिन्न होंगे — प्रश्न में ऐसा कहा भी गया है। अपने त्रिभुज की जाँच इसी प्रकार कीजिए: देखिए कि दो छोटी भुजाओं के वर्गों का योग सबसे बड़ी भुजा के वर्ग के बराबर है या नहीं। यदि नहीं, तो आपका त्रिभुज समकोण नहीं है।
प्र5.
यदि ऋणात्मक संख्याएँ नहीं होतीं तो निर्देशांक पद्धति कैसी होती? क्या इस पद्धति से द्वि-विमीय तल में सभी बिंदुओं को अंकित किया जा सकता था?
उत्तर

नहीं। ऋणात्मक संख्याओं के बिना केवल तल के एक चौथाई भाग को ही नाम दिया जा सकता था।

केवल x ≥ 0 और y ≥ 0 ही लिखे जा सकते → केवल प्रथम चतुर्थांश शेष रहता
अक्ष पूरी रेखाओं के स्थान पर O से निकलती दो किरणें बन जाते
द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ चतुर्थांश के किसी बिंदु का कोई पता ही न होता
यह पद्धति क्यों विफल हो जाती: प्रत्येक निर्देशांक को विस्थापन के विषय में दो बातें अंकित करनी होती हैं — कितना, और दो विपरीत दिशाओं में से किस ओर। चिह्नरहित संख्या केवल परिमाण अंकित करती है। अत: (3, 2) और (−3, 2) दोनों का पता ‘3, 2’ ही रह जाता और एक ही पता दो भिन्न बिंदुओं का नाम बन जाता। तब बिंदुओं और संख्या-युग्मों के बीच का एकैकी संबंध टूट जाता, और वही संबंध तो पूरी निर्देशांक पद्धति का मूल है। चिह्न ही एक संख्या को परिमाण के साथ दिशा भी वहन करने योग्य बनाते हैं।

आप शब्दों में ‘3 बाईं ओर, 2 ऊपर’ लिखकर काम चला सकते हैं — किंतु तब ‘बाईं ओर’ ठीक वही कार्य कर रहा है जो ऋण चिह्न करता, और बीजगणित की सरलता समाप्त हो जाती है। उदाहरणार्थ दूरी सूत्र इसीलिए चलता है क्योंकि x2x1 एक चिह्न-सहित संख्या है जिसका वर्ग किया जाता है।

क्या आप जानते हैं? अध्याय इसी संबंध से आरंभ होता है। ब्रह्मगुप्त (लगभग 628 सामान्य संवत) ने सर्वप्रथम शून्य और ऋणात्मक संख्याओं को वास्तविक बीजगणितीय इकाइयों के रूप में स्वीकार किया। उनके कार्य के बिना इस अध्याय का चार-चतुर्थांशी तल संभव ही नहीं होता — स्वयं देकार्त ने भी आरंभ में प्राय: प्रथम चतुर्थांश में ही कार्य किया था।
प्र6.
क्या बिंदु M (−3, −4), A (0, 0) और G (6, 8) एक ही सरल रेखा पर हैं? बिंदुओं के अंकन के बिना और बिंदुओं को जोड़े बिना एक विधि बताइए, जिसके माध्यम से हम इसका परीक्षण कर सकें।
उत्तर

हाँ, M, A और G संरेख हैं और A, M तथा G के बीच में स्थित है।

विधि 1 — विस्थापनों की तुलना। प्रत्येक चरण में क्षैतिज और ऊर्ध्व गति पढ़ लीजिए—

M → A: विस्थापन = (0 − (−3), 0 − (−4)) = (3, 4)
A → G: विस्थापन = (6 − 0, 8 − 0) = (6, 8) = 2 × (3, 4)
ऊर्ध्व विस्थापन ÷ क्षैतिज विस्थापन: पहले चरण में 4/3, दूसरे में 8/6 = 4/3 → समान
→ दिशा कहीं नहीं बदली → तीनों बिंदु एक ही रेखा पर हैं

विधि 2 — दूरियों का उपयोग। तीन बिंदु ठीक तभी संरेख होते हैं जब तीनों दूरियों में सबसे बड़ी शेष दो के योग के बराबर हो—

