जीवा = 24 सेंटीमीटर।
आधी जीवा = 12 सेंटीमीटर
जीवा = 2 × 12 = 24 सेंटीमीटर
अद्यतन2026-09-08
जीवा = 24 सेंटीमीटर।
35°, वृत्त के उस किसी भी बिंदु पर जो उस चाप के बाहर स्थित है।
दूरी = 5 सेंटीमीटर।
जीवा = 24 सेंटीमीटर।
दिया गया है: केंद्र O वाला वृत्त और उसकी जीवा AB। सिद्ध करना है: AB का लंब समद्विभाजक O से होकर जाता है।
बिंदुपथ वाला चरण विस्तार से। मान लीजिए M, AB का मध्यबिंदु है और OM मिलाइए। ΔOMA और ΔOMB में — OA = OB (त्रिज्याएँ), AM = BM (M मध्यबिंदु है), OM उभयनिष्ठ। SSS द्वारा ΔOMA ≅ ΔOMB, अत: ∠OMA = ∠OMB। ये रेखीय युग्म हैं, अत: ∠OMA + ∠OMB = 180°, जिससे ∠OMA = ∠OMB = 90°। इस प्रकार OM, AB पर लंब है और उसे समद्विभाजित करता है — अर्थात OM ही लंब समद्विभाजक है और वह O से होकर जाता है।
∠ACB = 90° — अर्धवृत्त का कोण समकोण होता है।
समद्विबाहु त्रिभुजों से दूसरी उपपत्ति। OC मिलाइए। तब OA = OC = OB = r, अत: ΔOAC और ΔOBC दोनों समद्विबाहु हैं।
∠C = 105° और ∠D = 70°।
x = 38, ∠P = 86° और ∠R = 94°।
त्रिज्या = 10 सेंटीमीटर।
क्षेत्रफल = 60 वर्ग इकाई।
मान लीजिए चतुर्भुज ABCD है जिसमें AB = BC = 5 और CD = DA = 12 है — दोनों समान युग्म आस-पास हैं, अत: यह एक पतंग (काइट) है। विकर्ण BD मिलाइए।
यदि भुजाएँ 5, 12, 5, 12 के क्रम में हों: सम्मुख भुजाएँ समान हैं, अत: चतुर्भुज समांतर चतुर्भुज है; और चक्रीय समांतर चतुर्भुज आयत होता है (प्रश्न 14), अत: क्षेत्रफल = 5 × 12 = 60 वर्ग इकाई ही आएगा।
सबसे उपयुक्त विधि: एक विकर्ण खींचिए और उससे बने दोनों त्रिभुजों को देखिए।
कोई एक विकर्ण, मान लीजिए AC, चक्रीय चतुर्भुज ABCD को ΔABC और ΔACD में बाँट देता है। दोनों त्रिभुज उसी वृत्त के अंतर्गत हैं, अत: चतुर्भुज का परिकेंद्र इन दोनों त्रिभुजों का भी परिकेंद्र है। और त्रिभुज का परिकेंद्र कहाँ रहता है, यह हम जानते ही हैं —
| त्रिभुज ABC या ACD | परिकेंद्र कहाँ | ABCD के लिए निष्कर्ष |
|---|---|---|
| इनमें से एक न्यूनकोण त्रिभुज है | उसी त्रिभुज के अंदर | चतुर्भुज के अंदर |
| इनमें से एक समकोण त्रिभुज है | उसके कर्ण के मध्यबिंदु पर | विकर्ण AC पर (AC व्यास है) |
| दोनों अधिक कोण त्रिभुज हैं | दोनों के बाहर | चतुर्भुज के बाहर |
भुजाओं की सहायता से समतुल्य जाँच। चतुर्भुज की प्रत्येक भुजा एक चाप काटती है। केंद्र अंदर तभी होगा जब कोई भी भुजा अर्धवृत्त से बड़ा चाप न काटे। चूँकि अंतरित कोण चाप का आधा होता है, यह जाँच चाँदे से की जा सकती है —
दिया गया है: केंद्र O वाले वृत्त की जीवाएँ AB और CD, जिनमें AB = CD है और जो वृत्त के अंदर बिंदु P पर प्रतिच्छेद करती हैं। सिद्ध करना है: AB के दोनों भाग CD के भागों के समान हैं।
