कक्षा ९ गणित अध्याय 4 प्रश्नावली 4.3 के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
ऊपर दी गई सर्वसमिकाओं में से किसी एक सर्वसमिका का उपयोग करते हुए निम्नलिखित वर्ग ज्ञात कीजिए। सुनिश्चित कीजिए कि इनमें से कौन-सी सर्वसमिका का उपयोग गणना को सरल बनाता है — (i) 117²   (ii) 78²   (iii) 198²   (iv) 214²   (v) 1104²   (vi) 1120²
उत्तर

वही सर्वसमिका चुनिए जिससे टुकड़े छोटे रहें: संख्या पूर्ण संख्या के निकट हो तो दो पदों वाली, अन्यथा तीन पदों वाली।

(i) 117² — (a + b + c)² से, 100 + 10 + 7।

= 100² + 10² + 7² + 2(100)(10) + 2(10)(7) + 2(7)(100)
= 10000 + 100 + 49 + 2000 + 140 + 1400
= 13689

(ii) 78² — (a − b)² से, 80 − 2।

= 80² − 2 × 80 × 2 + 2² = 6400 − 320 + 4 = 6084

(iii) 198² — (a − b)² से, 200 − 2।

= 40000 − 800 + 4 = 39204

(iv) 214² — (a + b + c)² से, 200 + 10 + 4।

= 40000 + 100 + 16 + 2(200)(10) + 2(10)(4) + 2(4)(200)
= 40000 + 100 + 16 + 4000 + 80 + 1600 = 45796

(v) 1104² — (a + b)² से, 1100 + 4।

= 1100² + 2 × 1100 × 4 + 4² = 1210000 + 8800 + 16 = 1218816

(vi) 1120² — (a + b)² से, 1100 + 20।

= 1210000 + 2 × 1100 × 20 + 400 = 1210000 + 44000 + 400 = 1254400
कौन-सी सर्वसमिका और क्यों: जब संख्या किसी पूर्ण संख्या के ठीक पास हो तो दो पदों का विभाजन पर्याप्त है — 78, 198, 1104, 1120 सभी ऐसे हैं। परंतु 117 और 214 किसी पूर्ण संख्या से दो अंक दूर हैं, अत: दो पदों में बाँटने पर b = 17 या b = 14 रह जाता और b² निकालना मूल प्रश्न जितना ही कठिन होता। सैकड़ा + दहाई + इकाई में बाँटने पर छहों भाग एक-अंकीय गुणा बन जाते हैं। आवश्यक पदों की संख्या शून्येतर अंकों की संख्या के बराबर होती है, इसीलिए तीन-अंकीय संख्या के लिए तीन पदों वाली सर्वसमिका स्वाभाविक है।
स्वयं जाँचिए: 1120² को (112 × 10)² = 112² × 100 = 12544 × 100 से भी किया जा सकता है। उत्तर वही है, और यह याद दिलाता है कि दस की घातें पहले बाहर निकाल लेने से बहुत श्रम बचता है।
प्र2.
उपर्युक्त सर्वसमिकाओं का उपयोग करके गुणनखंड कीजिए — (i) 16y² − 24y + 9   (ii) (9/4)s² + 6st + 4t²   (iii) m²/9 + mk/3 + k²/4 + 3nk + 2mn + 9n²   (iv) p²/16 − 2 + 16/p²   (v) 9a² + 4b² + c² − 12ab + 6ac − 4bc
उत्तर

(i) 16y² − 24y + 9 — मध्य में ऋण चिह्न वाला वर्ग।

16y² = (4y)²,   9 = 3²,   2(4y)(3) = 24y ✓
= (4y − 3)²

(ii) (9/4)s² + 6st + 4t²

(9/4)s² = ((3/2)s)²,   4t² = (2t)²,   2((3/2)s)(2t) = 6st ✓
= ((3/2)s + 2t)²  — अर्थात (1/4)(3s + 4t)²

(iii) m²/9 + mk/3 + k²/4 + 3nk + 2mn + 9n² — छह पद हैं, जिनमें तीन वर्ग हैं, अत: (a + b + c)² आज़माइए।

m²/9 = (m/3)²,   k²/4 = (k/2)²,   9n² = (3n)²
a = m/3, b = k/2, c = 3n लेकर तीनों मिश्रित पद जाँचिए:
2ab = 2(m/3)(k/2) = mk/3 ✓
2bc = 2(k/2)(3n) = 3kn ✓
2ca = 2(3n)(m/3) = 2mn ✓
= (m/3 + k/2 + 3n)²  — अर्थात (1/36)(2m + 3k + 18n)²

(iv) p²/16 − 2 + 16/p² — मध्य पद ही संकेत है: 2(p/4)(4/p) = 2।

p²/16 = (p/4)²,   16/p² = (4/p)²,   2(p/4)(4/p) = 2 ✓
= (p/4 − 4/p)²  — अर्थात (p² − 16)²/(16p²), अर्थात (p − 4)²(p + 4)²/(16p²)