MA = √(3² + 4²) = √25 = 5
AG = √(6² + 8²) = √100 = 10
MG = √((6 − (−3))² + (8 − (−4))²) = √(81 + 144) = √225 = 15
MA + AG = 5 + 10 = 15 = MG ✓ → संरेख
दूरी वाला परीक्षण क्यों चलता है: यदि M, A, G किसी वास्तविक त्रिभुज के शीर्ष होते तो त्रिभुज असमिका से MA + AG > MG निश्चित रूप से होता। समानता तभी संभव है जब त्रिभुज सिकुड़ चुका हो, अर्थात A रेखाखंड MG पर ही स्थित हो। अत: MA + AG = MG की जाँच एक पूर्ण परीक्षण है और इसके लिए आरेख की आवश्यकता नहीं।
विस्थापन वाला परीक्षण क्यों चलता है: सरल रेखा पर चलते हुए ऊर्ध्व वृद्धि और क्षैतिज वृद्धि का अनुपात स्थिर रहता है — निर्देशांकों में ‘सरल’ का अर्थ ही यही है। यदि अनुपात एक चरण से दूसरे चरण में बदल जाए तो पथ मुड़ गया है। विधि 1 प्राय: तीव्र है, क्योंकि इसमें वर्गमूल लगते ही नहीं।
संकेत: विधि 1 में भाग देने के स्थान पर तिर्यक गुणा कीजिए, जिससे सब पूर्ण संख्याओं में रहे: 4 × 6 = 24 और 3 × 8 = 24, बराबर, अत: संरेख। इससे क्षैतिज विस्थापन के शून्य होने की स्थिति में भी कठिनाई नहीं आती।
प्र7.
अपनी विधि (प्रश्न 6 से) का उपयोग करते हुए यह परीक्षण कीजिए कि क्या बिंदु R (−5, −1), B (−2, −5) और C (4, −12) एक ही सरल रेखा पर हैं। अब बिंदुओं के दोनों समूहों को अंकित कीजिए और अपने उत्तरों की जाँच कीजिए।
उत्तर

नहीं — R, B और C संरेख नहीं हैं, यद्यपि वे इसके अत्यंत निकट हैं।

R → B: विस्थापन = (−2 − (−5), −5 − (−1)) = (3, −4)
B → C: विस्थापन = (4 − (−2), −12 − (−5)) = (6, −7)

3 : −4 और 6 : −7 की तुलना तिर्यक गुणा से—
3 × (−7) = −21  और  (−4) × 6 = −24
−21 ≠ −24 → B पर दिशा बदल जाती है → संरेख नहीं

दूरी वाला परीक्षण भी यही कहता है, किंतु बहुत थोड़े अंतर से—

RB = √(3² + 4²) = √25 = 5
BC = √(6² + 7²) = √85 ≈ 9.2195
RC = √(9² + 11²) = √(81 + 121) = √202 ≈ 14.2127
RB + BC ≈ 14.2195, जबकि RC ≈ 14.2127
अंतर ≈ 0.007 इकाई — अल्प है, किंतु शून्य नहीं → संरेख नहीं
यहाँ अंकन से निर्णय क्यों नहीं हो सकता: 1 से.मी. = 1 इकाई के पैमाने पर B पर बना मोड़ लगभग 0.07 मि.मी. का है — आपकी पेंसिल की रेखा से भी पतला। तीनों बिंदु अंकित कीजिए और वे बिलकुल एक सरल रेखा जैसे ही दिखेंगे। इन दोनों प्रश्नों का वास्तविक पाठ यही है: प्रश्न 6 में बीजगणित ने आरेख की पुष्टि की थी, किंतु यहाँ आरेख आपको भ्रमित कर देता। सटीक परीक्षण चित्र से श्रेष्ठ है।
स्वयं जाँचिए: यदि C के स्थान पर (4, −13) होता तो दूसरा विस्थापन (6, −8) = 2 × (3, −4) होता और तीनों बिंदु संरेख होते। केवल एक निर्देशांक में एक इकाई का अंतर निर्णय बदल देता है — और आँख उसे देख नहीं सकती।
प्र8.
मूलबिंदु को एक शीर्ष के रूप में उपयोग करते हुए, निम्नलिखित के शीर्षों को अंकित कीजिए — (i) एक समकोण समद्विबाहु त्रिभुज (ii) एक ऐसा समद्विबाहु त्रिभुज जिसका एक शीर्ष तृतीय चतुर्थांश में और अन्य शीर्ष चतुर्थ चतुर्थांश में हो।
उत्तर

उत्तर भिन्न हो सकते हैं। दो सुविधाजनक चयन—

xy-4-224-4-224O(4, 0)(0, 4)(−3, −4)(3, −4)समकोण समद्विबाहुसमद्विबाहु
O पर एक शीर्ष वाले दो त्रिभुज। नीले रंग में समकोण समद्विबाहु त्रिभुज, जिसकी दोनों भुजाएँ अक्षों पर हैं; हरे रंग में तृतीय और चतुर्थ चतुर्थांश में फैला समद्विबाहु त्रिभुज।

(i) समकोण समद्विबाहु त्रिभुज: O (0, 0), (4, 0), (0, 4)।

एक भुजा x-अक्ष पर: लंबाई |4 − 0| = 4
एक भुजा y-अक्ष पर: लंबाई |4 − 0| = 4 → बराबर → समद्विबाहु
अक्ष परस्पर लंबवत हैं → O पर कोण 90° → समकोण
कर्ण = √(4² + 4²) = √32 = 4√2 ≈ 5.66 इकाई