चरण 1 — समान जीवाएँ केंद्र से समदूरस्थ हैं। मान लीजिए M और N क्रमश: AB और CD के मध्यबिंदु हैं। प्रमेय 6 से OM = ON, तथा OM ⊥ AB और ON ⊥ CD।
चरण 2 — P दोनों मध्यबिंदुओं से समदूरस्थ है।
चरण 3 — अब भागों को जोड़िए। M और N मध्यबिंदु हैं, अत: AM = MB = ½AB और CN = ND = ½CD; और AB = CD से AM = CN।
वृत्त निश्चित हो जाता है: उसकी त्रिज्या 3√2 ≈ 4.24 सेंटीमीटर ही होगी।
सीधी रचना —
संकेत का उत्तर। हाँ — यह एक त्रिभुज का परिवृत्त है, और वह त्रिभुज बहुत पहचाना हुआ है।
अत: समतुल्य रचना यह है: AB = 6 सेंटीमीटर और ∠ACB = 45° वाला ΔABC बनाइए और उसका परिवृत्त खींचिए। उस वृत्त में जीवा AB = 6 सेंटीमीटर स्वत: केंद्र से 3 सेंटीमीटर दूरी पर होगी।
दिया गया है: वृत्त के अंतर्गत बना समांतर चतुर्भुज ABCD। सिद्ध करना है: ABCD एक आयत है।
विलोम भी सत्य है, अत: कुछ छूटता नहीं: प्रत्येक आयत चक्रीय है ही। उसके विकर्ण समान होते हैं और परस्पर समद्विभाजित होते हैं, अत: उनका उभयनिष्ठ मध्यबिंदु चारों शीर्षों से समान दूरी पर रहता है — वही बिंदु A, B, C, D से होकर जाने वाले वृत्त का केंद्र है।
दिया गया है: वृत्त के अंतर्गत बना आयत ABCD। सिद्ध करना है: विकर्ण केंद्र पर मिलते हैं।
उपपत्ति 1 — प्रत्येक विकर्ण व्यास है।
उपपत्ति 2 — आयत के गुणों से। आयत के विकर्ण समान होते हैं और परस्पर समद्विभाजित होते हैं। मान लीजिए वे P पर मिलते हैं। तब
एक और वृत्त, उसी केंद्र वाला — त्रिज्या √(r² − ℓ²/4) का संकेंद्री वृत्त, जहाँ r दिए गए वृत्त की त्रिज्या और ℓ जीवा की निश्चित लंबाई है।
और उस वृत्त का प्रत्येक बिंदु प्राप्त भी होता है। कोई भी बिंदु M लीजिए जिसके लिए OM = √(r² − ℓ²/4) है। M से होकर OM पर लंब जीवा खींचिए। प्रमेय 5 से वह M पर समद्विभाजित होती है और उसकी लंबाई 2√(r² − OM²) = 2 × (ℓ/2) = ℓ है। अत: M वास्तव में लंबाई ℓ की किसी जीवा का मध्यबिंदु है। बिंदुपथ पूरा संकेंद्री वृत्त है, उसका कोई अंश मात्र नहीं।
दिया गया है: केंद्र O वाला वृत्त; जीवाएँ AB और AC, जिनमें AB = AC है। सिद्ध करना है: AO, ∠BAC को समद्विभाजित करता है।
दूसरी दृष्टि। AB = AC समान जीवाएँ हैं, अत: वे O से समदूरस्थ हैं (प्रमेय 6)। किसी कोण के अंदर स्थित वह बिंदु जो दोनों भुजाओं से समदूरस्थ हो, उस कोण के समद्विभाजक पर होता है। अत: O, ∠BAC के समद्विभाजक पर स्थित है।
त्रिज्या = 13 सेंटीमीटर।
भुजा = r, और प्रत्येक भुजा की केंद्र से दूरी = (√3/2) r।
∠MOP = ∠MNP — ये समान हैं, क्योंकि दोनों जीवा MP पर एक ही वृत्तखंड में बने कोण हैं।
व्यास MN से और क्या मिलता है। चूँकि MN एक व्यास है, वह वृत्त के किसी भी अन्य बिंदु पर समकोण अंतरित करता है —
