कक्षा ९ गणित अध्याय 3 संख्याओं का संसार के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-08
इस अध्याय के बारे में
प्राकृत संख्याओं का जन्म एकैकी-संगतता से हुआ; ब्रह्मगुप्त (628 सामान्य संवत) द्वारा शून्य को संख्या मानने और ऋणभार (ऋण) तथा धन-संपत्ति (धन) के रूप में ऋणात्मक-धनात्मक संख्याएँ देने पर पूर्णांक (Z) प्राप्त हुए। परिमेय संख्या वह संख्या है जिसे p/q के रूप में लिखा जा सके, जहाँ p, q पूर्णांक हैं और q ≠ 0। परिमेय संख्याएँ योग, घटाव और गुणन के अंतर्गत संवृत हैं तथा 0 से विभाजन को छोड़कर विभाजन के अंतर्गत भी। परिमेय संख्याएँ सघन होती हैं — किन्हीं दो परिमेय संख्याओं a, b का माध्य (a + b)/2 सदैव एक परिमेय संख्या है जो उनके ठीक मध्य में स्थित होती है, अत: किन्हीं दो बिंदुओं के मध्य अनंत परिमेय संख्याएँ हैं। √2 अपरिमेय है। हिप्पासस की विरोधाभास द्वारा उपपत्ति में √2 = p/q (सरलतम रूप) मानने पर p और q दोनों सम सिद्ध हो जाते हैं, जो मान्यता का ही खंडन कर देता है। सरलतम रूप की परिमेय संख्या p/q का दशमलव
अभ्यास
- प्रश्नावली 3.1
- सोचिए और विचार कीजिए
- प्रश्नावली 3.2
- सोचिए और विचार कीजिए
- सोचिए और विचार कीजिए
- प्रश्नावली 3.3
- सोचिए और विचार कीजिए
- पाठ्य प्रश्न
- प्रश्नावली 3.4
- सोचिए और विचार कीजिए
- सोचिए और विचार कीजिए
- सोचिए और विचार कीजिए
- सोचिए और विचार कीजिए
- पाठ्य प्रश्न
- सोचिए और विचार कीजिए
- सोचिए और विचार कीजिए
- प्रश्नावली 3.5
- सोचिए और विचार कीजिए
- अंतिम प्रश्नावली