(ii) तृतीय और चतुर्थ चतुर्थांश में एक-एक शीर्ष वाला समद्विबाहु त्रिभुज: O (0, 0), U (−3, −4), V (3, −4)।

U (−3, −4) के चिह्न (−, −) → तृतीय चतुर्थांश ✓
V (3, −4) के चिह्न (+, −) → चतुर्थ चतुर्थांश ✓
OU = √((−3)² + (−4)²) = √25 = 5
OV = √(3² + (−4)²) = √25 = 5 → OU = OV → समद्विबाहु
UV = |3 − (−3)| = 6
U और V को विपरीत चिह्नों का युग्म चुनने से समद्विबाहु गुण स्वत: क्यों आ जाता है: U और V के x-निर्देशांक विपरीत और y-निर्देशांक समान हैं, अत: वे y-अक्ष में एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब हैं। मूलबिंदु उसी दर्पण रेखा पर स्थित है और दर्पण रेखा का कोई भी बिंदु किसी भी प्रतिबिंब-युग्म से समान दूरी पर होता है। अत: OU = OV बिना गणना किए ही प्राप्त हो जाता है — सममिति ही उपपत्ति दे देती है।
यह कीजिए: (ii) को O पर समकोण भी बनाने का प्रयास कीजिए। इसके लिए OU ⊥ OV चाहिए और U (−a, −b), V (a, −b) के साथ यह केवल तभी होता है जब a = b हो — जैसे O, (−3, −3), (3, −3)। जाँचिए कि तब दोनों भुजाएँ √18 और आधार 6 है तथा 18 + 18 = 36 ✓।
प्र9.
दी गई सारणी, बिंदुओं S, M और T के निर्देशांकों को प्रदर्शित करती है। प्रत्येक स्थिति में बताइए कि क्या M, रेखाखंड ST का मध्यबिंदु है। अपने उत्तर को सत्यापित कीजिए। [S, M, T: (−3, 0), (0, 0), (3, 0) | (2, 3), (3, 4), (4, 5) | (0, 0), (0, 5), (0, −10) | (−8, 7), (0, −2), (6, −3)] जब M, ST का मध्यबिंदु हो तो क्या आप M, S और T के निर्देशांकों के मध्य किसी संबंध का पता लगा सकते हैं?
उत्तर

प्रत्येक पंक्ति में S और T के निर्देशांकों का औसत निकालकर M से तुलना कीजिए।

SMTक्या M, ST का मध्यबिंदु है?आपके उत्तर का कारण
(−3, 0)(0, 0)(3, 0)हाँ((−3 + 3)/2, (0 + 0)/2) = (0, 0) = M
(2, 3)(3, 4)(4, 5)हाँ((2 + 4)/2, (3 + 5)/2) = (3, 4) = M
(0, 0)(0, 5)(0, −10)नहीं((0 + 0)/2, (0 + (−10))/2) = (0, −5), न कि (0, 5)
(−8, 7)(0, −2)(6, −3)नहीं((−8 + 6)/2, (7 + (−3))/2) = (−1, 2), न कि (0, −2)

संबंध: M का प्रत्येक निर्देशांक S और T के तत्संबंधी निर्देशांकों का औसत होता है।

यदि M, ST का मध्यबिंदु है तो—
xM = (xS + xT)/2  और  yM = (yS + yT)/2
औसत का यह नियम सत्य क्यों है: M मध्यबिंदु ठीक तभी है जब S → M की यात्रा M → T में ज्यों-की-त्यों दोहराई जाए। दोनों यात्राओं की एक-एक निर्देशांक से तुलना कीजिए। क्षैतिज विस्थापन बराबर होने चाहिए, अत: xM − xS = xT − xM, जिससे 2xM = xS + xT। ऊर्ध्व विस्थापनों पर वही तर्क 2yM = yS + yT देता है। चूँकि दोनों निर्देशांक अलग-अलग सँभाले जा सकते हैं, तिरछे रेखाखंड का मध्यबिंदु ज्ञात करना क्षैतिज रेखाखंड से अधिक कठिन नहीं है।
स्वयं जाँचिए: केवल दूरियों का बराबर होना पर्याप्त नहीं है। तीसरी पंक्ति में M (0, 5), S से 5 इकाई और T से 15 इकाई दूर है — वह रेखाखंड पर भी नहीं है, जो (0, 0) से नीचे (0, −10) तक जाता है। मध्यबिंदु का रेखाखंड पर होना आवश्यक है और औसत का नियम इसे स्वत: सुनिश्चित कर देता है।
प्र10.
आपने जो संबंध ज्ञात किया है, उसका उपयोग करते हुए B के निर्देशांक ज्ञात कीजिए, यदि M (−7, 1), A (3, −4) और B (x, y) के मध्यबिंदु के रूप में दिया गया है।
उत्तर