किसी भी शीर्ष का बहिष्कोण सम्मुख शीर्ष के अंत:कोण के बराबर होता है। पूरा तर्क तीन पंक्तियों में —
पहली विधि — जीवा के सूत्र से।
दूसरी विधि — त्रिभुज असमिका से। मान लीजिए जीवा AB केंद्र O से होकर नहीं जाती। तब A, O, B एक वास्तविक त्रिभुज बनाते हैं और
दिया गया है: केंद्र O वाले वृत्त के अंदर एक बिंदु A (A ≠ O)। सिद्ध करना है: A से होकर जाने वाली सभी जीवाओं में सबसे छोटी वही है जो OA पर लंब है।
चरण 1 — जीवा की लंबाई केवल केंद्र से दूरी पर निर्भर है। केंद्र से d दूरी पर स्थित जीवा की लंबाई 2√(r² − d²) है, जो d बढ़ने पर घटती है। अत: सबसे छोटी जीवा वही होगी जिसकी O से दूरी सबसे अधिक हो।
चरण 2 — वह दूरी अधिक से अधिक कितनी हो सकती है? मान लीजिए PQ, A से होकर जाने वाली कोई जीवा है और M, O से PQ पर खींचे गए लंब का पाद है, अत: दूरी OM है।
चित्र 5.30 में एक व्यास पर बना अर्धवृत्त है, जिसका केंद्र O है, चाप पर एक बिंदु A है और व्यास के दोनों सिरों पर बने कोण a और b अंकित हैं। चिह्न यही बताते हैं कि व्यास के दोनों आधे भाग और रेखाखंड OA — तीनों समान हैं, क्योंकि तीनों त्रिज्याएँ हैं।
मान लीजिए व्यास के सिरे P और Q हैं, अत: PO = OQ = OA = r। रेखाखंड OA बड़े त्रिभुज PAQ को दो समद्विबाहु त्रिभुजों में बाँट देता है।
दिया गया है: व्यास AB वाला वृत्त; जीवाएँ CC′ ⊥ AB और DD′ ⊥ AB। M, CD का मध्यबिंदु है और M′, C′D′ का। सिद्ध करना है: MM′ ⊥ AB।
चरण 1 — AB पूरी आकृति के लिए दर्पण रेखा है। व्यास वृत्त की परावर्तन सममिति की रेखा होती है। जीवा CC′ व्यास AB पर लंब है, अत: प्रमेय 5 से व्यास उसे समद्विभाजित करता है। इस प्रकार C′, C का AB के सापेक्ष प्रतिबिंब है। इसी कारण D′, D का AB के सापेक्ष प्रतिबिंब है।
चरण 2 — दोनों मध्यबिंदु भी परस्पर प्रतिबिंब हैं। परावर्तन एक दृढ़ रूपांतरण है, अत: वह रेखाखंड CD को रेखाखंड C′D′ पर और CD के मध्यबिंदु को C′D′ के मध्यबिंदु पर ले जाता है। इसलिए M′, M का AB के सापेक्ष प्रतिबिंब है। किंतु किसी बिंदु को उसके दर्पण-प्रतिबिंब से मिलाने वाला रेखाखंड दर्पण रेखा पर सदैव लंब होता है। अत: MM′ ⊥ AB।
यही उपपत्ति निर्देशांकों में। AB को x-अक्ष और केंद्र को मूल बिंदु मान लीजिए।
चित्र 5.31 में चक्रीय चतुर्भुज ABCD है और केंद्र O चारों शीर्षों से मिला हुआ है। चिह्न बताते हैं कि OA, OB, OC, OD सभी त्रिज्याएँ हैं, अत: चारों त्रिभुज OAB, OBC, OCD, ODA समद्विबाहु हैं। आधार के चार कोण अंकित हैं — A पर p, B पर q, C पर u और D पर v।
अब चतुर्भुज के चारों कोण पढ़िए — प्रत्येक कोण त्रिज्या द्वारा इन्हीं में से दो भागों में बँटा है —