(v) 9a² + 4b² + c² − 12ab + 6ac − 4bc — तीन में से दो मिश्रित पद ऋणात्मक हैं, अत: किसी एक चर पर ऋण चिह्न होना चाहिए।

a′ = 3a, b′ = −2b, c′ = c लेकर देखिए:
2a′b′ = 2(3a)(−2b) = −12ab ✓
2b′c′ = 2(−2b)(c) = −4bc ✓
2c′a′ = 2(c)(3a) = 6ac ✓
= (3a − 2b + c)²
ऋण चिह्न कहाँ लगाएँ: (a + b + c)² के तीन मिश्रित पद 2ab, 2bc, 2ca हैं। ठीक एक चर का चिह्न बदलने पर उनमें से ठीक दो पद बदलते हैं — वही दो जिनमें वह चर आता है। अत: दो ऋण और एक धन का प्रतिरूप बताता है कि एक ही चर ऋणात्मक है; तीन ऋण असंभव हैं; और सब धन का अर्थ है कोई चर ऋणात्मक नहीं (अथवा सभी)। (v) में ऋणात्मक पद वही हैं जिनमें b है, अत: b ही ऋणात्मक लिया जाता है।
प्र3.
सर्वसमिका (a + b + c)² = a² + b² + c² + 2ab + 2bc + 2ca का उपयोग करके निम्नलिखित का विस्तार कीजिए — (i) (p + 3q + 7r)²   (ii) (3x − 2y + 4z)²
उत्तर

(i) (p + 3q + 7r)² — a = p, b = 3q, c = 7r।

= p² + (3q)² + (7r)² + 2(p)(3q) + 2(3q)(7r) + 2(7r)(p)
= p² + 9q² + 49r² + 6pq + 42qr + 14pr

(ii) (3x − 2y + 4z)² — a = 3x, b = −2y, c = 4z लीजिए और चिह्न कोष्ठक के भीतर ही रहने दीजिए।

= (3x)² + (−2y)² + (4z)² + 2(3x)(−2y) + 2(−2y)(4z) + 2(4z)(3x)
= 9x² + 4y² + 16z² − 12xy − 16yz + 24zx
संकेत: ध्यान दीजिए कि भीतर कितने भी ऋण चिह्न हों, वर्ग वाले पद कभी ऋणात्मक नहीं होते — (−2y)² = +4y²। केवल मिश्रित पद ही ऋणात्मक हो सकते हैं।
प्र4.
क्या यह एक सर्वसमिका है? (a + b − c)² + (a − b + c)² + (a − b − c)² = 2a² + 2b² + 2c²
उत्तर

नहीं, यह सर्वसमिका नहीं है। एक ही प्रतिस्थापन इसे तय कर देता है, और विस्तार बता देता है कि कमी कहाँ है।

a = b = c = 1 लीजिए।
बायाँ पक्ष = (1 + 1 − 1)² + (1 − 1 + 1)² + (1 − 1 − 1)² = 1 + 1 + 1 = 3
दायाँ पक्ष = 2 + 2 + 2 = 6
3 ≠ 6, अत: यह समीकरण एक साधारण-से बिंदु पर ही असत्य हो जाता है।

तीनों वर्गों का विस्तार बाएँ पक्ष का वास्तविक मान बता देता है:

(a + b − c)² = a² + b² + c² + 2ab − 2bc − 2ca
(a − b + c)² = a² + b² + c² − 2ab − 2bc + 2ca
(a − b − c)² = a² + b² + c² − 2ab + 2bc − 2ca
योग = 3a² + 3b² + 3c² − 2ab − 2bc − 2ca

यह 2a² + 2b² + 2c² नहीं है, अत: यह समीकरण केवल उन्हीं a, b, c के लिए सत्य है जिनके लिए a² + b² + c² = 2ab + 2bc + 2ca हो — अर्थात यह समीकरण है, सर्वसमिका नहीं।

चौथा पद जो छूट गया है: जैसे ही (a + b + c)² को भी जोड़ दिया जाए, कथन सत्य हो जाता है। उसे जोड़ने पर a² + b² + c² + 2ab + 2bc + 2ca और मिलता है, और अब प्रत्येक मिश्रित पद कट जाता है:
(a + b + c)² + (a + b − c)² + (a − b + c)² + (a − b − c)² = 4a² + 4b² + 4c²

चारों चिह्न-प्रतिरूप ऐसे जोड़े बनाते हैं जो हर मिश्रित पद को काट देते हैं, और यह वास्तव में एक सर्वसमिका है — यही पृष्ठ 78 के चित्र 4.6 में दर्शाई गई है।

संकेत: किसी कथित सर्वसमिका को असत्य सिद्ध करने के लिए एक प्रति-उदाहरण पर्याप्त है और वही सबसे पहले आज़माना चाहिए। सत्य सिद्ध करने के लिए विस्तार करना अनिवार्य है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