औसत के नियम को एक-एक निर्देशांक पर लगाकर अज्ञात के लिए हल कीजिए।

(3 + x)/2 = −7 → 3 + x = −14 → x = −17
(−4 + y)/2 = 1 → −4 + y = 2 → y = 6

B = (−17, 6)

जाँच: A (3, −4) और B (−17, 6) का मध्यबिंदु = ((3 − 17)/2, (−4 + 6)/2) = (−7, 1) = M ✓

उत्तर A से इतना दूर क्यों है: M संख्याओं 3 और −7 के बीच थोड़ा-सा ही नहीं है — A से M तक का विस्थापन (−10, 5) है और B को M से आगे ठीक वही दूसरा विस्थापन होना चाहिए: (−7 − 10, 1 + 5) = (−17, 6)। विस्थापन में सोचने से उत्तर एक ही पंक्ति में मिल जाता है और बीजगणित की जाँच भी हो जाती है।
संकेत: निर्देशांकों का युग्म दो स्वतंत्र समीकरण देता है — एक x के लिए, एक y के लिए। वे कभी आपस में नहीं मिलते, अत: उन्हें सदैव अलग-अलग हल कीजिए, युगपत समीकरणों की भाँति नहीं।
प्र11.
मान लीजिए रेखाखंड AB के त्रिविभाजन बिंदु P और Q हैं, जहाँ P, A के निकट है, जबकि Q, B के निकट है। किसी रेखाखंड के मध्यबिंदु के निर्देशांकों को ज्ञात करने के अपने ज्ञान का उपयोग करते हुए P और Q के निर्देशांकों को आप कैसे ज्ञात करेंगे? इस विधि को उपयोग कीजिए, जब बिंदु A (4, 7) और B (16, −2) हैं।
उत्तर

विधि। मध्यबिंदु का नियम इसलिए चलता है क्योंकि उसमें A से B तक के विस्थापन का आधा भाग लिया जाता है। त्रिविभाजन बिंदुओं के लिए उसी विस्थापन का एक-तिहाई और दो-तिहाई भाग चाहिए।

A से B तक विस्थापन = (xB − xA, yB − yA)
मध्यबिंदु = A + विस्थापन का ½
P = A + विस्थापन का   →  P = ((2xA + xB)/3, (2yA + yB)/3)
Q = A + विस्थापन का   →  Q = ((xA + 2xB)/3, (yA + 2yB)/3)

A (4, 7) और B (16, −2) के लिए—

A से B तक विस्थापन = (16 − 4, −2 − 7) = (12, −9)
विस्थापन का एक-तिहाई = (4, −3)

P = (4 + 4, 7 − 3) = (8, 4)
Q = (8 + 4, 4 − 3) = (12, 1)
और B = (12 + 4, 1 − 3) = (16, −2) ✓

केवल मध्यबिंदु से सत्यापन, जैसा प्रश्न में कहा गया है—

A (4, 7) और Q (12, 1) का मध्यबिंदु = ((4 + 12)/2, (7 + 1)/2) = (8, 4) = P ✓
P (8, 4) और B (16, −2) का मध्यबिंदु = ((8 + 16)/2, (4 − 2)/2) = (12, 1) = Q ✓
मध्यबिंदु का विचार आगे कैसे बढ़ता है: मध्यबिंदु सूत्र वस्तुत: यह कहता है कि प्रत्येक विस्थापन को एक निश्चित अनुपात में बाँटा जाए, और निर्देशांक उस बँटवारे को स्वतंत्र रूप से सँभाल लेते हैं। यदि P, AB को 1 : 2 में बाँटता है तो क्षैतिज विस्थापन 12 का बँटवारा 4 और 8 में तथा ऊर्ध्व विस्थापन −9 का बँटवारा −3 और −6 में होता है — दोनों में वही अनुपात। इसीलिए विस्थापन का एक ही भिन्नात्मक भाग आपको सही बिंदु पर पहुँचा देता है।
स्वयं जाँचिए: AP = √(4² + 3²) = 5, PQ = √(4² + 3²) = 5, QB = √(4² + 3²) = 5 और AB = √(12² + 9²) = √225 = 15 = 3 × 5। तीनों भाग वास्तव में बराबर हैं, अत: P और Q यथार्थ त्रिविभाजन बिंदु हैं।
प्र12.
(i) दिए गए बिंदुओं A (1, −8), B (−4, 7) और C (−7, −4) के लिए प्रदर्शित कीजिए कि वे एक वृत्त K पर स्थित हैं जिसका केंद्र मूलबिंदु O (0, 0) है। वृत्त K की त्रिज्या क्या होगी? (ii) दिए गए बिंदुओं D (−5, 6) और E (0, 9) के लिए जाँच कीजिए कि क्या वे वृत्त K के भीतर स्थित हैं, वृत्त पर स्थित हैं या वृत्त के बाहर स्थित हैं।
उत्तर

