प्र1.
एक ऋणात्मक संख्या को दूसरी ऋणात्मक संख्या से गुणा करने पर धनात्मक संख्या क्यों प्राप्त होती है? इस पर क्रियाविधि और ऋण के संदर्भ में विचार कीजिए। यदि एक ऋणात्मक संख्या ऋणभार को दर्शाती है तो इसे ऋणात्मक संख्या से गुणा करना ऋण के निरस्तीकरण को अभिव्यक्त करता है। (संकेत — यदि कोई आपके चार ऋणभार, जिनमें से प्रत्येक ₹3 मूल्य (अर्थात −3) का है, को आपसे ले लेता है तो प्रभावी रूप से आप ₹12 से धनी हो जाते हैं। इस प्रकार, (−3) × (−4) = + 12 होता है।)
उत्तर
क्योंकि ऋणभार का निरस्तीकरण आपको धनी बनाता है — और दूसरा ऋण चिह्न यही 'हटाने' का कार्य करता है।
₹3 का एक ऋणभार → −3
ऐसे 4 ऋणभार हटा लेना → (−3) × (−4)
आपकी स्थिति ₹12 सुधर जाती है → +12
ऐसे 4 ऋणभार हटा लेना → (−3) × (−4)
आपकी स्थिति ₹12 सुधर जाती है → +12
पुस्तक का यह चित्रण सहज है, परंतु यह नियम उस अंकगणित से बाध्य भी है जिसे हम पहले से मानते हैं। बंटन नियम की माँग देखिए —
(−3) × [4 + (−4)] = (−3) × 0 = 0
अत: (−3) × 4 + (−3) × (−4) = 0
हम जानते हैं (−3) × 4 = −12
अत: −12 + (−3) × (−4) = 0
इसलिए (−3) × (−4) = +12
अत: (−3) × 4 + (−3) × (−4) = 0
हम जानते हैं (−3) × 4 = −12
अत: −12 + (−3) × (−4) = 0
इसलिए (−3) × (−4) = +12
ऐसा क्यों होता है: जैसे ही हम यह आग्रह करते हैं कि a × 0 = 0 और p(q + r) = pq + pr ऋणात्मक संख्याओं पर भी लागू रहें, वैसे ही (−3) × (−4) का मान हमारी इच्छा का विषय नहीं रह जाता। कोई भी अन्य उत्तर बंटन नियम को तोड़ देगा। इसलिए 'ऋण गुणा ऋण बराबर धन' कोई सुविधाजनक परिपाटी नहीं, अपितु एकमात्र ऐसा मान है जो संपूर्ण पद्धति को संगत रखता है।
स्वयं जाँचिए: यही तर्क (−1) × (−1) पर लगाइए। (−1)(1 + (−1)) = 0 से −1 + (−1)(−1) = 0 मिलता है, अत: (−1)(−1) = 1।