(i) केंद्र O वाला वृत्त उन सभी बिंदुओं का समुच्चय है जो O से एक निश्चित दूरी पर हैं। अत: OA, OB, OC की गणना कीजिए और देखिए कि वे बराबर हैं या नहीं।

OA = √(1² + (−8)²) = √(1 + 64) = √65
OB = √((−4)² + 7²) = √(16 + 49) = √65
OC = √((−7)² + (−4)²) = √(49 + 16) = √65

OA = OB = OC = √65 → तीनों बिंदु O केंद्र वाले एक ही वृत्त पर हैं
K की त्रिज्या = √65 ≈ 8.06 इकाई
यह पूर्ण उपपत्ति क्यों है: ‘O केंद्र और r त्रिज्या वाले वृत्त पर स्थित होना’ का अर्थ ही है ‘O से r दूरी पर होना’ — यह वृत्त की परिभाषा है, उसका कोई गुण नहीं। अत: तीनों दूरियों का बराबर दिखा देना ही तीनों बिंदुओं का उस वृत्त पर होना सिद्ध कर देता है। यह भी देखिए कि तीनों उत्तर बराबर क्यों निकले — 1² + 8², 4² + 7² और 7² + 4² तीनों का योग 65 है, यद्यपि बिंदु तीन भिन्न चतुर्थांशों में हैं। वर्ग करने पर चिह्न समाप्त हो जाते हैं।

(ii) प्रत्येक दूरी की त्रिज्या से तुलना कीजिए। वर्गमूल से बचने के लिए वर्गों की तुलना करना अधिक स्पष्ट है—

r² = 65

OD² = (−5)² + 6² = 25 + 36 = 61  →  61 < 65  →  D वृत्त के भीतर है
OE² = 0² + 9² = 81  →  81 > 65  →  E वृत्त के बाहर है

लंबाइयों में: OD = √61 ≈ 7.81 < 8.06 और OE = 9 > 8.06।

वर्गों की तुलना क्यों सुरक्षित है: दूरियाँ कभी ऋणात्मक नहीं होतीं और अऋणात्मक संख्याओं पर वर्ग करना वर्धमान होता है। अत: OD < r ठीक तभी होगा जब OD² < r² हो। 61, 65 और 81 के साथ काम करने से सब कुछ पूर्ण संख्याओं में रहता है और सन्निकटन से उत्पन्न संदेह समाप्त हो जाता है — √61 ≈ 7.81 और √65 ≈ 8.06 इतने निकट हैं कि असावधान दशमलव भ्रमित कर सकता है।
संकेत: इससे किसी भी बिंदु P और केंद्र C, त्रिज्या r वाले किसी भी वृत्त के लिए त्रि-मार्गी परीक्षण मिल जाता है — CP² की r² से तुलना कीजिए: कम अर्थात भीतर, बराबर अर्थात वृत्त पर, अधिक अर्थात बाहर।
प्र13.
त्रिभुज ABC की भुजाओं के मध्यबिंदु D, E और F हैं। D, E और F के निर्देशांक क्रमशः (5, 1), (6, 5) और (0, 3) दिए गए हैं, A, B और C के निर्देशांक ज्ञात कीजिए।
उत्तर

D को BC का, E को CA का और F को AB का मध्यबिंदु लीजिए।

मध्यबिंदु के नियम को योग के रूप में लिखिए—
B + C = 2D = (10, 2)  …(1)
C + A = 2E = (12, 10)  …(2)
A + B = 2F = (0, 6)  …(3)

तीनों जोड़िए: 2(A + B + C) = (22, 18) → A + B + C = (11, 9)

A = (A + B + C) − (B + C) = (11, 9) − (10, 2) = (1, 7)
B = (A + B + C) − (C + A) = (11, 9) − (12, 10) = (−1, −1)
C = (A + B + C) − (A + B) = (11, 9) − (0, 6) = (11, 3)

तीनों मध्यबिंदुओं की जाँच—

BC का मध्यबिंदु = ((−1 + 11)/2, (−1 + 3)/2) = (5, 1) = D ✓
CA का मध्यबिंदु = ((11 + 1)/2, (3 + 7)/2) = (6, 5) = E ✓
AB का मध्यबिंदु = ((1 − 1)/2, (7 − 1)/2) = (0, 3) = F ✓
तीनों समीकरणों को जोड़ना ही कुंजी क्यों है: प्रत्येक समीकरण में तीन अज्ञातों में से दो आते हैं, अत: कोई भी अकेला हल नहीं हो सकता। जोड़ने पर प्रत्येक शीर्ष ठीक दो बार आता है, जिससे A + B + C प्राप्त हो जाता है। फिर उस योग में से मूल समीकरणों में से कोई एक घटाने पर एक शीर्ष अकेला निकल आता है। ‘पहले पूरा योग, फिर एक-एक अलग’ की यह युक्ति याद रखने योग्य है; यह इसलिए चलती है क्योंकि प्रत्येक निर्देशांक अलग-अलग सँभाला जा सकता है, अत: जो एक समीकरण दिखता है वह वस्तुत: दो साधारण रैखिक समीकरण हैं।
क्या आप जानते हैं? ∆DEF को ∆ABC का मध्यबिंदु त्रिभुज कहते हैं। इन तीनों समीकरणों का सदैव ठीक एक हल होता है, अत: भुजाओं के मध्यबिंदु त्रिभुज को पूर्णत: निर्धारित कर देते हैं। अक्षरों का युग्मन बदलने पर (जैसे D को BC के स्थान पर CA का मध्यबिंदु लेने पर) केवल A, B, C के नाम बदलते हैं — त्रिभुज वही रहता है।
प्र14.
एक शहर की दो मुख्य सड़कें हैं जो एक-दूसरे को शहर के केंद्र पर प्रतिच्छेद करती हैं। ये दो सड़कें उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम दिशा के अनुदिश हैं। शहर की अन्य सभी गलियाँ इन्हीं सड़कों के समानांतर हैं और एक-दूसरे से 200 मी. की दूरी पर स्थित हैं। प्रत्येक दिशा में 10 गलियाँ हैं। (i) 1 से.मी. = 200 मी. पैमाने का उपयोग करते हुए, अपनी अभ्यास-पुस्तिका में शहर का एक प्रतिरूप बनाइए। सड़कों को एकल रेखाओं द्वारा प्रस्तुत कीजिए। (ii) प्रदर्श में गलियों के प्रतिच्छेदन हैं। प्रत्येक गली प्रतिच्छेदन दो गलियों द्वारा बना है जिसमें एक गली उत्तर-दक्षिण दिशा और दूसरी गली पूर्व-पश्चिम दिशा की ओर जा रही है। यदि उत्तर-दक्षिण दिशा में जाने वाली दूसरी गली और पूर्व-पश्चिम दिशा में जाने वाली पाँचवीं गली किसी स्थान पर प्रतिच्छेद करती हैं तो हम इस गली प्रतिच्छेदन को (2, 5) कहेंगे। इस पद्धति का उपयोग करते हुए ज्ञात कीजिए— (a) गलियों के कितने प्रतिच्छेदनों को (4, 3) के रूप में व्यक्त किया जा सकता है? (b) गलियों के कितने प्रतिच्छेदनों को (3, 4) के रूप में व्यक्त किया जा सकता है?
उत्तर

(i) 10 ऊर्ध्व रेखाएँ (उत्तर-दक्षिण गलियाँ) और 10 क्षैतिज रेखाएँ (पूर्व-पश्चिम गलियाँ) खींचिए, प्रत्येक समूह में 1 से.मी. की दूरी पर — क्योंकि 1 से.मी. = 200 मी. के पैमाने पर 200 मी. ठीक 1 से.मी. है। उत्तर-दक्षिण गलियों को बाएँ से दाएँ 1 से 10 तक और पूर्व-पश्चिम गलियों को नीचे से ऊपर 1 से 10 तक क्रमांकित कीजिए। जाल में 10 × 10 = 100 प्रतिच्छेदन बनते हैं।

1234567891012345678910(4, 3)(3, 4)उत्तर-दक्षिण गली का क्रमांकपूर्व-पश्चिम गली का क्रमांक
शहर का प्रतिरूप: 10 उत्तर-दक्षिण और 10 पूर्व-पश्चिम गलियाँ, 1 से.मी. की दूरी पर। (4, 3) और (3, 4) दो भिन्न प्रतिच्छेदन हैं।

(ii) (a) ठीक एक। (b) ठीक एक — किंतु वह एक भिन्न प्रतिच्छेदन है।

(4, 3) = चौथी उत्तर-दक्षिण गली और तीसरी पूर्व-पश्चिम गली का प्रतिच्छेदन → 1 प्रतिच्छेदन
(3, 4) = तीसरी उत्तर-दक्षिण गली और चौथी पूर्व-पश्चिम गली का प्रतिच्छेदन → 1 प्रतिच्छेदन
(4, 3) ≠ (3, 4)
संख्या सदैव एक ही क्यों होती है: उत्तर-दक्षिण गली और पूर्व-पश्चिम गली समानांतर नहीं हैं, अत: वे मिलती अवश्य हैं, और दो असमानांतर सरल रेखाएँ ठीक एक ही बिंदु पर मिलती हैं — वे दो बार नहीं मिल सकतीं। अत: प्रत्येक समूह से एक-एक गली का नाम लेने पर एक ही प्रतिच्छेदन निर्धारित होता है। यही कारण है कि तल के किसी बिंदु का केवल एक ही निर्देशांक-युग्म होता है।
(4, 3) और (3, 4) भिन्न स्थान क्यों हैं: परिपाटी क्रम निश्चित कर देती है — पहली संख्या सदैव उत्तर-दक्षिण गली और दूसरी सदैव पूर्व-पश्चिम गली बताती है। उलटकर पढ़ने पर आप एक सड़क पर 200 मी. आगे और दूसरी पर 200 मी. पीछे पहुँच जाते हैं — अर्थात बिलकुल दूसरा प्रतिच्छेदन। डाक-पता भी इसी प्रकार कार्य करता है; और (x, y) भी।
क्या आप जानते हैं? अध्याय का आरंभ इसी विचार के व्यावहारिक रूप से होता है। सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नगरों की गलियाँ उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम दिशा में लगभग 10 मी. की दूरी पर बनाई गई थीं, जिससे कोई व्यापारी दोनों दिशाओं में गलियाँ गिनकर गोदाम तक पहुँच सकता था — बीजगणित के रूप में लिखे जाने से हजारों वर्ष पूर्व की एक कार्यशील निर्देशांक पद्धति।
प्र15.
एक कंप्यूटर ग्राफिक्स (चित्रांकन) कार्यक्रम में एक आयताकार दृश्यपटल (स्क्रीन) पर छवियों को प्रदर्शित किया जाता है जिसकी निर्देशांक पद्धति का मूलबिंदु नीचे बाएँ कोने में है। दृश्यपटल की चौड़ाई और ऊँचाई क्रमशः 800 पिक्सेल और 600 पिक्सेल है। 80 पिक्सेल त्रिज्या वाला एक वृत्ताकार प्रतीक (आइकन), बिंदु A (100, 150) को केंद्रित करके बनाया गया है। 100 पिक्सेल त्रिज्या वाला एक अन्य वृत्ताकार प्रतीक बिंदु B (250, 230) को केंद्रित करके बनाया गया है। पता लगाइए— (i) क्या किसी भी वृत्त का कोई भाग दृश्यपटल (स्क्रीन) से बाहर स्थित है? (ii) क्या दोनों वृत्त एक-दूसरे को प्रतिच्छेद करते हैं?
उत्तर

मूलबिंदु नीचे बाएँ कोने पर है, अत: दृश्यपटल ठीक उन बिंदुओं का समुच्चय है जिनके लिए 0 ≤ x ≤ 800 और 0 ≤ y ≤ 600 है।

A (100, 150)B (250, 230)170O (0, 0)800 पिक्सेल चौड़ा600 पिक्सेल ऊँचा
800 × 600 के दृश्यपटल पर दोनों प्रतीक। दोनों भीतर हैं और उनके केंद्रों के मध्य दूरी 170 पिक्सेल है।

(i) नहीं — दोनों वृत्त पूर्णत: दृश्यपटल के भीतर हैं। कोई वृत्त आयत के भीतर ठीक तभी रहता है जब उसके केंद्र से प्रत्येक किनारे की दूरी त्रिज्या से कम न हो।

प्रतीकबाएँ किनारे सेदाएँ किनारे सेनीचे के किनारे सेऊपर के किनारे सेत्रिज्यानिष्कर्ष
A (100, 150)10070015045080न्यूनतम दूरी 100 ≥ 80 → भीतर
B (250, 230)250550230370100न्यूनतम दूरी 230 ≥ 100 → भीतर
प्रतीक A: x, 100 − 80 = 20 से 100 + 80 = 180 तक और y, 70 से 230 तक — सब दृश्यपटल के भीतर
प्रतीक B: x, 150 से 350 तक और y, 130 से 330 तक — सब दृश्यपटल के भीतर
चारों किनारों की दूरियाँ देख लेना पर्याप्त क्यों है: किसी सरल किनारे के सबसे निकट का वृत्त-बिंदु केंद्र से खींचे गए लंब पर होता है और उसकी दूरी (केंद्र से किनारे की दूरी) − r होती है। यदि यह चारों किनारों के लिए अऋणात्मक है तो वृत्त का कोई भाग किसी किनारे को पार नहीं कर सकता। ऊर्ध्व किनारे से दूरी केवल x-निर्देशांकों का अंतर है और क्षैतिज किनारे से केवल y-निर्देशांकों का — इसीलिए दृश्यपटल के किनारे अक्षों के अनुदिश रखे गए हैं।

(ii) हाँ, दोनों वृत्त एक-दूसरे को दो बिंदुओं पर प्रतिच्छेद करते हैं।

AB = √((250 − 100)² + (230 − 150)²)
= √(150² + 80²) = √(22500 + 6400) = √28900 = 170 पिक्सेल

त्रिज्याओं का योग = 80 + 100 = 180
त्रिज्याओं का अंतर = 100 − 80 = 20

20 < 170 < 180, अर्थात |r₁ − r₂| < AB < r₁ + r₂ → दोनों वृत्त दो बिंदुओं पर मिलते हैं
ये दो तुलनाएँ ही निर्णय क्यों कर देती हैं: यदि केंद्रों के बीच दूरी 180 से अधिक होती तो दोनों वृत्त पूर्णत: अलग रहते, और ठीक 180 पर वे केवल एक बिंदु पर स्पर्श करते। यदि दूरी 20 से कम होती तो छोटा वृत्त बड़े के भीतर समा जाता और कहीं भी न मिलता। दोनों परिधियाँ केवल तभी काट सकती हैं जब केंद्रों की दूरी त्रिज्याओं के अंतर और योग के ठीक बीच हो — और 170 उसी परास में है, अलग होने से मात्र 10 पिक्सेल की दूरी पर।
क्या आप जानते हैं? खेल और चित्रांकन कार्यक्रम टकराव की जाँच ठीक इसी प्रकार करते हैं। AB² = 28900 की (r₁ + r₂)² = 32400 से तुलना करने पर वर्गमूल की आवश्यकता ही नहीं पड़ती, इसीलिए यह इतना तीव्र है कि प्रत्येक फ्रेम में सैकड़ों वस्तुओं पर चल सके।
प्र16.
कार्तीय तल पर बिंदु A(2, 1), B(−1, 2), C(−2, −1) और D(1, −2) का अंकन कीजिए। क्या ABCD एक वर्ग है? क्या आप व्याख्या कर सकते हैं कि ऐसा क्यों है? इस वर्ग का क्षेत्रफल क्या है?
उत्तर

हाँ, ABCD एक वर्ग है और उसका क्षेत्रफल 10 वर्ग इकाई है।

xy-3-2-1123-3-2-1123A (2, 1)B (−1, 2)C (−2, −1)D (1, −2)√10
विकर्णों सहित ABCD। चारों भुजाएँ √10 और दोनों विकर्ण √20 हैं — एक तिरछा वर्ग।
चारों भुजाएँ—
AB = √((−1 − 2)² + (2 − 1)²) = √(9 + 1) = √10
BC = √((−2 + 1)² + (−1 − 2)²) = √(1 + 9) = √10
CD = √((1 + 2)² + (−2 + 1)²) = √(9 + 1) = √10
DA = √((2 − 1)² + (1 + 2)²) = √(1 + 9) = √10
→ चारों भुजाएँ बराबर → ABCD एक समचतुर्भुज है

दोनों विकर्ण—
AC = √((−2 − 2)² + (−1 − 1)²) = √(16 + 4) = √20
BD = √((1 + 1)² + (−2 − 2)²) = √(4 + 16) = √20
→ विकर्ण बराबर → समचतुर्भुज एक वर्ग है
केवल बराबर भुजाएँ पर्याप्त क्यों नहीं: चार बराबर भुजाएँ समचतुर्भुज बनाती हैं और समचतुर्भुज बिना किसी भुजा की लंबाई बदले जितना चाहे झुक सकता है। कोणों को निश्चित करने वाली बात विकर्ण हैं — समचतुर्भुज में विकर्ण केवल तभी बराबर होते हैं जब उसके कोण समकोण हों। इसे बौधायन-पाइथागोरस प्रमेय के विलोम से सीधे भी देखा जा सकता है — AB² + BC² = 10 + 10 = 20 = AC², अत: B पर कोण 90° है, और एक समकोण वाला समचतुर्भुज वर्ग होता है।
क्षेत्रफल, दो प्रकार से—
भुजा² = (√10)² = 10 वर्ग इकाई
½ × d₁ × d₂ = ½ × √20 × √20 = ½ × 20 = 10 वर्ग इकाई
क्या आप जानते हैं? यह वर्ग तिरछा है, अत: उसकी भुजाएँ पूर्ण संख्याएँ नहीं हैं — फिर भी क्षेत्रफल पूर्ण संख्या 10 है। यह इसलिए संभव है कि क्षेत्रफल में भुजा का केवल वर्ग चाहिए और दूरी सूत्र का वर्गमूल उसी वर्ग से कट जाता है। वर्ग का केंद्र AC का मध्यबिंदु है, अर्थात ((2 − 2)/2, (1 − 1)/2) = (0, 0) — वर्ग मूलबिंदु पर केंद्रित है, इसीलिए चारों बिंदु ± युग्मों में आए हैं।
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